स्थाई क्रूरता जो अगले युद्ध की भूमिका तैयार करती हैं इसी संदर्भ में कुमार अंबुज की यह कविता कुछ कहती है.

हमें सत्ता और उसके लिए युद्ध को देशभक्ति के नजरिए से देखने की आदत सी हो गई है लेकिन हम भूल जाते हैं इन युद्धों के साथ आती हैं बदहालियां बलात्कार एक स्थाई क्रूरता जो अगले युद्ध की भूमिका तैयार करती हैं
इसी संदर्भ में कुमार अंबुज की यह कविता कुछ कहती है.

नन्द कश्यप 

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धीरे-धीरे क्षमाभाव समाप्त हो जायेगा
प्रेम की आकांक्षा तो होगी मगर जरूरत न रह जाएगी
झर जाएगी पाने की बेचैनी और खो देने की पीड़ा
क्रोध अकेला न होगा वह संगठित हो जाएगा
एक अनंत प्रतियोगिता होगी जिसमें लोग
पराजित न होने क के लिए नहीं अपनी श्रेष्ठता के लिए
युद्ध रत होंगे, ओर तब आयेगी क्रूरता
पहले हृदय पर आएगी पर चेहरे पर न दिखेगी
फिर घटित होगी धर्मग्रंथों की व्याख्या में
फिर इतिहास में और फिर भविष्यवाणियों में
फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी
निरर्थक हो जायेगा विलाप
दूसरी मृत्यु थाम लेगी पहली मृत्यु से उपजे आंसू
पड़ोसी सांत्वना नहीं एक हथियार देगा
तब आएगी क्रूरता जो आहत नहीं करेगी
हमारी आत्मा को
फिर वह चेहरे पर भी दिखेगी
लेकिन अलग से पहिचानी न जाएगी
सब तरफ होंगे एक जैसे चेहरे
सब अपनी अपनी तरह से कर
रहे होंगे क्रूरता और सभी में गौरव का भाव होगा
वह संस्कृति की तरह आएगी
उसका कोई विरोध न होगा
कोशिश सिर्फ यह होगी कि
किस तरह वह अधिक सभ्य
और अधिक ऐतिहासिक हो
वह भावी इतिहास की लज्जा की
तरह आएगी
और सोख लेगी हमारी सारी करुणा और
हमारा सारा श्रृंगार
यही ज्यादा संभव है कि वह आए
और लंबे समय तक हमें पता ही न
चले उसका आना

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कुमार अम्बुज 

 
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