जनता के धन का चौकीदार कोई नहीं -जेके कर

जनता के धन का चौकीदार कोई नहीं

 

* जेके कर

जनता के धन की खूली लूट जारी है उसे रोकने वाला कोई नहीं है. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में जमा जनता की गाढ़ी कमाई के पैसे का उपयोग नैगम घराने कर रहें हैं तथा जब उसे लौटाने की बात आती है तो वे दगा देकर उड़नछू हो जाते हैं. विजय माल्या जब बैंकों के 9 हजार करोड़ रुपये लौटाने की बारी आई तो देश के भाग खड़े हुये लेकिन ऐसे कई हैं जो देश में ही हैं. यूपीए के राज में बैंकों के गैर निष्पादित संपत्ति 2.30 लाख करोड़ रुपयों की थी जो पिछले तीन साल में बढ़कर 6.80 लाख करोड़ रुपयों का हो गया है. देखा जाये तो मोदी राज में बैंकों की गैर निष्पादित संपत्ति बढ़कर करीब तीन गुना हो गई है. यह वह कर्ज है जो बैंक बड़े घरानों से वसूलने में असफल रहें हैं.

जहां तक कर्ज की बात है अकेले अडानी की कंपनियों ने ही बैंकों से 72 हजार करोड़ का कर्ज ले रखा है जिसमें से ज्यादातर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का है. दूसरी तरफ देश के सारे किसानों द्वारा फसल के लिये गये कर्ज 75 हजार करोड़ रुपये का है जो कृषि अर्थव्यवस्था तथा खाद्य सुरक्षा के लिये आवश्यक है.

मोदी सरकार के सत्तारूढ़ होने के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने अडानी की दो पॉवर कंपनियों को 15 हजार करोड़ रुपयों का नया कर्ज प्रदान किया है तथा पुराने कर्ज को चुकता करने की सीमा दस सालों के लिये बढ़ा दी गई. अडानी की कंपनियों को जो नया 15 हजार करोड़ रुपयों का कर्ज दिया गया है उसे चुकाने की क्षमता उन कंपनियों की नहीं है. कम से कम उन कंपनियों के बैलेंस शीट से तो यही जाहिर होता है.

इसी तरह से मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाली रिलायंस गैस ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड को 4 हजार 500 करोड़ का कर्ज दिया गया तथा पुराने कर्ज को लौटाने का समय दस सालों के लिये बढ़ा दिया गया. 15 लाख करोड़ रुपयों की संपदा वाले मुकेश अंबानी समूह को 4 हजार 500 करोड़ का नया कर्ज दिया जा रहा है जिससे वह पुराने कर्ज चुकता करेगा जबकि देश के किसान जहर खाकर या खेत के पेड़ पर लटककर अपनी जान देने को मजबूर हैं. काश, हमारे देश के किसानों तथा छोटे उद्योगपतियों पर भी यह दयानतदारी दिखाई गई होती तो देश की माली हालत कुछ और होती.

राजनीतिक अर्थशास्त्र के नजरिये से देखें तो कर्ज छोटे-छोटे किसानों तथा व्यवसायी को देना चाहिये. इससे उन्हें अपने कृषि तथा व्यापार को चलाने में मदद मिलेगी तथा वे अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकेंगे. जब ये लोग खर्च करेंगे तो जिनकी संख्या दसियों करोड़ से भी कई गुना ज्यादा है तो देश का आंतरिक बाजार फलने-फूलने लगेगा. जिसका फायदा अंत में देश की अर्थव्यवस्था को ही होने वाला है.

अब लाख टके सवाल है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से नैगम घरानों को जो कर्ज दिया जा रहा है वह किसका पैसा है. जाहिर है कि वह नौकरीपेशा वर्ग, छोटे और मध्यम दुकानदार व्यवसायी, चिकित्सक, इंजीनियर तथा मेहनतकश जनता का है. बैंकों में यह पैसा इसलिये रखा जाता है कि वह सुरक्षित रहे तथा उस पर ब्याज मिले. गौर करने वाली बात है कि पिछले तीन दशकों से बैंकों में रखे धन पर मिलने वाले ब्याज को क्रमशः कम किया जा रहा है.

दूसरी तरफ बैंकों की बढ़ती गैर निष्पादित संपत्तियों के साथ जिसे खराब कर्ज माना जाता है जनता का इतना ही पैसा डूबने जा रहा है. यदि बैंकों के इस डूबते हुये धन पर लगाम नहीं लगाई गई तो आखिरकार हमारे देश के बैंक भी साल 2008 के अमरीकी तथा यूरोपीय बैंकों के समान धराशायी हो जायेंगे.

इतना ही नहीं है कि बैंकों की गैर निष्पादित संपत्ति बढ़ रही है. बल्कि देश के सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को घाटे के नाम पर बेचा जा रहा है. ताजा उदाहरण एयर इंडिया का है. जिस पर 46 हजार करोड़ रुपयों का कर्ज है. समाचारों के हवाले से खबर है कि इसे बेचने के लिये टाटा समूह से बात चल ही है. यदि युधिष्ठिर से यक्ष यह सवाल पूछता कि इयर इंडिया का क्या करना चाहिये तो शायद उसका जवाब होता कि अडानी से कर्ज वसूसकर उसे एयर इंडिया को दे दिया जाये.

जवाहरलाल नेहरु के समय में सार्वजनिक क्षेत्र को मजबूती प्रदान की गई थी ताकि आजाद भारत में आधारभूत संरचना का निर्माण किया जा सके. बाद में कोयले की खदानों तथा बैंकों का सरकारीकरण किया गया. अब फिर से उलटी हवा चल रही है. कोयले की खदानों का पिछले दरवाजे से निजीकरण किया जा रहा है तथा बैंकों को भी निजी हाथों में सौपने की तैयारी है.

जवाहरलाल नेहरू ने देश के योजनाबद्ध विकास के लिये पंचवर्षीय योजना शुरु की थी तथा योजना आयोग का इसके लिये गठन किया गया था. मोदी सरकार ने इस योजना आयोग को भंग करके नेशनल इंस्टीट्यूट ऑर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (निति आयोग) का गठन किया. इस निति आयोग ने केन्द्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के 74 कंपनियों का निजीकरण करने या उन्हें बेचने का सुझाव दिया है. इसमें छत्तीसगढ़ के नगरनार का एनएमडीसी भी शामिल है. अभी यह संयंत्र बन ही रहा है कि इसकी विनिवेशीकरण की खबर आ रही है.

देश के सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां दरअसल जनता की संपत्ति है. जिसकी देखभाल सरकार के जिम्मे है. यदि एक-एक करके इन्हें निजी हाथों में बेच दिया गया तो देश के पास क्या बचा रह जायेगा? इसीलिये तो सवाल किया जा रहा है कि जनता के धन की चौकीदारी कौन करेगा जो बैंकों में जमा है तथा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में लगी हुई हैं?

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