संतोष झांझी आज दस्तक मे मेरी कविताएँ

पिनकुश
*
मै एक पिनकुशन हूँ
सिर्फ एक पिनकुशन
पैदा होते ही
बिंधने लगे
लड़की होने के पिन
जरा कद बढाया
लड़के वालो की नापसंदगी शंका कुशंकाओ के पिन
चुभने लगे
दुल्हन बनी
कम दहेज के पिन
अच्छी बहू होने न होने केपिन
माँ न बन सकने के पिन
माँ बनी तो बेटियाँ जनने के पिन
सही पत्नी सार्थक माँ बनने केपिन

विधवा होने परबिधते
पति खा जाने केअसंख्य पिन
हरपल बिंधते बिंधते
पूरा बिंध चुका पिनकुशन
पर अभी भी पिन बचे है
बिंधने को
अच्छी सास होने नहोने के
पोते पोतियो की परवरिश न कर पाने के
बूढी और बेकार होजाने के पिन
**
2- 
जब औरत एक बेटी थी
थी नजरबंद
कैद थी वह कई जोड़ी आंखो मे
शर्तो की डोर से बंधी
मजबूर/आगेपढना है तो/एकचोटी करनी होगी/ खिडकी खोली तो/सजा मिलेगी
परदा नही हटाना
नजोर से हंसना
नजोर सेगाना है

बिना खिडकी खोले
धूप का एकाध टुकड़ा
पतानही कहां से कभी उसकी आँखोमे
कभीबालो मे चमकता
कभीगालों को दहकाता
पता नही कैसा घुस आता था
जेल तोड़ कर
हवा चुपके से
तीरसी आकर
उसके बालो को छेडकर
अठखेलियां करती
भाग जाती
चाँदकीशीतल किरणे
पतानही कहां से आकर
चुपके से गुदगुदा जाती
शबनम रात को सोतेमे
चुपके से उसके होठो
पलको कोचूमकर
चल देती दबे पांव
कोयल गा उठती
उसके कंठ मे सारी वर्जनाएं नकार
उसके कंठ मेछुपी
हंसी की किलकारियां
खिलखिला उठती
वह आशाभरी हंसीथी
आशाथी यह द्वार खुलेगा
खुल जायेगे सारे वातायन
नही रख पायेगे
उसे पिजरें मे अधिक दिन
उसे स्वयं उडा देगे
पिजरे से
एकदिन पिजराखुला
उसने खुशी से पंख तोले
पर यह क्या
सामने था दूसरा पिंजरा
सुनहरे रंग का उसे पकड उसमे बंद कर दिया गया
अब औरत बहू थी
पत्नी थी
कई जोड़ी आँखे थी उसे घूरतीसर से पांव तक
सर ढको
नजरे नीचे करो
बहस नही
धीरे बोलो धीरे हंसो
धीरे चलो पर हाथ जल्दी चलाओ
बच्चे जनो बेटियांनही
बेठे जनो
अब औरत माँ थी
विधवा माँ
उम्र की थकानसे निढाल
एक अदृश्य पिजरे मे कैद
सुबह से रात तक
लगातार चलती
वजूद न पहले था न अब
माँ कभी नही थकेगी
औरत कभीनही थकती
उसकी आँखे
उस अदृश्य पिंजरेमे
वातायन तलाशती
अंतिम समय
वातायन न मिला तो?
शायद पिजरा खुलापाकर भी
उडना याद न रहे
या थकेथके पंख ही
उड़ न पाये

**‬: 3—गीत तुम्हारी दस्तक

तुम्हारे खयालों मे डूबी
हरपल इंतजार करती हूँ
तुम्हारे आने का
तुम्हारे खूबसूरत मुखड़े को याद करते
गुनगुनाते गाते
झपकी सी लग जाती है
परजब तुम्हें नही आना होता
तुम नही ही आते
और कभीकभी
भीड़ भाड़ मेअचानक
बेवक्त आकर
गुदगुदाने लगते हो

और कभी जब मै
थकान से चूर
गहरी नींद की आगोश मे होती हूँ
आधी रात को
किसी जिद्दी बच्चे कीतरह
देने लगते हो दस्तक
मै उनीदी सी
अनसुना करना चाहतीहूं
पर तुम्हारी तेज दरतेज
दस्तक के समक्ष
निस्फल होजाते है मेरे सारे प्रयास
और मै कलम उठा
रोशनी मे नहाकर
तुमसे बतियाने बैठ जाती हूँ

 

**-उसका श्रवणकुमार

घाट पर सीढ़ियोंके पास
वह कांपते हाथो से
थामे लाठीऔर एक गठरी
सुबह से था बैठा

दोपहर होते होते थक चुका था वह
बतियाते और बताते
उसका श्रवणकुमार उसे लाया है
कुम्भ स्नान के लिये

अंधेरा घिर आया
धीरेधीरे सूना हो चला घाट
वह थकान और भूख से निढाल
लेट गया था
सर के नीचे रख गठरी
शंकित था मन
बच्चा किसी विपत्ती मे न हो कहीं
धुंधवाती आँखोपर हाथ धरेदेखता दूर तक
नही कोई नही

सूर्योदय से पहले नीम अंधेरे
जमीन पर पड़े
उसे ठिठुरते देख ठंड मे
भिखारी समझ
पैसे फेक कर जा रहे है लोग
डूबती टूटती सांसो के बीच
वह अब समझ चुका है
नही लौटेगा उसका श्रवणकुमार
उम्र के बोझ से थके
बूढे को छोड़ गया है मेले मे हमेशा के लिये
***

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