नोटबंदी के बबाल के समानांतर बस्तर पुलिस आदिवासियों की हत्या में है मशगूल .

* नोटबंदी के बबाल के समानांतर बस्तर पुलिस आदिवासियों की हत्या में है मशगूल ..
* कोर्ट से बरी होने के बाद बालसिंह को पुलिस ने गोली मारी ,ग्रामीणों ने कहा घर से खींच कर की गई  हत्या ,पुलिस ने कहा माओवादी ,बालसिंह का शव बीच सडक पर रखकर लौट गये ग्रामीण.
* न कोर्ट न कानून और न संविधान बस जो चाहे पुलिस वही सही .
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कोण्डागांव के मर्दापाल थाने के जंगल में  पुलिस ने बालसिंह को गोली से मार दिया ,पुलिस का कहना है कि वो माओवादी था और जेल भी गया था ,जब कि बालसिंह के परिवार और ग्रमीणों का कहना है कि बाल सिंह  हडेल गांव का माओवादियों से कोई लेना देना नही था, उसे पहले वारंटी बता कर पुलिस पकड कर ले गई थी और उसे सालों बाद निर्दोष मानकर  कोर्ट ने रिहा कर दिया था .
24 नवंम्बर को पुलिस घर में आई और बालसिंह को घर से खींच कर लेगये ,बाद में जंगल में जाकर उसे मार दिया. और उसके शव को छिपा भी दिया था.
कोण्डागांव के विधायक मोहन सिंह मरकाम की पहल पर शव तो मिल गया और बहुत से ग्रामीण विधायक के साथ मर्दापाल थाने में विरोध करने पहुचे और कहा कि बालसिह साधारण आदिवासी था उसका माओवादियों से कोई सबंध नहीं था.
ग्रमीण प्रदर्शन करने  हडेली गांव से मर्दापाल थाने जा रहे थे तो उन्हें रास्ते में रोक दिया , लेकिन ग्रामीण नही माने और कहा कि वो शव को  कोण्डागांव लेजाकर कलेक्टर के  सामने न्याय की मांग करेंगे . आक्रोश देखकर भारी पुलिसबल बुला लिया गया .ग्रामीण अपनी बातपर कायम रहे ,तहसीलदार भी  सडक पर चर्चा के लिये पहुचे ,लेकिन आदिवासी अपनी मांग दोहराते रहे कि बालसिंह की हत्या की गई  है ,इसलिए जिम्मेदारी तय की जाये और हत्या  करने वाले सुरक्षा कर्मीयों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो और उन्हें गिरफ्तार किया जायें.
पुलिस जब आदिवासियों को थाने नहीं जाने पर अडी रही तो ग्रामीणों ने बालसिंह का शव सडक पर ही छोड़ कर वापस चले गये.
आदिवासी कहते रहे कि बालसिंह का अपराध बताया जाये कि वह कब माओवादी था और उसने किया क्या था कि उसे घर से पकडकर गोली मार दी जाये.
ग्रामीणों  और परिवार का यह भी कहना था कि साधारण वेशभूषा में था जिसे पुलिस वर्दीधारी और बंदूकधारी बता रही है .

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