Want create site? Find Free WordPress Themes and plugins.

24.7.17

लेख: कोसो होड़ी लंकाकोट कोयमुरी दीपा .

बस्तर दशहरा दंडकारण्य की गोंडी भाषा के अनुसार विश्लेषण। बस्तर को कुछ इतिहासकार दंडकारण्य के नाम से संबोधित किये हैं लेकिन यह कोई नहीं बताये कि आखिर दंडकारण्य क्यों कहा जाता था??? कुछ गपी किस्म के लेखक कोई दंडक नामक राक्षस की राज्य का उल्लेख कर उसे यू ही बदनाम कर देते हैं जैसे वे उस समय जीवित थे…. ऐसे ही कई ऐतिहासिक जानकारियों को तोड़ मरोड़ के पेश कर वास्तविक इतिहास पर पर्दा डाल कर निजी स्वयंभू बनने की स्वांग मात्र है। दंडक कोई राक्षस नहीं थे यहां के जनजातीय समुदाय के पुरखा ही थे। दण्डक शब्द डांड शब्द की अपभ्रंश शब्द है। डांड पेन होता है। पेन मतलब कोयतुर समुदाय के दक्ष शक्तिशाली पुरखा जो वेन रूप से खत्म होकर प्राकृतिक ऊर्जा को संचयित कर पेन रुप में उनके वेन वंश के हाथों से विभिन्न विशेष आकार प्राप्त कर वेन गंगा को मार्गदर्शन सहयोग करते हैं। डांड पेन विशेष पेन होते हैं।इनकी प्रमुख कार्य नार की रक्षा करना होता है। दंडकारण्य जिसे लंकाकोट के नाम से कोयतुर जानते थे/हैं । दंडकारण्य नाम बाहय आक्रमणकारियों द्वारा दिया गया नाम है क्योंकि जब ये आक्रमण कारी लंकाकोट में प्रवेश करने की कोशिश किये तो इनका मुकाबला इन्ही डांड राव पेनों से हुई। डांड राव पेनों से परास्त होकर ये वापस हो गये तब से इस क्षेत्र को डांड का जंगल वाला छेत्र कहने लगे । जो उनकी भाषा में जंगल को अरण्य कहते थे। डांडअरण्य उनकी जिव्हा के लिये मुश्किल थी इसलिए वे उसे दंडकारण्य पुकारने लगे। दंडकारण्य नाम कोई जनजातीय पीटो पाटा रेला लोकजीवन लोकगीत में ही नहीं समुदाय के पेन व सियान भी नहीं जानते हैं ना मानते हैं। हां लंकाकोट को पेन पुरखा, पीटो पाटा, रेला, लोकगीत में अवश्य उल्लेख होती है। डांड पेन को रावपेन, रावेन, दंड मुहान आदि नाम से जानते हैं। वर्तमान में भी डांड पेन पूरे कोयतुर नार में अवस्थित हैं। इस पेन का नियंत्रण माटी गायता के पास होती है। यह बहुत ज्यादा शक्तिशाली पेन होते हैं। यह तो हुई डांड पेन दंडकारण्य की जानकारी।

अब चलते हैं लंकाकोट की दस रावपेन, पाट पेन, सात बहनी तेलगिन, कन्या कोडो, भैरमपेन, बुढाहल पेन, भूमयार्क पेन की हजोर जतरा अर्थात लंकाकोट की दशहरा की ओर। इस हजोर जतरा की सुरूआत पाट पेन जतरा से होती है। यह जतरा आषाढ़ अंधियारी अमुश तिहार के दिन से होती है। पाट पेन मतलब उस राज की प्रमुख बुढाहल पेन/ भैरमपेन/डोकरा पेन है। पाट पेन ही लंकाकोट की प्रमुख पेन हैं जो उन छेत्रों की सांस्कृतिक सामाजिक व कार्मिक क्रियाकलापों को पूर्ण रूप से निर्धारित निर्देशित व नियंत्रित करती हैं।इनका प्रमाण प्रत्येक नार में उसकी प्रत्येक नेंग में स्पष्ट दिखाई देती है। पाट पेन व जिम्मीदरिन आया/ गंगा दाई / सात बहनी तेलगिन दोनों से हजोर जतरा के लिये बुमकाल के सिरहा, वड्डे, गायता, पेन मांझी, वेन मांझी की उपस्थिति में अनुमति माँगने के लिए ही आषाढ़ अमुश के दिन सेवा अर्जी की जाती है ताकि जतरा निर्विध्न रूप से सम्पन्न किया जा सके। सेवा अर्जी के रूप में पाट पेन को एक काटा खैरी( बोकरा) एवं जिम्मीदरिन/गंगा दाई को मोंगरी मछरी की सेवा फूल अर्पित की जाती है। यह नेंग चार रेंगना में ही दी जाती है। इसी दिन को पाट मावली/ जिम्मीदरिन याया के लिए बनाया जाने वाला ठाट जिसे रथ कहते हैं बनाने हेतु पहली साल लकड़ी की सेवा अर्जी की जाती है। इसी दिन से हजोर जतरा की नेंग दस्तूर आरंभ हो जाती है। इसके बाद डेरी गढ़ाई, बारसी उतारनी आदि नेंग की जाती है।

क्रमशः जारी….

लेख: *कोसो होड़ी लंकाकोट कोयमुरी दीपा*

Did you find apk for android? You can find new Free Android Games and apps.