राष्ट्रपति से बस्तर में आईजी कल्लूरी पर अपराधिक प्रकरण दर्ज करने तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग

प्रेस विज्ञप्ति

राष्ट्रपति से बस्तर में आईजी  कल्लूरी पर अपराधिक प्रकरण दर्ज करने तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग

बस्तर में कानून व्यवस्था माओवाद उन्मूलन के नाम पर पुलिस की बंधक बनकर रह गई है. बस्तर आईजी एस आर पी  कल्लूरी का दुस्साहस लगातार बढ़ता जा रहा है. ताजा मामला कल्लूरी के कुत्सित दुस्साहस का एक और उदहारण है जिसमे माओवादियों द्वारा एक आदिवासी की हत्या में सम्मानित राजनैतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओ के शामिल होने का आरोप लगाकर अपराध पंजीबद्ध कर दिया गया है.
 दिनांक 4 नवम्बर को बस्तर के  दरभा ब्लॉक के कुम्मकोलेंग के एक ग्रामीण सामनाथ बघेल की शुक्रवार रात नक्सलियों ने की हत्या कर दी. लेकिन इस मामले में सामाजिक और राजनैतिक कार्यकर्ताओ  नंदिनी सुन्दर प्रोफेसर जेएनयू , अर्चना प्रसाद डीयू, संजय पराते सीपीएम राज्य सचिव, विनीत तिवारी दिल्ली, मंजू कवासी सरपंच गुफडी और मंगल राम कर्मा के खिलाफ 302, 120B, 147, 148, 149 ,452 तथा 25, 27 आर्म्स एक्ट के तहत अपराध दर्ज किया गया है.
इनके खिलाफ अपराधिक प्रकरण दर्ज करने की मूल वजह यह है कि इन्होने आईजी कल्लूरी के अत्याचारों के खिलाफ आवाज सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक उठाई है. बस्तर में अब सिर्फ और सिर्फ एक पुलिस अधिकारी आईजी शिवराम प्रसाद कल्लूरी का राज चलता है जिसका इस देश में अब कोई कुछ नही बिगड़ सकता. कल्लूरी अपने आपको मुख्यमंत्री, प्रधानमन्त्री और अब सुप्रीम कोर्ट से उपर समझते है. वजह बड़ी स्पष्ट है क्योंकि कार्पोरेट घरानों के साथ मेलजोलकर कल्लूरी राज्य और केंद्र सरकार को यह सन्देश देने में सफल हो गये हैं कि माओवाद का उन्मूलन इस देश में अब वे ही कर सकते है. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह कल्लूरी के सामने आत्म समर्पण कर ही चुके है और प्रधानमन्त्री से हाथ मिलाकर प्रोटोकाल तोडकर उन्हें यह सन्देश में सफल हो गये है कि उनको बस्तर से हटाने की जुर्रत भी ना करे.
यू तो कल्लूरी के आदिवासियों और सामजिक कार्यकर्ताओं पर दमन की लम्बी फेहरिस्त है लेकिन हाल के दिनों की ही स्थिति का वर्णन करना काफी होगा.
* दिनांक 21 अक्तूबर को सीबीआई ने नंदिनी सुंदर की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में अपनी एक रिपोर्ट पेश की थी, जिसके मुताबिक साल 2011 में ताड़मेटला गांव में विशेष पुलिस अधिकारियों ने 252 आदिवासियों के घर जला दिये थे.
*  दिनांक  23 अक्तूबर को इस मामले में कल्लूरी ने साफ बयान देते हुए राज्य शासन और सुप्रीम कोर्ट को चुनौती दी थी कि यह कांड उनके नेतृत्व में हुआ था और जो भी कार्रवाई करना है तो मेरे खिलाफ करो. लेकिन कल्लूरी के खिलाफ सरकार कोई कार्रवाई नही कर सकी.
* दिनांक 24 अक्तूबर बस्तर के 7 जिला मुख्यालयों में कल्लूरी के आदेश पर नंदिनी सुंदर के साथ साथ सामाजिक-राजनैतिक  कार्यकर्ताओ  सोनी सोरी, हिमांशु कुमार, बेला भाटिया, मनीष कुंजाम का पुतला दहन पुलिस कर्मियों ने  किया. छत्तीसगढ़ के इतिहास में पुलिस द्वारा इस तरह बगावत की पहली घटना थी लेकिन कुछ आदिवासी आरक्षको के खिलाफ कार्रवाई कर कल्लूरी के खिलाफ कोई कार्रवाई करने की हिम्मत राज्य सरकार नही जुटा पाई.
* यही नही 28 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की ओर से ताडमेटला कांड में सुनवाई के दौरान नलिनी सुंदर जैसी सामजिक कार्यकर्ताओं को बस्तर प्रवेश पर प्रतिबन्ध की मांग भी कर दी गई.
* इस बीच दिनांक 31 अक्तूबर को सुकमा जिला के पोलमपल्ली निवासी सहायक आरक्षक कलमू हिडमा का माओवादियो ने अपहरण कर लिया लेकिन उसका 8 दिनों बाद भी कोई सुराग पुलिस नही लगा पाई बल्कि इसके उलट गाँव के ही 25 लोगों को पुलिस ने थाने में बंधक बनाकर रख दिया है.
* आज तक किसी भी बड़े माओवादी नेता को कल्लूरी की पुलिस ना तो गिरफ्तार कर सकी और ना ही मार सकी, लेकिन निर्दोष आदिवासियों को फर्जी मुठभेड़ में सैकड़ो की तादात में मार दिया गया है.
जाहिर है आईजी कल्लूरी का अब बस्तर में निर्बाध राज चल रहा है, बस्तर को अब खतरा माओवाद से कम और कल्लूरीवाद से ज्यादा है. बस्तर में आईजी कल्लूरी के नेतृत्व में आदिवासियों सहित सामान्यजनो पर  अत्याचार, अपराध, हत्या, अपहरण, बलात्कार की घटनाये लगातार बढ़ रही है और विरोध करने वालों को फर्जी एनकाउंटर में या तो मारा जा रहा है या माओवादी बताकर जेल में कैद किया जा  रहा है. आखिर कल्लूरी जैसे पुलिस वर्दीधारी अपराधियों का राज कब तक चलेगा ? आदिवासियों का रक्तपात कब तक चलेगा ? क्या सरकार आदिवासियों के सर्वनाश के लिये कृत संकल्पित है ?  क्या बस्तर को कार्पोरेट के इशारे पर सीधे सीधे आदिवासियों का समूल नाश करने के लिए खुली छूट दे दी गयी है ? बस्तर बचाओ संयुक्त संघर्ष समिति इन प्रश्नों का जवाब मांगते हुए राष्ट्रपति से बस्तर में आईजी कल्लूरी पर अपराधिक प्रकरण दर्ज करने तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग करती है.

