* नन्द कश्यप

90के दशक सोवियत यूनियन के बिखराव के बाद विश्व पूंजीवाद ने अपने विजय की डुगडुगी बजाते हुए नए वैश्विक परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र संघ के व्यापार समझौते को जिसमें राष्ट्रों की स्वायत्तता अक्षुण्ण थी की जगह परस्पर निर्भर वैश्विक बाजार की अवधारणा को डंकल प्रस्ताव के रूप में पेश किया जिसके विरोध में दो बार भारत बंद हुआ।उस समय भाजपा बंद में शामिल थी, अंततः चिदंबरम साहब चुपचाप जाकर डंकल प्रस्ताव पर सहमति के हस्ताक्षर कर दिए, फिर विश्व व्यापार संगठन में नरसिम्हा राव सरकार ने शामिल होने सहमति दे दी.
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वैश्वीकरण के रूप में जनता को काफी सपने बांटे गए, पश्चिम का मरणासन्न बाजार भारत में आकर संजीवनी पा गया। हमारे पास मोटरसाइकिल कार टीवी सहित उपभोग की असीमित चीजें आ गई, ऐसा लगा जैसे संपन्नता हरेक घर पहुंच गया, लेकिन बहुत जल्दी ही किसान आत्महत्याएं करने लगे, बेरोजगारी बढ़ने लगी, बाजार सुस्त पड़ने लगे,पांचवें वेतन आयोग से बाजार रौनक हुए, कुछ पद समाप्त कर दिए गए, बेरोजगारी फिर बढ़ी, किसानों की आत्महत्याओं की रफ्तार बढ़ गई,

स्वामीनाथन आयोग बना, उसकी सिफारिशों को प्रचारित खूब किया गया, लागू नहीं किया गया, क्योंकि किसान वादों में वोट देने का आदि था,इस बीच छठे वेतन आयोग ने संगठित मजदूरों के वेतन में बढ़ोतरी तों किया लेकिन फिर कुछ पद समाप्त कर बेरोजगारी बढ़ने दिया, किसानों की आत्महत्याएं बदस्तूर जारी रहीं।

इसी बीच अमेरिका में सब प्राईम संकट, यानि लोगों की क्रयशक्ति इतनी कम हो गई कि वे जिन घरों के लिए क़र्ज़ लिया था उसे पटाने की हालत में नहीं थे, क़र्ज़ थोड़ा बहुत नहीं था, खरबों डॉलर का था, इसके कारण अमेरिका का सबसे पुराना और बड़ा बैंक दिवालिया हो गया, उसके साथ अन्य बैंकों का भसकना योरोप तक पहुंच गया,भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक बच गए, किसानों की बदौलत भी, इससे दो साल पहले अमेरिका का बड़ा तेल और गैस तथा बिजली कंपनी एनरान सात साल तक झूठे लाभ दिखाते हुए कंपनी के मालिकों के खातों में जनता का धन लाभांश के रुप में डालती रही,और अचानक बैंकों का कर्ज न पटाने के कारण दिवालिया हो गई,ये सब कुछ वैश्वीकरण के दौर में हों रहा है,
बहुत से विश्लेषण आने शुरू हुए बढ़ते विषमताओं के, बेरोजगारी गरीबी के, लेकिन वैश्विक बाजार एक-समान कराधान प्रणाली के लिए दबाव बनाता रहा और आज तक दुनिया के 145देशों में यह प्रणाली लागू है, अमेरिका ने लागू नहीं किया है.

कोई भी देश इस प्रणाली को बहुत सफल कहने की हालत में नहीं है.

लेकिन इस कर प्रणाली के पीछे के जो तर्क है वह पूरी तरह से जनता को कर चोर कहते हैं, इसलिए करों को न स्थानीय निकाय और न ही राज्य सरकारों के अधीन रखने देना चाहते,उनका तर्क है एक जगह रेवेन्यू जमा हो उसका उद्योगपति उपयोग करें,तभी विकास होगा, स्थानीय निकाय या राज्य सरकारें विश्व बैंक या एशियन डेवलपमेंट बैंक के अनुसार कारपोरेट जरूरत के अनुरूप धन खर्च करें, जीएसटी इसलिए आया है न कि जनता की आजादी के लिए जिसका जश्न मनाने की तैयारी है.

खैर इस बीच एक और बात हुई, विषमताओं के आंकड़ों ने अमेरिका तक के राष्ट्रपति को अमीरों पर अधिक कर लगाने के नाम से वोट मांगने मजबूर कर दिया,और फिर2014में वाम रुझान वाले फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थामस पिकेटी की किताब Capital of 21’st century आई जो उस वर्ष सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली किताब रही,आज भी उस पर बहसें होती हैं,600पृष्ठों की इस किताब में सन 1700से जब मशीनों का उपयोग शुरू हुआ और संगठित बाजार और आर्थिक विकास जैसे शब्द आए तब से लेकर आज तक पूंजी/संपत्ति के केन्द्रीकरण पर काफी शोधपरक आंकड़े जुटाए हैं,पूंजी के संकेन्द्रण उसके कारणों और तरीकों तथा विकल्प के विश्लेषण पर असहमतियों के बावजूद इस पर पर्याप्त प्रतिक्रिया हुई।आज निर्मित विषमताओं पर पिकेटी लिखते हैं

यदि विषम विकास की दिशा में ऐसे ही आगे बढ़ते रहे तो यह पुश्तैनी पूंजीवाद की वापसी होगी, जहां अमीर सिर्फ इसलिए अमीर होंगे क्योंकि उन्हें वह अपने पुश्तों से मिला, जहां संपत्ति और आमदनी की भयावह विषमता होगी,पिकेटी इसका हल बताते हैं दस लाख डालर से अधिक पर 80%टेक्स लगाना और वैश्विक स्तर पर संपत्ति कर की व्यवस्था करना

(The direction of travel is thus towards a return of “patrimonial capitalism “marked by ‘terrifying inequalities of wealth and income ,where the rich are rich largely because they have inherited large fortunes .Picketty ,suggested solution is an 80℅tax on $1million and a global wealth tax)

यद्यपि विषमताओं के भयावह आंकड़े पहले से आ रहे थे, लेकिन वो मार्क्सवादियों के समाजवादी विकल्प के साथ आ रहे थे, लेकिन पिकेटी इसी व्यवस्था में सुधार की बात करते हैं,वो इसमें मजदूर वर्ग की भूमिका को कमतर आंकतें है, लेकिन जैसे ही हल के लिए 80%कर लगाने की बात करते हैं और वैश्विक स्तर पर संपत्ति कर लगा विषमताओं पर नियंत्रण की बात करते हैं, दुनियाभर के कारपोरेट आगबबूला हो उल्टे जनता पर तोहमत लगा उन पर कर चोरी का आरोप लगाते है और फिर पूरी बेशर्मी के साथ कारपोरेट मीडिया कैम्पेन चलाता है कि बड़े कारपोरेट पर कर बढ़ाना ग़लत कदम है, अधिक से अधिक जनता को कर दायरे में लाओ और विकास के लिए कारपोरेट टेक्स कम करो,इसी अभियान के तहत पहले मोदी आए और फिर ट्रंप,.

इनकी नजरों मे जनता पर टेक्स लगाना सबसे पवित्र काम है इसीलिए आज आधी रात को ये कारपोरेट के चाकर जश्न मनाने जा रहे