दुनिया का कोई धर्म इंसानियत और न्याय के मूल सिदान्त के खिलाफ नही होना चाहिये

दुनिया का कोई धर्म इंसानियत और न्याय के मूल सिदान्त के खिलाफ नही होना चाहिये

 ** सर्वोच्च अदालत  ने कल कहा की यदि यह धार्मिक मामला है तो हम दख़ल नहीं देंगे .
दुनिया का कोई धर्म इंसानियत और न्याय के मूल सिदान्त के खिलाफ नही होना चाहिये .

** मुस्लिम महिलाये अभी सिर्फ क़ुरान में दिये हक़ मांग रही है , उन्होंने कोमन सिविल कोड नही माँगा और न मैरिज़ एक्ट , मुस्लिम उलेमा यदि उन्हें कुरान के हक़ में अडचन करेंगे तो वो इसके आगे भी जा सकती है
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कोई भी धर्म कुछ भी कहे यदि वो महिला या न्याय के खिलाफ है तो उसे कानूनन खत्म करना ही चाहिए.
ज्यादातर उलेमा अब कह रहे है की तीन तलाक़ गैर इस्लामी है (यह सही भी है )  तो फिर वह अभी तक चल कैसे रहा है, तीन तलाक़ ही क्यों एक पत्नी के होते हुए बिना तलाक़ दिये दुसरी शादी भी गैरकानूनी होना चाहये .
और यह सारे निर्णय अदालत में हों न कि किसी धार्मिक संघटन या व्यक्ति के सामने .

मुस्लिम महिलाये अभी सिर्फ क़ुरान में दिये हक़ मांग रही है , उन्होंने कोमन सिविल कोड नही माँगा और न मैरिज़ एक्ट , मुस्लिम उलेमा यदि उन्हें कुरान के हक़ में अडचन करेंगे तो वो इसके आगे भी जा सकती है.
अब यह तर्क की यह सब भाजपा अपने निजी एजेण्डे के तहत कर रही है  /जो सही भी है  / तो कोंग्रेस या दूसरी सेकुलर पार्टी ने इसकी पहल क्यों नही की .
तो आईये जैसे भी हो मौका मिला है तो मुस्लिम महिलाओ को अन्य महिलाओ की तरह एक तरफा तलाक़ , हलाला और बहुविवाह की प्रथा से निजात मिलना ही चाहिए .
हालांकि लगता नहीं है की सब कुछ एक साथ हो जाएगा.चलो शुरुआत तो अच्छी हुई है .
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