मुकुट बिहारी सरोज जी बादल की यादों में ……

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★ मेरी मृत्यु के बाद मेरे पार्थिव शरीर को विधुत शव दाह गृह में संस्कारित किया जाये।
★ शव यात्रा में कोई धार्मिक मंत्रोपचार नहीं किया जाये ना ही मृत्यु के बाद कोई रूढ़िगत अंतिम संस्कार किया जाये,
★ मेरी मत्यु के तीसरे दिन शोक सभा कर शोकाभिव्यक्ति की जा सकती है।
★ मेरे जीवन पर कार्ल मार्क्स के दर्शन का अत्यंत प्रभाव रहा है।

●यह कवि मुकुट बिहारी सरोज की वसीयत का एक अंश है।
● आज बुजुर्गवार की 91वे वी जन्मतिथि है। उनके जन्मने की तिथि में लयात्मकता थी 26 जुलाई 26 – हालांकि जाने की तारीख 18 सितम्बर 2002 के साथ उन्होंने इसे नहीं निबाहा।
● उनके बारे में दो स्थायी अफवाहें थीं,उनमें से एक उनके कम्युनिस्ट होने के बारे में थीं।
मजेदार बात यह हैं कि वे जीवन में कभी भी किसी भी कम्युनिस्ट पार्टी** के सदस्य नहीं रहे। मगर उन्होंने इस अफवाह का कभी भी खंडन नहीं किया। हालांकि ऐसा करने के उन्हें लाभ हो सकते थे. बजाय इसके वे इसे हवा देते रहे।

[ * पार्टी सदस्य न होने के पीछे कोई राजनीतिक-वैचारिक कारण नहीं था। उन्हें आशंका थी कि पार्टी अनुशासन उनकी – यू नो व्हाट – पीरे मुगा के औघड़पन की आदतों को इजाजत शायद न दे।
** वे कुछ समय के लिए, आजादी के पूर्व और पश्चात फॉरवर्ड ब्लॉक के सदस्य रहे. तांगे वालो और प्रिंटिंग प्रेस (जहां वे कम्पोजीटर हुआ करते थे) के मजदूरों की यूनियन बनाई। ग्वालियर में मनाये गए शुरुआती मई दिवस के एक आयोजन में वे और ग्वालियर के हर तरह से वजनदार हास्य कवि शांतिस्वरूप चाचा मय लाऊडस्पीकर, तांगे और घोड़े के गिरफ्तार भी हुए थे। हुजरात कोतवाली में दिन भर रहने की कहानी मजेदार सुनाते थे ; कहते थे कि हर 15 मिनट में तांगेवाला यही रट लगाता था कि ये कैसी सवारी मिलीं आज कि घोड़ा तक गिरफ्तार !!]

● अपने सात सदस्यीय प्रत्यक्ष कुटुंब में उन्होंने साढ़े चार कम्युनिस्ट तैयार किये. अगर विस्तृत परिवार (दामाद-बहू) इत्यादि जोड़ लिए जाए तो तीन और उनके सबसे काबिल मानसपुत्र शैली को जोड़ लिया जाए तो पांच होलटाइमर (पूरावक़्ती कम्युनिस्ट कार्यकर्ता) दिए।
● उनके लापरवाह वित्त-प्रबंधन में महीने के अंतिम सप्ताह में तली हुयी हरीमिर्च और आम-नीबू के अचार के साथ धुंयेदार चूल्हे पर बनी रोटियां खाना कभी बुरा नहीं लगा ; कालेज की पूरी पढ़ाई में अधिकाँश समय पीछे से घिसी पेन्ट को लम्बे-ढीले कुर्ते से ढांककर, एक्सपायरी डेट के जूते-चप्पलों को धारे इत-उत जूझते रहने में मलाल नहीं हुआ, अहसास-ए-कमतरीनी कभी नजदीक तक नहीं फटका।
● क्योंकि किसी भी अतिरिक्त सुविधा या ऐश्वर्य से अधिक रईसी उन्हें और अपनी माँ को अपने साथ देखकर होती रही।
● वे अपनी शर्तों पर, अपने विचारों की कंदील उठाये जीये। उन के कंधे कभी नहीं कँपकँपाये , उनका सर कभी नहीं झुका। उन्होंने जो रचा है-थोड़ी सी कविताओं मगर अनेक सशरीर व्यक्तित्वों के रूप में – वह आगे भी उनके कहे “कोई कीमत भले चुकाओ/लेकिन जलकर रात बिताओ” को निरन्तरित रखेगा।

● वे गज़ब के डेमोक्रेटिक थे – बच्चों के मामले में । हमे याद नहीं कि उन्होंने कभी हमसे पढ़ने की कही या शादी विवाह या प्रेम के मसलों सहित किसी बात के लिए टोका हो । इसमें विरक्ति नहीं, विश्वास था । उनकी उपस्थिति भर काफी होती थी ।
● वे हमारे पिता भी थे; और जीवन में जो भी सकारात्मक है वह उनके और माँ के दिए संस्कार और विचार की वजह से है।

● अभाग-सुभाग हमारे विभाग नहीं है, लेकिन यह निःसंदेह विरल संयोग है कि मात-पिता से सखी सखा तक हमे जो भी मिले अव्वल मिले । नो रिग्रेट्स-नो कंप्लेंट !!

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साभार – #बादल_सरोज

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