फासीवाद विरोधी योद्धा ब्रेख़्त की कलम से

( अनुवाद गौहर रज़ा)

1⃣
कोई नहीं पूछेगा अख़रोट का दरख़त कब झूम उठा
पूछेंगे सरकार ने कब मज़दूरों को कुचल कर रख दिया

कोई नहीं पूछेगा कब नन्हें हाथोंने तालाब में चिकने पत्थर से ख़ूबसूरत लहरें उठाईं
पूछेंगे जंग की तैयारियाँ कब शुरू हुईं

कोई नहीं पूछेगा हुस्न कब कमरे में दाख़िल हुआ
पूछेंगे अवाम के ख़िलाफ़ साज़िशें कब रची गईं

नहीं कहेंगे के वक़्त बुरा था
पूछेंगे तुम्हारे फ़नकार क्यों ख़ामोश थे
(अनुवाद गौहर रज़ा)

2⃣
उनका दल
सिर्फ़ साज़िशों के बल पर नहीं
जनवाद के कंधों पर सवार
सत्ता तक पहुँचा
उनका दल, अचानक,
सब से बड़ा दल था
गद्दी तो मिलनी ही थी,
बहुतों ने जनवाद के ख़िलाफ़ मत दिया
क्यों कि वो जनवादी थे
और ऐसे भी थे
जिन्हों ने कहा सब चोर हैं
इन्हें मौक़ा नहीं मिला
मौक़ा दो परख तो लो
और चरवाहे से नाराज़ भेड़ों ने
क़साई को मौक़ा दे दिया
(अनुवाद गौहर रज़ा)

3⃣
जो लड़ता है, वह हार सकता है । जो लड़ता नहीं, वह पहले ही हार चुका है।

4⃣
पहली बार जब ख़बर आई कि हमारे दोस्तों का क़त्ल किया जा रहा है , हाहाकार के स्वर उठे । लेकिन जब एक हज़ार मारे गए और हत्याओं का यह सिलसिला रुका नहीं , चारो ओर ख़ामोशी छा गई । जब दुष्टताएँ वर्षा की तरह गिरने लगती हैं , उन्हें कोई नहीं रोकता । जब अपराध इकट्ठा होने लगते हैं , वे नज़र आना बंद हो जाते हैं । जब पीड़ाएँ असहनीय हो जाती हैं, सिसकियाँ सुनाई नहीं देतीं । सिसकियाँ भी ग्रीष्म की वर्षा की तरह गिरने लगती हैं

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