आर्य नस्ल की श्रेष्ठता और ब्राम्हणवादी मूल्यों की महानता ही वह नींव है जिस पर आरएसएस हिन्दू राष्ट्र का निर्माण करना चाहता है। – रामपुनियानी

आर्य नस्ल की श्रेष्ठता और ब्राम्हणवादी मूल्यों की महानता ही वह नींव है जिस पर आरएसएस हिन्दू राष्ट्र का निर्माण करना चाहता है

 

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आरएसएस की विचारधारा यह मानती है कि आर्य एक श्रेष्ठ नस्ल है और हिन्दू राष्ट्र, विश्व का गुरु और नेतृत्वकर्ता दोनों है। अंग्रजों और ब्राम्हणवादियों ने विशिष्ट नस्लों की श्रेष्ठता की अवधारणा को प्रोत्साहन दिया।

हाल में, आरएसएस की स्वास्थ्य शाखा ‘आरोग्य भारती’ ने प्राचीन भारत के आयुर्वेद के ज्ञान के आधार पर ‘गर्भ विज्ञान संस्कार’ के जरिए उत्तम संतति को जन्म देने की परियोजना लागू करने की घोषणा की। यह दावा किया जा रहा है कि इस संस्था द्वारा निर्मित मार्गदर्शिका का अक्षरशः पालन कर, उत्तम संतति को जन्म दिया जा सकता है। यहां तक कि अगर माता-पिता का कद कम और रंग गेहुंआ हो, तब भी वे ऊंचे और गोरे बच्चों को जन्म दे सकते हैं।

हिंदुत्व की विचारधारा विज्ञान की इन खोजों, जो सूक्ष्म शोधों और प्रयोगों पर आधारित है, को नकारने में जुटी है। पिछली एनडीए सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी ने पाठ्यक्रम में पौरोहित्य और कर्मकांड शामिल किये थे। इनमें से एक कर्मकांड का नाम था पुत्र कमेष्ठी यज्ञ, जिसको करने से पुत्र जन्म सुनिश्चित किया जा सकता था।

विज्ञान यह कहता है कि शिशु कन्या होगा या बालक, यह इस बात पर निर्भर करता है कि पुरुष के वाई और एक्स क्रोमोजोम में से कौन-सा अंडाणु को निषेचित करता है। कोई भी यज्ञ या कर्मकांड यह तय नहीं कर सकता कि शिशु बालक होगा या कन्या।

आरएसएस की विचारधारा जर्मन फासीवाद से गहरे तक प्रभावित है और यह प्रभाव केवल राष्ट्रवाद की फासीवादी अवधारणा तक सीमित नहीं है। इसमें आर्य नस्ल की श्रेष्ठता का विचार भी शामिल है। नाजियों ने एक कार्यक्रम प्रारंभ किया था जिसका नाम था ‘लेबिसबोर्न'(जीवन का बसंत)। इसका उद्देश्य एक आर्य प्रभु नस्ल का निर्माण करना था। इस परियोजना के अंतर्गत, जर्मनी में 8,000 और नार्वे में 12,000 बच्चों के जन्म और लालन-पालन का कार्य नाजी सिद्धांतकार और नेता हिमलर के सीधे पर्यवेक्षण में किया गया था।

इस परियोजना के अंतर्गत ‘शुद्ध रक्त’ की महिलाओं को गोरे और लंबे आर्य बच्चों को जन्म देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था, परंतु इस परियोजना के अंतर्गत जन्मे बच्चों की अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई और पूरी परियोजना असफल हो गयी। यह भयावह परियोजना नाजियों की अमानवीय नस्लीय नीति का हिस्सा थी। इस नीति के अंतर्गत, एक ओर शुद्ध आर्य बच्चों के जन्म को प्रोत्साहित करना था तो दूसरी ओर यहूदियों जैसे-गैर आर्यों को खत्म किया जाना था। इस परियोजना के अंतर्गत 60 लाख यहूदियों को मार डाला गया और ऐसे पुरुषों की जबरन नसबंदी कर दी गई, जो अनुवांशिक बीमारियों से ग्रस्त थे। यह नीति उन वर्गों के प्रति अत्यंत क्रूर थी जो वर्चस्वशाली नहीं थे या जिनमें अलग तरह की योग्यताएं थीं। अब तो पूरा नस्ल का सिद्धांत ही अमान्य घोषित कर दिया गया है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार मानव नस्ल का जन्म दक्षिण अफ्रीका में कहीं हुआ था और आज की मानव जाति के सभी सदस्य विभिन्न नस्लों का मिश्रण हैं।

इस संदर्भ में भाजपा नेता तरुण विजय का यह वक्तव्य महत्पूर्ण है कि”हम काले लोगों के बीच रहते आये हैं।” आरएसएस के महत्वपूर्ण चिंतकों में से एक एमएस गोलवरकर भी एक बेहतर नस्ल का विकास करने के हामी थे। उन्होंने लिखा, आइए हम देखें कि हमारे पूर्वजों ने इस क्षेत्र में क्या प्रयोग किए थे। संकरण के जरिए मानव प्रजाति को बेहतर बनाने के लिए उत्तर भारत के नम्बूदरी ब्राम्हणों को केरल में बसाया गया और यह नियम बनाया गया कि नम्बूदरी परिवारों का सबसे बड़ा पुत्र केवल केरल की वैश्य, क्षत्रिय या शूद्र परिवारों की कन्या से विवाह करेगा।

हिंदुत्व के प्रतिपादक संगठन की स्वास्थ्य शाखा आखिर हमें किस ओर ले जाना चाहती है? क्या हम अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की बजाय, प्रकाश से अंधकार की ओर बढ़ना चाहते हैं।

-राम पुनियानी।

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