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रमेश कुमार ‘‘रिपु

13.06.2017

रायपुर। पानी के लिए जीवन जल रहा है। पानी के लिए जिन्दगी जूझ रही है। पानी के लिए जिन्दगी घुटने टेक रही है। पानी के लिए आदमी और मवेशियों का जीवन एक हो गया है। यह मंजर देखना है तो बस्तर संभाग के किसी भी जिले के गांव में चले जाएं। देखिए रमन सरकार के विकास का सच। भले अमित शाह यह बोल कर चले गए कि लोग रमन सरकार के खुश हैं। लेकिन खुशी की तस्वीर वैसी नहीं है जैसा अमित शाह को दिखाया गया या फिर अमित शाह जैसा देखना चाहते थे,वैसा दिखाया गया। सच तो यह है कि अमित शाह छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों को देखे ही कहां हैं।
ताज्जुब होता है कि 13 साल में भी अपने प्रदेश की जनता को सरकार पानी भी मुहैया नहीं करा सकी। सवाल यह है कि क्या पानी पिलाने वाली सरकार में बैठे लोग इसके लिए भी कमीशन लेते हैं? यदि यह सच है तो फिर रमन सिंह कुछ नहंीं कर सकते। लोकसुराज अभियान में अपना बदन झुलसाने के सिवा। पानी के लिए लोग किस कदर परेशान है इसका सच देखो तो कलेजा मुंह को आता है।

▪पानी नहीं जहर पीते हैं
जिला कांेडागांव के ग्राम पंचायत माकड़ी जिसे आदर्श ग्राम कहा जाता है। आदर्श ग्राम इसे किस मकसद से कहा जाता है कोई नहीं जानता। प्रशासन के फाइल में आदर्श ग्राम की संख्या बढ़ाने के लिए ही ऐसा किया गया होगा। इस गांव के लोगों के सामने पानी सबसे बड़ी समस्या है। एक कुंआ उसमें भी पानी सबको पेट भर मिल जाए तो उनकी किस्मत। जीना है तो पानी चाहिए ही है। जैसा कि हीरा मंडावी,पनिहा सोढ़ी,डेहरिया,अकोरी सहित गांव के दर्जनों लोगों कहते हैं,‘‘ हमारे गांव को आदर्श गांव का नाम कैसे दिया गया नहीं जानते। पानी तक की सुविधा है नहीं। डेढ़ किलोमीटर दूर से पानी लाते हैं। पानी नहीं जहर पीते हैं। जिस पोखर से गांव वाले पानी लाते हैं उस पानी को देख कर यह कहना गलत न होगा कि ये पानी नहीं,पानी उन्हें धीरे धीरे पी रहा है‘‘। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि बस्तर संभाग के आधे से अधिक गांव में पानी की समुचित व्यवस्था अब तक नहीं हुई है। लाल पानी पीना बस्तर के लोगांे की विवशता है। गांव अब भी विकास क्या होता है नहीं जानते। प्रशासन में बैठे लोग माओवादियों के डर की बात कहकर मैदानी इलाके में जाते नहीं और फाइलों में ही कुंआ और हैण्डपंप खोद रहे हैं।

▪18 जिलों का जल, जीवन नहीं है
ग्रियाबंद जिले के सुपेड़ा मे ंकिडनी की बीमारी के कारण डाॅक्टर जो भी बताएं लेकिन पानी भी एक समस्या है इसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए कि प्रदेश में पानी की स्थिति विकट है। रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के 18 जिलों के 592 गांवों के पानी में फ्लोरोसिस और फ्लोराइड की मात्रा बहुत अधिक। सबसे बुरी स्थिति रायपुर संभाग की है। रायपुर संभाग के 246 गांवों का पानी पीने योग्य नहीं है। इन गांवों का पानी लोगों की हड्डियां कमजोर कर रहा है। यह खुलासा राज्य स्वास्थ्य यांत्रिकी (पीएचई) विभाग ने किया है। प्रभावित गांवों में दंतरोग और हड्डियों से संबंधित मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। बस्तर और बीजापुर के 9-9 गांव, बिलासपुर. 2, धमतरी. 41, जशपुर. 23, कांकेर. 54,कवर्धा. 01, कोरबा. 84, कोरिया. 4, महासमुंद. 02, रायगढ़. 4, रायपुर. 246, राजनांदगांव, 2, सरगुजा. 75, दुर्ग, 6, बालोद 28 और बेमेतरा के दो गांवों के पानी में फ्लोरोसिस और फ्लोराइड की मात्रा बहुत अधिक है। और गांवों का भी सर्वे करें तो संख्या बढ़ सकती है।

▪नाले का पानी पीने विवश
कांकेर,भानुप्रतापपुर के ग्राम पंचायत बरहेली के आश्रित ग्राम कोड़ोखुर्री के ग्रामीण नाले के पानी से निस्तारी करने को मजबूर हैं। ग्रामीण पेयजल की व्यवस्था तो जैसे तैसे कर लेते हैं, निस्तारी के लिए नाले के गंदे पानी का उपयोग कर रहे हैं। गांव में कोई कार्यक्रम होता है तो ग्रामीण एक किमी दूर नाले से ट्रैक्टर में पानी लाते हैं। गांव की आबादी लगभग 300 है। यहां छह हैंडपंप है। गर्मी के चलते हैंडपंपों की धार पतली हो गई है। इसके चलते ग्रामीण इसका उपयोग केवल पेयजल के लिए करते हैं। गांव में दो तालाब है जो पूरी तरह से सूख चुके हैं। जुगरू कोंदल गांव के लोग खेत के किनारे गढ्डे कर लेते हैं। उसमें रात भर में रिस रिस कर जो पानी एकत्र होता है उसे पीने के काम में लाते है। इसी तरह कोंडरी नदी जो कि सूख गई है,उसे खोद कर जीने के लिए ग्रामीण पानी निकाल रहे हैं 0

 

रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘।

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