आखिर क्यों केन्द्र सरकार का ये आदेश आदिवासियों के लिए बन सकता है मुसीबत

** Government ban on tribals right for Tiger

आखिर क्यों केन्द्र सरकार का ये आदेश आदिवासियों के लिए बन सकता है मुसीबत

2017-04-14  पत्रिका

शिरीष खरे/रायपुर. केंद्र सरकार का बाघ संरक्षण को लेकर एक आदेश छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी राज्य के 70 हजार से ज्यादा आदिवासियों के लिए मुसीबत बन सकता है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने राज्य को बाघ अभ्यारण्य क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी और अन्य लोगों के सभी अधिकार निलंबित करने के निर्देश दिए हैं। इसमें कहा गया है कि दिशा-निर्देशों के अभाव में गंभीर बाघ आवास क्षेत्रों के तहत आदिवासी और अन्य लोगों को कोई भी अधिकार न दिया जाए। प्राधिकरण ने एेसे क्षेत्रों में आदिवासियों के अधिकारों पर पाबंदी लगाने के लिए वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 38 को आधार बनाकर छत्तीसगढ़ सहित 17 राज्यों को यह नोटिस भेजा है। वहीं, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सरकार के इस निर्णय को वनाधिकार कानून की मूल भावना का उल्लंघन बताया है।

क्यों लिया यह फैसला
एक दशक पहले वन्य जीव संरक्षण के लिए विशेष नियम बनाने के बावजूद जब सरकार इस मोर्चे पर नाकाम हुई तो बाघों को बचाने के नाम पर वनाधिकार अधिनियम के तहत आदिवासियों के हक पर प्रतिबंध लगाने की दलील दी जा रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, सरकार यदि इन नियमों का सही दिशा में पालन करती तो वन्यजीवों की सुरक्षा संभव थी। लेकिन, सरकार की असफलता का खामियाजा अब आदिवासियों को भुगतना पड़ेगा।

डेढ़ सौ से ज्यादा गांवों पर लटकी तलवार
वन्य अधिकार कानून (एफआरए) 2006, वनों के समस्त रहवासियों को फसल और वन संसाधनों का उपयोग करते हुए परंपरागत आजीविका बनाए रखने का अधिकार देता है। इसके तहत छत्तीसगढ़ के करीब दस लाख आदिवासी परिवारों ने सरकार से वनाधिकार पट्टा मांगा है, लेकिन एक दशक बीतने के बाद भी राज्य में आधे से ज्यादा परिवारों को पट्टे नहीं मिले हैं। इस आदेश के बाद टाइगर रिजर्व के रहवासियों पर वनाधिकार से बेदखल होने का खतरा है। सूरजपुर जिले के तमोर-पिंगला को नए टाइगर रिजर्व बनाए जाने की मंजूरी मिलने के बाद छत्तीसगढ़ में चार बाघ अभ्यारण्य इसके दायरे में आ गए हैं। इनमें बिलासपुर के अचानकमार, बस्तर के इंद्रावती और गरियाबंद के सीतानदी-उदंती बाघ अभयारण्य भी शामिल हैं। इनमें 7 हजार 200 वर्ग किमी से भी ज्यादा क्षेत्र के रहवासी प्रभावित होंगे। लगभग 155 गांव इस क्षेत्र की सीमा में आ रहे हैं।

बाघों की संख्या के दावों पर सवाल
एनटीसीए के आकड़ों के मुताबिक, राज्य में 46 बाघ हैं। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पिछले माह बाघों की संख्या पर दावों को लेकर सरकार से कहा था कि अचानकमार टाइगर रिजर्व में 28 बाघ होने का दावा व्यवहारिक नहीं लगता। वहां इतने बाघ होते तो दिखते जरूर।

बृंदा करात ने पीएम को लिखा पत्र
माक्र्सवादी नेता बृंदा करात ने एनटीसीए के निर्देश को अवैध बताते हुए पीएम नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर निर्देश वापस लेने की मांग की। उन्होंने इसे वनाधिकार कानून के खिलाफ साजिश करार देते हुए पर्यावरण मंत्रालय पर पारदर्शिता न बरतने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, एनटीसीए को वनाधिकार कानून में हस्तक्षेप का हक नहीं है।

टाइगर के बहाने आदिवासियों पर हमला
सामाजिक कार्यकर्ता गौतम बंद्योपाध्याय कहते हैं, यह सिर्फ प्रशासनिक नहीं, वनाधिकार से जुड़ा संवेदनशील मामला है। कोई भी नीति बनाने से पहले सरकार को जनसुनवाई करानी थी। आदिवासी, वन और वन्य-जीव के हितों से जुड़े मुद्दों को लेकर प्रक्रिया अपनाई जानी जरूरी होती है। वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता आलोक शुक्ला के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में सरकार ने उन क्षेत्रों को भी टाइगर रिजर्व घोषित कर रखा है, जहां टाइगर हैं ही नहीं। एेसे तो सरकार टाइगर का बहाना कर सब जगह मनमानी करेगी।

एपीसीसीएफ (वन्यजीव) शैलेंद्र कुमार ने कहा कि टाइगर रिजर्व का कोर जोन बाघों की मातृभूमि होती है, इसलिए वहां से गांव हटाने पड़ते हैं। बफर जोन में ग्रामीण और बाघ दोनों साथ रहते हैं, इससे दोनों के अधिकार प्रभावित होते हैं। इससे बचने के लिए कई तरह के प्रयास किए जाते रहे हैं।

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