छत्तीसगढ़ में अवैध खनन की बहार : पर्यावरण का विनाश, ओवरलोडेड गाड़ियों से कुचलती जिंदगियां

छत्तीसगढ़ में अवैध खनन की बहार : पर्यावरण का विनाश, ओवरलोडेड गाड़ियों से कुचलती जिंदगियां

संघर्ष संवाद 26.10.16


छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के तमनीर तहसील के ग्रामवासी लंबे समय से क्षेत्र में चल रहे अवैध कोयला खनन से आक्रोशित हैं. गांव वालों का कहना है कि कोयला खनन से न सिर्फ राजस्व का नुकसान हो रहा है बल्कि पर्यावरण का भी नुकसान हो रहा है साथ ही ओवरलोडेड गाड़ियों से दुर्घटनाएं भी हो रही है. छत्तीसगढ़ में प्रशासन की तरफ से खनन पर किसी तरह का कोई नियंत्रण नहीं है. खनन चौकिय बंद कर दी गई है. प्रस्तुत रमेश अग्रवाल का आलेख क्षेत्र की वास्तविक स्थिति का एक विस्तृत वर्णन देता है;

अवैध उत्खनन – ओवरलोड गाड़ियाँ !
कोयला कंपनियों को खुली छूट ! ग्रामीणों में आक्रोश !

रायगढ़ जिले के तमनार तहसील अंतर्गत कोयला कंपनियों के खिलाफ ग्रामीणों का आक्रोश कई बार आन्दोलन का रूप ले चूका है | प्रदुषण के अलावा ओवरलोड डंपरो के एक्सीडेंट की  वजह से कई ग्रामीण अपनी जान गँवा चुके हैं | कोयला सत्याग्रहियों का गुस्सा इस बात को लेकर भी है कि अवैध उत्खनन में लिप्त बड़ी कंपनियों के खिलाफ कोई सार्थक कार्यवाही नहीं होती वंही अगर वो सांकेतिक रूप में अपनी जमीन से कोयले का एक टुकड़ा भी निकालते हैं तो प्रशासन कड़ी कार्यवाही की बात करता है |

दरअसल तमनार क्षेत्र में जिंदल, निको, मोंनेट इत्यादि की कई कोयला खदाने संचालित थी | सुप्रीम कोर्ट से पुरानी खदाने निरस्त होने के बाद वर्तमान में हिंडाल्को और सरकारी कंपनी एसईसीएल की दो दो खदानें और मोनेट की खदान संचालित हैं | प्रारम्भ से ही प्रशासन ने यह जानने की कभी कोशिश नहीं की कि कंपनियों द्वारा कितने कोयले का उत्खनन किया गया और कितना ब्लेक मार्केट में बेच दिया गया | यही नहीं ओवरलोड गाडियों की जाँच का साधन भी खनिज विभाग के पास नहीं है | ओपचारिकता निभाने हुकराडीपा चौक के पास एक झोपड़ीनुमा खनिज जाँच चौकी जरुर बनाई गई है लेकिन कांटाघर वर्षोँ से ख़राब पड़ा है |

बैरियर के नाम पर बांसों को रस्सी से बंधकर खड़ा कर दिया गया है | मतलब किस गाड़ी में कितना कोयला परिवहन हो रहा है ये जानने का विभाग के पास कोई साधन नहीं है | खदानों से जो पर्ची बन कर आती है उसे ही वास्तविक वजन मान कर एंट्री कर ली जाती है | कई बार जाँच में सामने आ चूका है कि कंपनियां एक गाड़ी की दो दो पर्चियां बनाती हैं | एक में वो वजन होता है जितने वजन की गाड़ी को आरटीओ से मंजूरी होती है | दूसरी पर्ची अतिरिक्त कोयले की बनती है जिसको जाँच चौकी में नहीं दिखाया जाता | यही नहीं चूकिं बांस का जोड़तोड़ कर बनाया बैरियर हमेशा खुला ही रहता है इसलिये गाड़ियाँ बिना एंट्री के भी निकल जाती हैं | हर साल खदानों से करोडों की रायल्टी वसूलने में अपनी पीठ थपथपाने वाला खनिज विभाग एक अदद कांटाघर और पक्की जाँच चौकी क्यों नहीं बना रहा ये चिंतनीय विषय है |

पुरानी केप्टिव कोयला खदानों से अन्य कम्पनियों को कोयला बेचे जाने के रिकार्ड तो खनिज विभाग की अपनी फाईलों में ही दर्ज है जो कि सूचना के अधिकार में दिये भी गये हैं | एक कंपनी के खिलाफ तो सीबीआई जाँच भी हो रही है | इसके बावजूद सुविधायुक्त जाँच चौकी का न बनना अनेक संदेहों को जन्म देता है |

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