रेप की भाषा में संवाद की वैचारिकी —- बादल सरोज

रेप की भाषा में संवाद की वैचारिकी —- बादल सरोज

रेप की भाषा में संवाद की वैचारिकी
बादल सरोज
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अपने हिस्से की बहादुरी दिखाकर गुरमेहर कौर दिल्ली छोड़ गयीं हैं !! आज गुरमेहर कौर हैं, कल कोई और होंगी. आज उनका एक कथन है, कल किसी का कुछ और बोलना होगा,या जो न बोला गया हो उसे ही बोला हुआ बता दिया जाए,यह भी हो सकता है कि न बोलना ही मुद्दा बना दिया जाए. यहाँ प्रसंग सिर्फ घटना या व्यक्ति विशेष नहीं है. यहाँ सवाल जुगुप्सा जगाने वाली प्रवृत्ति है. ढीठ आपराधिकता है. आज इस दुष्ट भाव पर राष्ट्रवाद का झीना आवरण है, कल धर्म का, परसों जाति का और अगले दिन लिंग का होगा. इन्ही पत्तियों और काँटों में उलझ कर रह जाइयेगा तो जड़ तो छोड़िये तने और शाखाओं तक भी पहुंचना मुश्किल हो जाएगा.

सवाल है कि किसी सभ्य समाज में कोई संतुलित मनुष्य किसी 19-20 साल की मेधावी बच्ची के साथ बलात्कार करने की बात सोच भी कैसे सकता है. जिसका पिता कारगिल युध्द में या आतंकियों से लड़ते में मारा गया हो उस बेटी को, उसी देश में जिसके लिए वह 2 साल की उम्र में पिता के संरक्षण और स्नेह से वंचित हो गयी थी, उसे घर से खींच कर चौराहे पर सामूहिक बलात्कार का शिकार बनाने की धमकी लिखा-पढ़ी में देने वाले कौन है ? इनकी समस्या क्या है ? इस काम को विशेषज्ञ मनोचिकित्सकों के लिए छोड़ देना ठीक विकल्प नहीं होगा. हालांकि उन्हें भी फ़ौरन से पेश्तर इसका विश्लेषण करना चाहिए और समाधान सुझाना चाहिए.

इन दिनों जितनी संक्रामकता के साथ यह संहारक रोग बढ़ा है, वह थोड़े से गहरे अवलोकन की मांग करती है. क्यूंकि न तो यह अनायास है न अपवाद. न अतिरेक है न असंतुलन. इसकी एक वैचारिकी है, उसके कुछ समाजार्थिक आयाम हैं. इन्हें समझे बिना न तो इस मैलिग्नेंसी को समझा जा सकता है, ना ही इसका उपचार किया जा सकता है. यूँ भी विषधर को पूंछ से नहीं फन से पकड़ना होता है.

गुरमेहर कौर के साथ बर्ताब न आदि है न अन्त.
कुछ वर्ष पहले यह जुगुप्सा गुजरात में अमल आती नजर आई थी जब एक गर्भवती महिला को मारकर उसके 7 माह के भ्रूण को विजयध्वज की भाँति त्रिशूल पर लहराया गया था. गौहाटी में दिखी थी जब आदिवासियों के एक जलूस पर हमला कर उसमे शामिल महिलाओं को एकदम नंगा कर उनके कोमल अंगों पर जघन्य वार किये गए थे. हाल ही में इसके एक बड़े नेता, जिसके उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बन जाने की आशंका हवाओं में तैरती दिख रही है, के मृत महिलाओं के साथ तक बलात्कार करने के वीरतापूर्ण उदघोष में सुनाई दी थी. ओड़िसा में एक कोमल सी मासूम बच्ची को उसके उतने ही कोमल भाई तथा डॉक्टर पिता के साथ ज़िंदा जलाके मारने वाली आग में चमकी थी. यह प्रवृत्ति अपनों को भी नहीं बख्शती. यह प्रवृत्ति निरपेक्ष है- इन्ही बंधु- बांधवों ने अपनी ही एक नेता की राजनीतिक बगावत के बाद उनके निजी जीवन को लेकर अपनी गढ़ी पूरी जन्मपत्री खोलकर रख दी थी. अपने अब तक के सबसे बड़े वरिष्ठ नेता के निजी जीवन के बारे में रस ले लेकर अफवाहें उड़ाई थीं. ऐसी सैकड़ों कहानियां और भी है. यहां सिर्फ नमूने भर के उल्लेख किये हैं जो अलग अलग आयामों का प्रतिनिधित्व करते हैं.

