सोनी सोरी को याद आईं निलंबित जेलर वर्षा डोंगरे, रायपुर जेल में हुई थी मुठभेड़

सोनी सोरी को याद आईं निलंबित जेलर वर्षा डोंगरे, रायपुर जेल में हुई थी मुठभेड़

सोनी सोरी को याद आईं निलंबित जेलर वर्षा डोंगरे, रायपुर जेल में हुई थी मुठभेड़

राजकुमार सोनी|
8 May 2017,

माओवादी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में रायपुर सेंट्रल जेल में बंद रहीं सोनी सोरी का कहना है कि भले ही आदिवासियों के उत्पीड़न का मुद्दा उठाने पर सरकार ने वर्षा को निलंबित कर दिया है, लेकिन हकीकत यह है कि जेल के विचाराधीन बंदी से लेकर सज़ायाफ्ता कैदी उनके नाम से ख़ौफ खाते थे.

सोरी का कहना है कि बेशक़ वर्षा ने अपनी फेसबुक वॉल पर आदिवासी और जवानों के पक्ष में टिप्पणी की है, लेकिन साल 2012 में जब वह जेल में भूख हड़ताल पर बैठी थीं, तब जेल के आला अफ़सरों ने उस भूख हड़ताल को ख़त्म करवाने की कमान वर्षा डोंगरे को सौंपी थी और उन्होंने सख़्ती के साथ उस हड़ताल को ख़त्म करवा दिया था.

ख़राब खाना

निलंबन को गैर जायज बताने वाली सोरी का कहना है कि वर्षा एक सख्त प्रशासक हैं और अपनी ज़िम्मेदारी बख़ूबी निभाती हैं. वह हमेशा इस बात के लिए परेशान रहती थीं कि जेल के भीतर कैदियों को मैन्युल के मुताबिक अच्छा भोजन क्यों नहीं दिया जाता. रोटी खराब और दाल पतली क्यों रहती है.

 सोरी ने बताया कि जेल के खराब भोजन की वजह से जब स्वास्थ्य लगातार खराब हो रहा था और वह कमजोर हो गई थीं, तब उन्होंने बाहर से प्रोटीन और भोजन मंगवाकर खाने की इच्छा जाहिर की थी, लेकिन वर्षा ने इसकी इजाज़त नहीं दी थी. उन्होंने साफ-साफ कहा था कि वह (सोरी) जब तक उनकी निगरानी में हैं, तब उन्हें वहीं खाना होगा जो सभी बंदी खाते हैं.

साहिर की नज़्म

सोरी ने बताया कि जब उन्हें रायपुर से जगदलपुर शिफ्ट किया जा रहा था, तब वर्षा ने जेल के दरवाजे के बाहर खड़े होकर माफी मांगते हुए कहा था- जेल के भीतर फैली गड़बडिय़ों के लिए आपका आंदोलन शायद जायज़ था, लेकिन मुझे स्त्री होने के नाते एक दूसरी स्त्री पर सिर्फ इसलिए सख्ती करनी पड़ी क्योंकि मैं एक जेलर भी हूं.

वर्षा ने तब उन्हें बेहतर जीवन की शुभकामनाएं देते हुए साहिर के एक गीत की पंक्ति सुनाई थीं. वर्षा ने कहा था- कितना भी अंधेरा क्यों न हो, लेकिन सुबह जरूर होती है. आपके जीवन में भी एक रोज मीठा उजाला आएगा. परेशान मत रहिएगा… वो… सुबह कभी तो आएगी. जरूर आएंगी.

निशाने पर दलित?

इधर दलित अफसरों और कर्मचारियों के निलंबन और बर्खास्तगी को दलित मुक्ति मोर्चा के प्रदेश प्रभारी डाक्टर गोल्डी जार्ज ने लोकतंत्र के लिए खतरा बताया है. जार्ज का कहना है कि वर्ष 2010 में सरकार ने चार सिविल जजों को मात्र स्थायीकरण के योग्य नहीं पाए जाने आरोप में सेवामुक्त कर दिया था.

ठीक एक साल बाद 15 ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश जो सभी दलित थे को समय से पहले अनिवार्य सेवानिवृति दे गई. जबकि एक अप्रैल 2016 को प्रभावशाली नेताओं और अफसरों के खिलाफ फैसला देने की वजह से सुर्खियों में आए जज प्रभाकर ग्वाल को बर्खास्त कर दिया गया.

जार्ज का आरोप है कि सरकार बेगुनाह आदिवासियों को मौत के घाट उतारने वाले अफसरों को तो संरक्षण देती है, लेकिन बस्तर के खौफनाक हालात को बयां करने वाली महिला जेलर निलंबित कर दी जाती है. सामाजिक कार्यकर्ता संकेत ठाकुर का आरोप है कि सरकार दलित और आदिवासियों को निशाने पर लेकर उन्हें अपराधी साबित करने में तुली हुई है.
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First published: 8 May 2017.

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