भूलना हिंसक होता है -नन्द कश्यप

नन्द कश्यप

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क्या फर्क होता है एक इंसान और इंसान में,
वैज्ञानिक कहते हैं दुनियाभर के मनुष्यों में
जेनेटिक असमानता दसमलव शून्य चार और पांच
से ज्यादा नहीं होती,
क्या फर्क होता है एक इंसान और इंसान में
कोई कह सकता है कि उसमें
भय प्रेम क्रोध दया संवेदना नहीं है
वो फराओ हो वो हिटलर हो
जिनके सर करोड़ों हत्याएं मढ़ी हों
उनकी भी प्रेयसी थी, और
अपनी प्रेयसी को अन्य से
हंसकर बातें करते देख उन्हें भी
ईर्ष्या हुई थी,नीरो ने तो
उसकी प्रेमिका से बात करने वाले
युवक की गर्दन ही उडवा दिया था,
हम सब भी ईर्ष्या करते हैं,
फिर क्या फर्क है इंसान और इंसान में कि
विषमता है कि मिटती नहीं
सभी प्रेम चाहते है
पर नफ़रत उफान पर रहती है,
सभी चाहते हैं शांतिपूर्वक रहना
लेकिन युद्धोन्माद और जय घोष
फिजाओं में गुंजायमान होता है
असल में मनुष्य तो सभी बराबर होते हैं
लेकिन उसके हांथ में सत्ता नहीं होती
सत्ता शब्द ही मनुष्य और मानवता
का निषेध है, क्योंकि सत्ता वर्ग विशेष की होती है
सभ्यताएं विकसित होती गईं,
सत्ता और क्रूर होती गईं
मनुष्य को वर्गहीन सत्ता की जरूरत
महसूस होने लगी
उसने धर्म इजाद किए
उनमें दया करुणा प्रेम समर्पण
सभी डाले , फिर अचानक धर्म
की सत्ता स्थापित हो गई और
धर्म युद्धों से इतिहास के पन्ने के पन्ने
भर गए, इंसान ने फिर सबक लिया
इस बार उसने मुक्ति समता समानता
भाईचारे और जनतंत्र की बात की
इसके नाम से बनी दुनिया कुछ बेहतर
हुई, लेकिन हम सभी ने सामूहिक रूप
से समता समानता भाईचारे मुक्ति और जनतंत्र
को भुला दिया और उपभोग को लक्ष्य
बना लिया , और इस बार दुनिया
हां
फराओ और हिटलर के दौर से
भी ज्यादा खतरनाक हो गई
क्योंकि भूलना कभी कभी
सर्वाधिक हिंसक हो जाता है

*

नंद कश्यप

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