अब यही विषधर युध्द में मारे गए एक सैनिक की युवा होती बेटी के साथ बलात्कार करने के लिए फनफना रहे हैं. कौन हैं ये ?

राष्ट्रवादी तो पक्के से नहीं हैं. राष्ट्रवादी होते तो सबसे पहले उन्हें सजा देने की बात करते जिन्होंने कारगिल की लड़ाई में मरे सैनिकों के ताबूतों की खरीद में कमीशन खाया था. जिनकी तबकी सरकार ने बीच युध्द के दौरान भी पाकिस्तान के साथ व्यापार को जारी रखना पक्का किया था. उस पार्टी को सजा देने की मांग करते जो आतंकवादियों को दहेज़ समेत कंधार में छोड़ कर आयी थी. उस आत्मप्रचारलिप्सा के शिकार नेता के पुतले जलाते जो, बिनबुलाये नवाज़ शरीफ की नातिन की शादी में भात लेकर पहुँच गये थे. उस पार्टी के दफ्तर को फूंकते जिसके 12 लोग आईएसआई के लिए जासूसी के आरोप में अभी अभी मध्यप्रदेश में हिरासत में लिए गए हैं. उन नेताओं को घेरते जिनके साथ वे मंच साझा करते दिखाए दे रहे हैं. उस ट्रम्प के विरुद्ध बोलते जिसके नफ़रती अभियान का पहला शिकार युवा भारतीय इंजीनियर श्रीनिवासन हुआ है, और दुनिया जानती है कि वह आख़िरी नहीं है.

राष्ट्रवादी होते तो लाखों करोड़ रुपयों के रोजाना के आर्थिक लेनदेन को चीनी अलीबाबा की पेटीएम का सौंपने का विज्ञापन करने वाले को न बख्शते, उसे देश पर जबरिया न थोपने देते. जिओ के सिमों के जरिये देश की जनता के आधार कार्ड की जानकारी दूसरे देशों तक नहीं पहुंचाते. भारत के रक्षा से लेकर खुदरा व्यापार, उद्योग से लेकर वित्त तक यहां तक कि शिक्षा और मीडिया तक में खुलेआम विदेशी मगरमच्छो और भेड़ियों को न्यौता देकर घर में नहीं घुसाते. जिसे पड़ोसी कभी पूरा नहीं कर पाये, देश की एकता को तोड़ने का वह नापाक मंसूबा खुद अंजाम नहीं देते.

फिर कौन हैं ये ? भारतीय संस्कृति के रक्षक !! ये तो पक्के से. क्योंकि इन्हें न तो भारत के इतिहास की जानकारी है, न उसके साथ इनका कोई रिश्ता हैं. इन्हें तो हिन्दू शब्द तक की व्युतपत्ति नहीं पता. हाँ भूगोल के साथ इनका सम्बन्ध है सो भी कुछ इस तरह कि इनकी इसी तरह की प्रवृत्ति ने पहले भी इस देश का भूगोल बिगाड़ा है, आईंदा भी बिगड़ा तो इन्ही की वजह से बिगड़ेगा.

