यही समझ है जो कल्लूरी को कल्लूरी बनाती है !!

यही समझ है जो कल्लूरी को कल्लूरी बनाती है !!

* शायद सही यही है कि इन जैसे लोगों के लिये लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थायें उनकी मंशा के खिलाफ खडी दिखती है ,यही फासीवाद के प्रारंभिक लक्षण है .
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जब पत्रकार ने कल्लूरी से यह पूछा कि आप हर  विरोध की आवाज को नक्सली क्यों घोषित करते है . ?

तो कल्लूरी का जबाब बडा खतरनाक हैं .
उन्होंने कहा कि आपको  यह देखना  होगा कि विरोध या प्रतिरोध की आवाज़  की वास्तविक नीयत क्या है. यह वो लोग है जिन्हें माओवादी जंगल से करोड़ों रूपये पहुचता है .
यह दरसल विरोध या प्रतिरोध नही है यह पुलिस का मनेबल गिराने का संगठित प्रयास है .
मुठभेड़ पर सवाल या संशय पैदा करना या अनाचार जैसे घटिया आरोप लगाना यह उन समूहों का काम है जो माओ आतंक से वित्तपोषित हो रहे है .
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यही वह खतरनाक सोच हैं जो हर विरोध की आवाज़ को राष्टविरोधी मानते है .
कोई उनसे पूछता कि ;  क्या यह सब भी माओवादियों से वित्तपोषित है ? जो संदेह व्यक्त करते है या सिद्ध करते है .
मानवाधिकार संगठनों  ,स्वतंत्र जांच एजेंसी या पत्रकार समूह की बात छोड़ भी दें तो ….

मुठभेड़ पर संदेह और उन्हें फर्जी सिद्ध करने और आदिवासियों के साथ बलात्कार के आरोप तो मानवाधिकार आयोग ,सीबीआई की जांच ,जनजाति आयोग , विभिन्न जांच आयोग ,महिला आयोग ,पत्रकारों की सर्वोच्च संस्था से लेकर कांग्रेस ,भाकपा ,माकपा ,जनता दल यू ,आम आदमी पार्टी ,टीएमसी और दक्षिण भारत के राजनैतिक दल भी बार बार यही कह रहे है .
भारत का सर्वोच्च न्यायालय ,छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट और जिला न्यायालय तक समय समय पर यही कहते रहे है.
तो क्या इन्हें भी कल्लूरी या उन जैसी सोच रखने वाले राष्ट्रविरोधी या नक्सली मानते है .
वे अन्य जनविरोधीयो़  की तरह लोकतंत्र की सीमाओं और संवैधानिक मजबूरी जैसी प्रशन भी उठाते रहे है ..
उन्होंने जाते जाते विजेताओं की तरह  जनता को आव्हान सा करते हुये यह भी कहा था कि मेने जनता के लिये बहुत काम किया है अब जनता का काम है कि वो करे .
शायद सही यही है कि इन जैसे लोगों के लिये लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थायें उनकी मंशा के खिलाफ खडी दिखती है ,यही फासीवाद के प्रारंभिक लक्षण है .
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5.2.17 

cgbasketwp

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