रामेश्वर दास वैष्णव के गीत और छत्तीसगढ़ी गज़ल

दस्तक में आज प्रस्तुत .
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गीत
कोई धर्म नहीं है

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जिसमें भला हो खुद का वो सत्कर्म नहीं है.
इंसानियत से. श्रेष्ठ कोई धर्म नहीं है.
भूखा हो जब पड़ौसी तो खाना हराम है.
रोते हुए मुहल्ले में गाना हराम है.
सबकी खुशी में अपनी खुशी देखे जो सतत.
दुख दूसरों का दूर करे
नित्य अनवरत.
नंगा है वो आंखों में जिसकी शर्म नहीं है……
स्वामी है दरअसल वही जो कि फकीर है.
मंजिल उसी के नाम है
जो राहगीर है.
जीता है जिसने विश्व को निश्चित वो वीर है.
जिसने स्वयं को जीता वही महावीर है.
जो नम्र है हमेशा मगर नर्म नहीं है…..
जो जात पात छेत्र, वर्ग सेभी है ऊपर.
पद,पुरस्कार याकि स्वर्ग से भी है ऊपर.
बस परोपकार के लिए जीवन लगा दिया.
ईश्वर है वो ऐश्वर्य को जिसने भगा दिया.
हरदम जो रहा अग्नि में पर गर्म नहीं है.
इंसानियत से श्रेष्ठ कोई धर्म नहीं है.
००००००.
गीत(२)
मुलाकात होगी जरूर

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सच्ची चाहत किसी के लिए है अगर.
उससे एक दिन मुलाकात होगी जरूर.
खुल के बोले न बोले लजाते अधर.
आंखों ही आंखों में बात होगी जरूर.
खर्च हो जायेंगे रास्ते में सपन,
जो बचा ही रहेगा वो विश्वास है.
आंख जब भी खुलेगी, लगेगा यही,
दूरियां मिट गईं,मंजिलें पास है.
कुछ न कुछ दे के जायेगा लम्बा सफर.
भाग्य में कोई सौगात होगी जरूर……
हम उड़ेंगे भले नित्य आकाश में,
एक दिन हमको धरती पे आना ही है.
उसको पत्थर कहो या कहो देवता,
फूल उसके सुपथ पर बिछाना ही है.
जो हृदय में बसा है सतत उम्र भर,
उसकी अपनी भी औकात होगी जरूर……
तुमको है ही पता, लापता वो नहीं,ढूंढ़ना उसको फिरभी बड़ी बात है.
वो है सूरज मगर हमको दिखता नहीं,
क्योंकि चारों तरफ रात ही रात है.
फिर से होगी सुबह,देख लेना असर,
पथ में किरणों की बरसात होगी जरूर.
०००
(१) गजल
०००००००
ऐसी कोई रात नहीं है.
जिसके बाद प्रभात नहीं है.
सूरज का रास्ता रोक ले,
मावस की औकात नहीं है.
हर अवसर है एक चुनौती,
मुफ्त मिली सौगात नहीं है.
भीतर की जो आग बुझा दे,
बाहर वो बरसात नहीं है.
अगर प्रेम से स्वीकारो तो,
दुख. कोई आघात नहीं है.
जो होगा अच्छा ही होगा,
यह खाली जजबात नहीं है.
०००
(२)गजल
०००००००

आज नहीं तो कल निकलेगा.
हर मसले का हल निकलेगा.
रोड़े स्वयं रास्ता देंगे,
चट्टानों से जल निकलेगा.
मेहनत से मत आंख चुराना, आखिर मीठा फल निकलेगा.
ऐसी आशा कभी न करना,
कि रस्सी से बल निकलेगा.
तुमको जो प्रेमी लगता है,
वो एक दिन पागल निकलेगा.
फल पर जिसकी नजर.नहीं है,
निश्चित वही सफल निकलेगा.
०००००००
(५)गीत/बने करे राम
००००००००००००००
बने करे राम मोला अंधरा बनाए.
आंखी मं देखे के दुख नइ धराए.
दिन रात मोर बर बराबर बनाए……
सुने हांवव दुनिया मं रंग रंग के चोर.
धुर्रा मं मनखे अउ गद्दी मं ढोर.
बड़े बड़े नेता उचाए हे देस.
रक्सा चरित्तर अउ साधू कस भेस.
ये सबके दरसन करे ले बचाए…..
रद्दा रेंगइया फोकट गोली खागे.
दाईज बिना नावा लछमी लेसागे.
बीच सहर तिरिया के अँचरा तिरागे.
रावन दुसासन के नीयत किरागे.

बड़े बड़े बीर खड़े आंखी लुकाए……
जिंहा लगे हावय सुआरथ के मेला.
धरथें अठन्नी ,धराथें अधेला.
अंधरा ला मोर कस दया सब देखाथें.
देथें, देवाथेंअउ रद्दा बताथें.
दाता के हिरदे.मं तैं खुद समाए……
कोनो कोनो कहिथे कि अय बाबूलाल.
होके अलाल तैं झड़कथस ग माल.
मैं ह कथंव सच का हे सुन ले सियान? आंखी मुंदाथे त खुलथे गियान.
दुनिया किंदर ले टिकिस बिन कटाए…..
बने करे राम, मोला अंधरा बनाए.
००००००००
(६)छत्तीसगढ़ी गजल
००००००००००००००
तोर सुरता मं संझा, बिहान होगे.
सरी रतिहा उसनिंदा मितान होगे.
मन के मालिक रहेंव मैं तोला देख के,
मोर जम्मों गरब ह पिसान होगे.
छोड़ देहस पोटारे बर तैं ह मोला,
ये समंझ के कि लइका सियान होगे.
एक आखर लिखे हंव अपन हिरदे मं,
मैं का जानंव कि सइघो पुरान होगे.
गोड़ उसले परे हे बिहा नाच बर,
मनसुभा के टिमकी ह निसान होगे.
तोर बिन मोर दुनिया मं कोनो नइए,
जिनगी भर मं बस अतके गियान होगे.
०००००००००००
लेखक का परिचय
००००००००००
(१) पूरा नाम- रामेश्वर दास वैष्णव
(२)जन्म तिथि/ स्थान-१/२/१९४६ खरसिया
शिक्छा- एम.ए.( अंग्रेजी), पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन ट्रांसलेशन.
(४) विधा- गीत,गजल ,ब्यंग्य.
(५)कृ तियां- ग्याह पुस्तकें,तीन छत्तीसगढ़ी काब्य संकलन, तीन हिन्दी ब्यंग्य संकलन, तीन हिन्दी गजल संकलन,एक लम्बी छत्तीसगढ़ी कविता एवं एक स्वयं पर.
(६) अब तक पन्द्रह छत्तीसगढ़ी फिल्मेां में गीत, संवाद एवं पटकथा लेखन,एत फिल्म में अभिनय.
(७) संप्रति- सेवानिवृत्त सहायक प्रबंधक,डाक वस्तु भंडार,रायपुर.
(८) पता- 2o5 प्रोफेसर कालोनी, सेक्टर१, सड़क३, रायपुर(छत्ती०)492oo1
फोन- o771-,2272789
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