* सोनी सोरी – आम आदमी पार्टी  * अरविन्द नेताम – सर्व आदिवासी समाज छत्तीसगढ़ * नवल सिंह मंडावी – छत्तीसगढ़ गोंडवाना समाज * सुनउराम नेताम – आदिवासी कल्याण संस्थान छत्तीसगढ़ * संजय पराते – मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी *  सौरा यादव – भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (ML) रेड स्टार * विजेंद्र तिवारी –  भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ML लिबरेशन * कमल शुक्ल –  बस्तर पत्रकार संयुक्त संघर्ष समिति * सुधा भारद्वाज – पीयूसीएल छत्तीसगढ़ * कलादास डहरिया – छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (मज़दूर कार्यकर्ता समिति) * आलोक शुक्ला -छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन * रिनचिन – छत्तीसगढ़ महिला अधिकार मंच *  जनकलाल ठाकुर – छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा * जीतगुहा नियोगी – जनमुक्ति मोर्चा *  विजय – भारत जन आंदोलन * व्ही एन प्रसाद राव – छत्तीसगढ़ क्रिश्चयन फेलोशिप * एपी जोसी – छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फोरम *  दाउद हसन – जमात-ए-इस्लामी स्टूडेंट फेडरेशन * गोल्डी जार्ज – दलित मुक्ति मोर्चा * नन्द कश्यप – छत्तीसगढ़ किसान सभा * प्रभाकर ग्वाल – एसटी एससी ओबीसी मोर्चा

संकेत ठाकुर, संयोजक सदस्य
बस्तर बचाओ संयुक्त संघर्ष समिति, छत्तीसगढ़

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