इस देश की सांस्कृतिक विरासत की मजबूती यह है कि वह इन जैसों की लाख कोशिशों के बावजूद मनु या गौतम की स्मृति या मुसोलिनी से सीखी वर्दी और हिटलर से समझी निर्ममता पर नहीं टिकी है. वह कभी रावण की कैद से सलामत छूटी सीता के रूप में महाकाव्यों में सुनाई पड़ती है तो कभी दरबार में अपहृत करके लाई गयी शत्रु पक्ष की युवती को “काश इतनी सुन्दर मेरी माँ होती” कहते शिवाजी के व्यवहार के रूप में इतिहास में नजर आती है. ये दरअसल भारत और उसकी सांस्कृतिक विरासत में जो भी सकारात्मक है उसका विलोम हैं.

फिर कौन हैं ये ?
ये “टू इन वन” हैं. पूँजी की छुट्टा लूट और सामन्तों के पाशविक शोषण के अश्वमेध (सामयिक विमर्श की तर्ज पर कहें तो गर्दभमेध) यज्ञ की यात्रा के नए चरण के शिकार भी हैं भारवाहक भी हैं. ये उसके द्वारा रचित संकट की अर्थी पर सवार भी हैं और सीधे वंचना, बेकारी और विपन्नता के श्मशान तक लेजाने वाली खुद की अंतिम यात्रा के तुरहीवादक और बैंड वाले भी हैं. ये साम्राज्यवादी शकुनि की कुटिल शतरंज की बाजी के वे पैदल हैं, जिनका रिमोट भी उन्ही कुटिल हाथों में हैं. इनकी अफीम कही उतर न जाए, ये कहीं सोचने, समझने, विचारने न लगें, इसलिये समय समय पर नयी खुराक इनके गले में उतारी जाती रहती है और ये भजनमण्डली की धुन पर हिलते हिलते इतने खतरनाक पतन के शिकार हो कर क्रोनिक सैडिस्ट बन जाते हैं, जहां एक 19-20 वर्ष की बच्ची के साथ बलात्कार की बातें इन्हें प्रमुदित करने लगती है.
एक ख़ास तरह की सामाजिक आर्थिक दशा इस तरह की वैचारिकी की विष बेलों को खाद पानी देती है. वे जहां एक व्यवस्था का शीराज़ा बिखरने का परिणाम हैं वहीँ उससे भी बदतर निज़ाम की ईंट और गारे भी हैं. यह एक दु:स्वप्न के टूटने के बाद उससे भी खराब दु:स्वप्न की पूर्वपीठिका हैं. वे कहीं ट्रम्प है तो कही ला पेन, कहीं लादेन हैं तो कहीं किसी और नाम के उसके बिरादर. भारत में वे अपनी कल्पित पुरातनता की प्राणप्रतिष्ठा बलात्कारों के शौर्य, विश्विद्यालयों के पराभव और लिखने पढ़ने बोलने वालों के क़त्ल से करना चाहते हैं.

इसलिए बात सिर्फ गुरमेहर कौर की हिफाजत या हिमायत भर से नहीं बनने वाली. वैचारिकी से वैचारिकी के मैदान में जूझना होगा तो साथ ही समाजार्थिक वजहों से उसके कारणों-परिणामों दोनों ही धरातलों पर लड़ना होगा. फैज़ साब की मशहूर नज़्म की तरह इन पैदलों की गैरत जगाने के लिए इनकी सोयी हुयी दुम हिलाने के जतन करने होंगे. झूठ और निराधार भावनात्मकता की अफ़ीम को उतारने के लिए धीरज के साथ किन्तु आक्रामक तरीके से तर्कों और तथ्यों का उपचार देना होगा- और यह सब एक के बाद एक करके नहीँ, एक साथ करना होगा. वरना न क़ानून का राज बचेगा, न संविधान. खुद उनके घरों सहित किसी भी घर की छोटी, बड़ी गुरमेहर सुरक्षित नहीं बचेगी. और जो जो बचेगा उसका बचना भी कोई बचना है क्या ?
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