विकलांग श्रध्दा का दौर है इस समय – चौथीराम यादव

जाति के दायरे का हर विमर्श ब्राहमणवाद है, मनुष्य केन्द्रित विमर्श ही जातिगत शोषण को तोड़ एक समतावादी वर्ण विहीन कलांतर में वर्ग विहीन समाज का निर्माण करेगा
— —   चौथी राम यादव
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प्रतिरोध की संस्कृति और अंबेडकर वाद ,विषय पर हुई संगोष्ठी में बनारस से आए प्रोफेसर चौथी राम यादव ने भारतीय प्राचीन परंपराओं में प्रतिरोध की संस्कृति कीबेहद मजबूत उपस्थित को रेखांकित करते हुए कहा कि अंबेडकर तक आने से पहले हमें यह जानना चाहिए कि अंबेडकर ने बौद्ध धर्म ही क्यों अपनाया.
,1935 में उन्होंने घोषणा किया था कि वे हिंदू धर्म छोड़ रहे हैं, परंतु अततः 1956 में बौद्ध धर्म अपनाया। बौद्ध धर्म ने अपने समय में वर्चस्ववादी संस्कृति ,वर्णीय विषमता को काफी हद तक तोड़ा, वैज्ञानिक चिंतन को बढ़ावा मिला,उसी परंपरा को कबीर,फुले,शाहूजी महाराज, पेरियार,प्रेमचन्द, आगे लेकर चलते हैं, और अंबेडकर जो 20वीं सदी भारत के सबसे विद्वान अर्थशास्त्री, नृतत्वशास्त्री, ने हिंदू धर्म की विषमता मूलक विभाजन कारी ब्राह्मण वादी परंपरा के खिलाफ व्यापक प्रतिरोध को जन्म दिया।
आज के संदर्भ में उन्होंने कहा कि जाति के दायरे का हर विमर्श ब्राहमणवाद है, मनुष्य केन्द्रित विमर्श ही जातिगत शोषण को तोड़ एक समतावादी वर्ण विहीन कलांतर में वर्ग विहीन समाज का निर्माण करेगा, और उनकी बात आज सही साबित हो रही  है ॥

आज शूद्र और दलित प्रतिरोध राष्ट्रीय अग्रणी प्रतिरोध आंदोलन के रूप में उभरकर आया है, और तमाम परिवर्तन कारी ताकतों को इसे मजबूत करना होगा, और बढ़ते फासीवादी हमले का मुकाबले  में एकजुट खड़े होना होगा
गोष्ठी का आयोजन जनवादी लेखक संघ, पाठक मंच, सम्यक विचार मंच और प्रगतिशील लेखक संघ के सहयोग से बिलासपुर में किया गया.
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विकलांग श्रध्दा का दौर है इस समय ; परिवर्तनवादी ताकतों को एकजुट होना होगा.
– प्रोफेसर चौथीराम यादव
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आजके  समय में  फासीवाद के बढते हमले के खिलाफ एकजुटता स खड़े होने की जरूरत है .जातिवादी शोषण  को तोडकर समतावादी समाज के निर्माण के लिये ब्राह्मणवाद से हटकर मनुष्य केन्द्रित विमर्श की जरूरत है .
उक्त विचार प्रतिरोध की संस्कृति और अंबेडकरवाद विषय पर आयोजित संगोष्ठी में बनारस विश्वविद्यालय के प्रोफेसर चौथीराम यादव ने  व्यक्त किये.
भारतीय प्राचीन परंपरा में प्रतिरोध की संस्कृति की बेहद मजबूत उपस्थित को रेखांकित करते हुये कहा कि अंबेडकर तक आने के पहले हमें यह जानना चाहिए कि अंबेडकर ने बौद्ध धर्म ही क्यों अपनाया,1935 में उन्होंने घोषणा की थी कि वे हिन्दू धर्म छोड देंगे ,परन्तु अनंत:1956 में उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया .
बौद्ध धर्म ने अपने समय में बर्चस्ववादी संस्कृति और ,वर्गीय विषमता को काफी हद तक तोड़ा और वैज्ञानिक चिंतन को  बढावा मिला .
उसी परंपरा को कबीर ,फुले ,शाहू जी महाराज ,पेरियार और प्रेमचंद आगे लेकर चलते है .अंबेडकर जो बीसवीं सदी में भारत के सबसे विद्वान ,,अर्थशास्त्री ,नृतत्वशास्त्री,ने हिन्दू धर्म की विभाजनकारी,विषमतामूलक ब्राह्मणवादी परंपरा के खिलाफ व्यापक प्रतिरोध को जन्म दिया .
आज के संदर्भ में उन्होंने कहा कि जाति के दायरे में हर विमर्श ब्राह्मणवाद है ,मनुष्य केन्द्रित  विमर्श ही जातिगत  शोषण को तोड कर समतावादी वर्णविहीन और कालांतर में वर्ग विहीन समाज का निर्माण करेगा ,और उनकी बात आज सही साबित हो रही है .
आज दलित और शूद्र प्रतिरोध राष्ट्रीय अग्रणी प्रतिरोध आंदोलन के रूप में उभरकर आया है .और तमाम परिवर्तनकारी ताकतों को इसे मजबूत करना होगा. बढते फासीवादी हमले के खिलाफ हमें मजबूती के साथ खड़े होना होगा.
प्रारंभ में प्रोफेसर अमित कुमार सिंह ने वक्ता का परिचय दिया .नंदकश्यप ने कहा का प्रतिरोध की संस्कृति हमारे देश और विश्व में प्रारंभ से रही है ,इसके कारण ही मनुष्य अब तक विकास करता  रहा है .,प्रशनोत्तर काल में इफ्तिखार और प्रथमेश मिश्र के सवालों का प्रोफेसर साहब ने जबाब दिया. धन्यवाद ज्ञापन इप्टा के मधुकर गोरख ने किया.
गोष्ठी का आयोजन  जनवादी लेखक संघ, सम्यक विचार मंच, पाठकमंच और प्रगतिशील लेखक संघ के सहयोग से किया गया.
गोष्ठी में अन्य के अलावा डा. लाखनसिंह ,डा. सत्यभामा अवस्थी, नंद कश्यप, प्रथमेश मिश्रा, ओमप्रकाश गंगोत्री, मधुकर गोरख,नरेन्द्र रामटेके,प्रोफेसर कुल्मी असीम तिवारी , रफीक खान, खोब्रागडे आदि उपस्थित थे.
संचालन शाकिर अली ने किया .
संघर्ष के लिए कमर कसना होगा, अध्यक्षता कर रहे चित्रकुमार खांडे ने कहा कि आज तो प्रतिरोध की संस्कृति अपने अंतिम पडाव पर पहुंच कर संघर्षरत है ,,आज तो जीवन जीने का अधिकार और सम्मान से जीने का हक़ ही खतरे में पड गया है .
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