पेरिस समझौता, ट्रंप, पृथ्वी और बिलासपुर 49.3 डिग्री सेंटीग्रेड .– नन्द कश्यप

 

 

 

[ नवभारत (छत्तीसगढ़-ओडिशा) में प्रकाशित)

5 जून

वैश्विक तापमान वृद्धि और मौसम परिवर्तन समझौते से अमेरिकी राष्ट्रपति ने अलग होने की घोषणा कर शायद किसी को भी हैरत में नही डाला ,असल में इन मामलो में अमेरिका का रुख हमेशा से विवादास्पद रहा है, असल में अमेरिकी प्रेसीडेंट किसी न किसी कारपोरेट लाबी के होते हैं और उनके अनुरूप अपने रुख रखते हैं, सामाजिक.वैज्ञानिक शोधों के नतीजे उन्हें ज्यादा प्रभावित नही करतीं।

 

परन्तु मौसम परिवर्तन की मूल बहस में जिस बात को अमेरिकी प्रेसिडेंट(ट्रंप की तरह विरोध करने वाले )कहते रहे हैं कि मनुष्य की गतिविधियों से पृथ्वी को बहुत असर नही होता, तो आईये देखें कि हमारी पृथ्वी पर हम कितना प्रभाव डालते हैं,क्या इससे पृथ्वी गर्म हो सकती है, क्या पृथ्वी के मौसम परिवर्तन के लिए मानवीय गतिविधियों के अलावा कोई अन्य कारण भी हैं ,वो स्थाई हैं या अस्थाई,इसके लिए हमें जानना होगा की हमारी पृथ्वी क्या है और हम क्या हैं.

 

हमारी पृथ्वी लगभग 4.5 अरब वर्षों से अपनी धुरी पर घूम रही है, और आगे कम से कम 10 अरब वर्षों तक वह ऐसे ही घूमती रहेगी, यानी वह एक (perpetual) सतत गतिशील मशीन की तरह है, इसी घूर्णन से हमारी रात और दिन होते हैं, इसके साथ ही वह इतने ही समय से हमारे सूर्य के चारों और चक्कर लगा रही है जिसे हम अपना एक वर्ष कहते हैं, यही चक्कर हमारे मौसम निर्धारित करते हैं,इस पृथ्वी के समुद्र पहाड़ पानी बादल बरसात वनस्पति निर्माण, उसके म्यूटेशन(जिसके कारण जीव जंतुओं पेड़ पौधों की और हमारी भी उत्पत्ति हुई ) की क्षमता पर मनुष्य का कोई हस्तक्षेप नही है, खुद मनुष्य (HOMOSEPIEN) की अपनी उम्र 10 लाख साल के आस पास है, तमाम नैसर्गिक गतिविधियों के बीच मानव की गतिविधियों का अनुपात क्या हो सकता है, 1%,1.5%,2% या 2.5% ,और यही अनुपात तय करेगा कि पृथ्वी को गर्म करने और उसके मौसम को प्रभावित करने का काम हम कर रहे या नही, पिछली सदी के सातवें दशक तक पर्यावरण अध्ययन करने वालों का बहुमत मानता था कि मनुष्य की तमाम गतिविधियाँ 1 से 1.5% तक है जो मौसम पर बहुत प्रभाव नही डालता, परन्तु 8 वें दशक से आद्योगीकरण का विस्तार एशिया और अफ्रीकी महाद्वीपों में बढ़ने, जैविक ईंधन (कोयला, तेल आदि fossil fuels) के बढ़ाते खपत ने आज तमाम शोधकर्ताओं को यह मानने में मज़बूर कर दिया है हमारी गतिविधियाँ 2% को पार कर 2.5% को छू रही हैं और यह मानव सभ्यता के लिए विनाशकारी हो सकता है, औद्योगीकरण से पूर्व की तुलना आज पृथ्वी का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस अधिक है, वह लगभग 13.9/ 14 डिग्री सेल्सियस के करीब है,क्या यह औद्योगीकरण के कारण हुआ है, वहीं1880 जब पृथ्वी का तापमान मापना और रिकार्ड रखना शुरू हुआ, तब से आज का तापमान o.o4 डिग्री अधिक है, यह वृद्धि दिखने में बहुत कम लगती है, परन्तु स्थानीय स्तर पर यह 4से 5डिग्री की वृद्धि तक हो सकती है, हमारे पृथ्वी मेंCO2 का घनत्व मार्च 2015 में401.51ppmथा, यदि इसे हम टन के रूप में अभिव्यक्त करेंगे तो वह 855.21ख़रब टन (1ppm=2.13 gigaton) यह अप्रेल 2017में 409.01ppm हुआ और मई 17 में 409.25ppm हो गया, क्या यह उद्योगों, वाहनों,घरों से निकले गैस से हुआ, तो कुछ वैज्ञानिकों का कहना है, उत्सर्जन से वातावरण में CO2 के घतांव का सीधे सम्बन्ध जोड़ना आसान नही, हमारे औद्योगिक गतिविधियों से अन्य ग्रीन हॉउस गैसे भी निकलती हैं. उनसे भी ख़ास कर एसी, फ्रिज, बोतलों में बंद विभिन्न स्प्रेयर आदि से निकलने वाली गैसे पृथ्वी के ओजोन परत को नुकसान पहुंचाती हैं, परन्तु यदि पिछले 137 वर्षों के औसत तापमान को देखें तो एक बारगी यह कहना मुश्किल है कि पृथ्वी बहुत गर्म हो गई है, फिर क्यों वैश्विक स्तर पर चिता व्यक्त किया जा रहा है पेरिस समझौते के अनुसार अभी भी पृथ्वी को औद्योगीकरण पूर्व के तापमान से 2 डिग्री अधिक में बने रहने हम

