मानव अधिकार रक्षकों को बस्तर में प्रताड़ित करना बंद करो ! – PUCL

मानव अधिकार रक्षकों को बस्तर में प्रताड़ित करना बंद करो ! – PUCL

            पी.यू. सी.एल. प्रेस विज्ञप्ति

मानव अधिकार रक्षकों को बस्तर में प्रताड़ित करना बंद करो !
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छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा मानव अधिकार रक्षकों को प्रताडित करने, उन्हें परेशान करने, उनकी आवाज़ को जबरिया दबाने के गैर-कानूनी और गैर-संवैधानिक हथकंडों की छत्तीसगढ़ पी.यू.सी.एल. ने कड़े शब्दों में निंदा की है,

 खासकर बस्तर संभाग में. अभी हाल ही में वे वकील, पत्रकार, शोधकर्ता और नागरिक आजादी कार्यकर्ता जो बस्तर भ्रमण कर पुलिस और सुरक्षा बलों के गैर-कानूनी, अमानवीय और गैर-संवैधानिक कृत्यों की जांच-पड़ताल कर जनता के सामने उजागर करने गए थे, छत्तीसगढ़ पुलिस उन्हें द्वेष भावना से अपने इन हथकंडों का  निशाना बना रही है, जिनके बारे में राष्ट्रिय व् अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार संस्थान भली-भाँती जानते हैं. बजाये इसके कि देश के कानून का पालन करते हुए राज्य सरकार सुधारात्मक कदम उठाएं,

 राज्य पुलिस ने ऐसे मानव अधिकार रक्षकों को डराने-धमकाने और गैर-कानूनी तरीके से घेरने का घिसा-पिटा हथकंडा अपनाया है. इसमें तात्कालिक उदाहरण महिला वकीलों, सुश्री शालिनी गेरा, प्रियंका शुक्ल, निकिता अग्रवाल आदि का है.

** इस विवाद के केंद्र में क्या प्रकरण है?

राज्य पुलिस और सी.आर.पी.एफ की एक माओवादी-विरोधी संयुक्त मुहिम के दौरान एक नाबालिक आदिवासी युवा पोत्तम सोमारू को 16  दिसंबर को बीजापुर जिले के गंगालूर पुलिस स्टेशन की सीमा में गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी. ग्रामवासियों ने मृतक के शव को लेकर गंगालूर पुलिस स्टेशन के सामने धरना-प्रदर्शन किया, यह दावा करते हुए कि यह एक फर्जी मुठभेड़ थी, और कि सुरक्षा बलों द्वारा उस युवक को यातना देकर जानबूझकर उसकी हत्या की गयी है.

पोत्तम सोमारू के परिजनों ने बिलासपुर उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दाखिल की, जिस पर सुनवाई करते हुए माननीय न्यायालय ने राज्य को पुनर-शवपरीक्षण का आदेश जारी किया जो दो फॉरेंसिक विशेषज्ञों की मौजूदगी में किया जायेगा, और साथ में उन सभी दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए जो सर्वोच्च न्यायालय और मानव अधिकार संस्थानों ने इस सम्बन्ध में समय-समय पर जारी किये हैं.

उच्च न्यायालय में पोल्लम सोमारू के माता-पिता की अधिवक्ता के रूप में शालिनी गेरा, अधिवक्ता प्रियंका शुक्ल और अधिवक्ता निकिता अग्रवाल ने पैरवी की. इस आदेश के चलते ही चार-सदस्यी टीम, शालिनी गेरा, प्रियंका शुक्ल, निकिता अग्रवाल और उनके साथ एक पुरुष शोधकर्ता  श्री रिषित नोगी २५ दिसम्बर को जगदलपुर पहुंचे, और वहां से जिला दंडाधिकारी/कलेक्टर की अनुमति से ही गाँव गए जहाँ पोत्तम सोमारू के शव को कब्र से निकाला गया. उसी शाम को पोत्तम सोमारू के शव को परिजनों द्वारा जगदलपुर लाया गया.

25 दिसम्बर की शाम को ही संभागायुक श्री दिलीप वास्निकर ने जगदलपुर के अनुविभ्गीय दंडाधिकारी के द्वारा इन चारों लोगों के आवास की व्यवस्था गोयल धर्मशाला में की थी. दूसरे दिन २६ दिसम्बर को सोमारू के शव का पुनर-शवपरीक्षण किया गया, जिस दौरान उनके माता-पिता, फॉरेंसिक विशेषज्ञ और अधिवक्तागण मौजूद थे.

*  वकीलों की प्रतारणा :

उसी शाम लगभग 7 बजे, जब कि अधिवक्तागण जगदलपुर से वापस लौटने की तैयारी में थे, थाना इन्चार्ज अर्चना धुरंदर के नेतृत्व में एक पुलिस कर्मियों की टुकड़ी गोयल धर्मशाला पहुंची, और इन अधिवक्तागणों को परेशान करने लगी. उन्होनें उनको सम्बोधित करने के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया, इसके बावजूद कि उन्होनें बतया कि वे सभी उच्च न्यायालय में याचिकाकर्ता के वकील हैं, और वे वहां माननीय उच्च न्यायलय के आदेश के चलते मौजूद थे, और साथ ही संभागायुक्त श्री दिलीप वास्निकर द्वारा किये गए इंतज़ाम अनुसार.

थाना इंचार्ज अर्चना धुरंदर और उनकी पूरी-की-पूरी टीम जो कोई 15  पुलिस कर्मियों की थी, और जिसमें महिला और पुरुष दोनों ही शामिल थे, इन वकीलों पर दवाब डालने लगे कि वे उनके साथ पुलिस थाना चलें, यह आरोप लगाते हुए कि वे सब धर्मशाला में गैर-कानूनी तौर पर रह रहे थे. यहाँ ध्यान देने लायक बात है कि थाना इन्चार्ज अर्चना धुरंदर ने इन वकीलों के निवेदन करने के बाद भी न तो कोई नोटिस दिया और नही उनके माल-अस्बाब की तलाशी का वारंट दिखाया. इस दौरान जब अधिवक्तागण संभागायुक्त से फ़ोन पर चर्चा कर रहे थे, यह पुलिस अफसर उन्हें पुलिस थाना ले जाने पर आमदा थीं. एक कांस्टेबल ने तो ज़ोर से चिल्ला  कर महिला वकीलों से कहा “ए लड़की बाहर आ”. यह कार्यवाही लगभग एक घंटे तक चलती रही, जिसमें रिकॉर्डिंग भी हुई, वीडियोग्राफी भी हुई, और फोटोग्राफी और ऑडियो रिकॉर्डिंग भी हुई.

इसके बाद 27.12.16  को लगभग 6 30  बजे शाम को अधिवक्ता शालिनी गेरा के पास एक अनजान नंबर से फ़ोन आया जिस पर एक पुरुष की आवाज़ में कहा गया कि बस्तर के पुलिस अधीक्षक उनसे बात करना चाहते हैं. इसके बाद दूसरे पुरुष की आवाज़ में फ़ोन पर कहा गया कि मैं बस्तर पुलिस अधीक्षक खुद बोल रहा हूँ, और उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ एक शिकायत मिली है. पहले तो उन्होनें यह दावा किया कि वह पालनार सामुदिक भवन गयीं थीं जहाँ उन्होनें ग्रामवासियों को आधार कार्ड के खिलाफ भड़काया था, जिस आरोप से उन्होनें साफ इनकार किया. फिर उन्होनें जानना चाहा कि वे माटेनार  में क्या करने गयी थीं, जिस पर उन्होनें स्पष्टीकरण दिया कि पी.यू.सी.एल. ने माटेनार  (जिला दंतेवाड़ा) में 19.12 16  को आदिवासी अधिकारों पर एक छोटी बैठक का आयोजन किया था, जिसमें पी.यू.सी.एल. के राष्ट्रीय प्रतिनिधि बस्तर के ग्रामवासियों से मिलकर उनके अनुभवों और शिकायतों को सुनना चाहते थे. स्थानीय अधिकारीगण इसके बारे में भली-भांति जानते थे.

इसके बाद फ़ोन पर उन्होनें बड़े धमकाने वाले लहजे में दावा किया कि वे छोटे-छोटे बच्चों के सामने पुलिस यातना की झूठी कहानियां क्यों फैला रही हैं, और फिर उन्होनें पूछा कि इस बैठक में क्या जे.एन.यु. के छात्र मौजूद थे, जिसके जवाब में अधिवक्ता शालिनी गेरा ने कहा कि उनकी जानकारी में वहां जे.एन.यू. के कोई भी छात्र मौजूद नहीं थे. फिर उन्होंने बहुत ही डराने-धमकाने वाले लहजे में उनसे पूछा कि वे बार-बार क्यों बस्तर आती हैं
ऐसे सवाल जिनका उस “जांच” से शायद ही कोई सम्बन्ध रहा हो, जो जांच वह करने का दावा कर रहे थे, लेकिन इन सब का मूल मकसद उन्हें डराने-धमकाने का ही था.

अंत में उन्होनें दावा किया कि उन्हें एक लिखित शिकायत मिली है कि गोयल धर्मशाला में एक दिन पहले वे नक्सलियों के लिए “पुराने नोट” बदल रहीं थीं. अधिवक्ता गेरा ने फिर इनकार किया और उन्हें बताया कि वे एक दिन पहले गोयल धर्मशाला गयीं थीं, जिसको बस्तर संभागायुक्त ने विधिवत अधिकृत किया था, ताकि वे माननीय बिलासपुर उच्च न्यायालय  के आदेश के पालन करने की प्रकिर्या में याचिका-कर्ता की वकील की हैसियत से भाग ले सकें.