 

(Conservative science (based on research by the Intergovernmental Panel on Climate Change) estimates that humanity can emit up to 762 billion tonnes of Carbon dioxide emissions from 2017 and still have a 66 percent chance of staying within a 2°C warming from pre-industrial times. Given our current emissions rate, that gives us just under 20 years before we blow through this budget.)

 

762 ख़राब टन CO2 का उत्सर्जन कर सकते हैं

वास्तव में औसत आंकड़े कभी भी स्थिति की भयावहता को नही दर्शाते, आज के तमाम विकसित देशों ने अपने यहाँ उपभोग और ऊर्जा खपत को उसके चरम में ले गए हैं ,अमेरिका सर्वाधिक उत्सर्जन करने वाला देश है उसका हिस्सा 25%, योरुपिन यूनियन 23%चीन 11%और भारत महज 2% ज़िम्मेदार है इसलिए पेरिस समझौते में अमेरिका को 1000 ख़राब डालर के ग्रीन फंड में उस अनुपात में हिस्सा देना था, इन पैसों से भारत जैसे देशों में साफ़ वैकल्पिक ऊर्जा विकसित करने सहायता मिलती ,परन्तु ट्रंप भाग लिए.

 

खैर हम वैश्विक उत्सर्जन में भले ही 2% भागीदारी रखते हैं ,परन्तु विकास की एकांगी सोच के कारण देश के अलग अलग हिस्से गरमी, बाढ़ और मरुस्थलीकरण की समस्या से ग्रस्त हो रहे हैं, बात छत्तीसगढ़ की ,और बिलासपुर में आखिर ऐसा क्या हुआ की तापमान अविश्वसनीय रूप से बढ़ा. तो फिर थोड़ा वैश्विक हालत देखें, हमारी धरती के भूमध्य रेखा और कर्क तथा मकर रेखाओं के बीच का क्षेत्र, जो पृथ्वी के कुल ज़मीन का 7% है उसमे पृथ्वी के आधे वन क्षेत्र सहित आधे से अधिक जैव विविधता मिलती है, भले ही भूमध्य रेखा पृथ्वी के बीचोंबीच है, सूरज उसके ऊपर सीधा नही चमकता ,क्योकि पृथ्वी 23 अंश झुकी हुई है, इसलिए सूर्य किरणे कर्क रेखा और मकर रेखा पर लम्बवत पडतीं है, दुनिया के घने वर्षा वन इन्ही में हैं और इसी ईलाके में औसत तापमान सबसे अधिक होता है, पूरी धरती के तापमान को अवशोषित कर उसे नियंत्रित करने का काम ये वर्षा वन करते हैं ,छत्तीसगढ़ के सोनहत से कर्क रेखा गुजरती है ,पुराना बिलासपुर( मुंगेली कोरबा चाम्पा ) 21 अंश 47मिनट उत्तरी अक्षांश से 23 अंश 8 मिनट उत्तरी अक्षांश में स्थित है ,जो कर्क रेखा के एकदम समीप है सूर्य के उत्तरायण में ,1 जून, या कभी 2 जून को सूर्य किरणे यहाँ लम्बवत पड़तीं हैं और दक्षिणायन में 11 जुलाई को को सूर्य किरणे लंबवत पडतीं हैं ,प्रक्रति ने इसीलिए इसे घने वर्षावनों का सौगात दिया है ताकि वह सूर्य की सीधी किरणों के को ताप अवशोषित कर इस क्षेत्र को ठंडा रखे ,परन्तु हम देखते हैं की बाक्साईट और कोयला खनन के लिए क्षेत्र में वनों की निर्मम कटाई हुई, उस पर बड़ी संख्या में तापविद्युत गृहों का निर्माण,आज कोरबा जिले में स्थित हसदो वन क्षेत्र की हज़ारों एकड़ घने वन कोयला खनन के लिए दिया जा रहा है जो न सिर्फ गरमी को और बढ़ाएगा वरण अमानवीय विस्थापन भी करेगा , उसपर तुर्रा यह कि शहर के भीतर के 100 साल पुराने पेड़ों को काट दिया गया. इन सबका मिला जुला असर 49.3 डिग्री तापमान है, ग्लोबल वार्मिंग के स्थानीय असर को पहिचानकर और उनके कारणों को दूरकर ही हम सबको अच्छा पर्यावरण दे सकते हैं ,अमानवीय विस्थापन को रोक सकते हैं , पेड़ लगाना तो अच्छा है,अपने वनों और वृक्षों को बचाना सर्वोत्तम है.

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