इस फ़ोन कॉल के अंत होने पर, अधिवक्तागणों ने ट्रू-कालर अप्प (TruCaller app)का उपयोग कर जब इस फ़ोन के सही मालिक की जानकारी ली तो पता चला कि यह नम्बर फारूख अली के नाम से पंजीकृत है.
 इसी नाम का एक व्यक्ति बस्तर में सक्रिय  “अग्नि” नामक एक निगरानी समूह से जाना जाता है, जिसने पहले पत्रकारों को भी डराया-धमकाया है, और अभी हाल में इसी फ़ोन नंबर से मातेनार गाँव में पी.यू.सी.एल. की बैठक में भाग लेने वाले लोगों को भी भड़काऊ और बदनाम करने के सन्देश भेजने का काम किया था. इन फ़ोन कॉल्स के कुछ देर बाद ही, फारुख अली ने एक खबर जारी की कि किसी विनोद पाण्डेय ने शालिनी गेरा के खिलाफ बस्तर के पुलिस अधीक्षक को दी है, कि वे दंतेवाड़ा के जंगलों में घूम-घूम कर नक्सलियों के लिए नोट-बदली का काम कर रही हैं, और कि यह काम वे जगदलपुर में गोयल धर्मशाला से अंजाम देतीं है.

पी.यू.सी.एल. इस घटना पर अपना रोष प्रगट करता है, जिस तरह से अधिवक्तागणों को डराया-धमकाया गया, हमलावर तरीके से जांच का स्वांग रचा गया, उन्हें प्रताड़ित किया गया और साफ़-तौर पर फर्जी प्रकरण में उन्हें फंसाने की धमकी दी गयी है. स्पष्ट तौर पर यह एक आतंकित करने वाला हथकंडा है, और कई मापदंडों पर सत्ता और अधिकार का दुरूपयोग है. यह कृत्य न केवल अधिवक्तागणों को प्रताड़ित करने की नियत से रचा गया, वरन पोत्तम सोमारू के परिजनों के ऊपर भी सीधा-सीधा घातक हमला है.

पुलिस की यह हरकत स्वतंत्र अभिव्यक्ति, स्वतंत्र भ्रमण, और कानूनी इलाज के अधिकार जैसे मौलिक अधिकारों का खुला हनन है.

हमारा यह अभिमत है कि पी.यू.सी.एल. के सदस्यों के खिलाफ इस तरह की कार्यवाही एक बदला लेने की भावना से प्रेरित है क्योंकि छत्तीसगढ़ के बस्तर में माओवादी-विरोधी ऑपरेशन की आड़ में पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा जो भी जघन्य अपराध किये जा रहे हैं, उनका पर्दा-फाश करने में पी.यू. सी.एल. ने एक  अग्रणीय भूमिका  निभाई है, जैसे कि फर्जी मुठभेड़ें, बलात्कार, आगजनी, और मानव अधिकारों के हनन के अन्य मामले.  और खासकर अभी हाल ही में 19 दिसम्बर को दंतेवाड़ा के माटेनार  गाँव में जन-सुनवाई के ज़रिये, जिसमें राष्ट्रीय पी.यू.सी.एल. के लगभग  20  सदस्यों ने शिरकत की थी.

यह पुलिस प्रतारणा की घटना के पीछे उनकी खीज भी नज़र आती है क्योंकि अभी हाल ही में विद्वान् नंदिनी सुन्दर और अन्य के खिलाफ  छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा हत्या के एक फर्जी मामले में फंसाने का प्रयास की विफलता जग विदित है, जिसकी विश्वसनीयता पर तो राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (एन.एच.आर.सी.) और सर्वोच्च न्यायालय ने तक उठाये थे; श्री सुकुल प्रसाद बारसे की प्रतारणा जिन्होंने माटेनार गाँव में एक जन सभा आयोजित की थी;  और अभी हाल ही में तेलेंगना के 7 मानव अधिकार कर्यकर्तों की द्वेषपूर्ण हिरासत के सन्दर्भ में.

छत्तीसगढ़ पी.यू.सी.एल मांग करता है कि राज्य सरकार इन सभी अधिवक्तागणों और मानव अधिकार रक्षकों की प्रतारणा, उन्हें डराना-धमकाना, फर्जी मामलों में फंसाने की साजिश, उन पर रेड डालना और दुर्व्यवहार आदि पर कड़े कदम उठाये, और इसमें लिप्त पुलिस अफसरों के खिलाफ आपराधिक अभियोजन का मुकदमा दायर करे.

पी.यू.सी.एल. सरकार का ध्यान उन दिशा-निर्देशों की ओरे दिलाना चाहेगा जिनका पालन करना पुलिस फ़ोर्स के लिए संवैधानिक कर्तव्य है, जिन्हें सर्वोच्च नयायालय, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग और अन्य संवैधानिक और अन्तर्राष्ट्रीय संस्थानों ने जारी किया है.
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डॉ. लाखन सिंह  
अध्यक्ष

अधिवक्ता सुधा भारद्वाज
 महासचिव

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