जनप्रतिनिधियों का बाजार और हम : मेधा पाटकर

मध्य प्रदेश की राजनीति में चल रही उथल-पुथल मात्र एक राज्य नहीं, पूरे देश के लिए खतरनाक साबित हो रही है। हमारे चुने हुए जनप्रतिनिधीयों का बाजार लगा हुआ है। कोई बिकाऊ है तो कोई खरीददार! ये हमारा प्रतिनिधित्व, हमारी भूख-प्यास, जीने और जीविका के अधिकार, प्रकृति और संस्कृति, शिक्षा ,स्वास्थ्य, रोजगार या आवास के मुद्दे, किसान मजदूरों पर छाई गैर बराबरी और समस्याओं को क्या जानेंगे और कैसे? इन्हें कहा है संवेदना या और वेदना, गिरती हुई अर्थव्यवस्था कोई वायरस और सुनामी की!

जो लगे हुए है नोटों का उपयोग करने, नेता बने व्यक्तियों को वस्तु रूप देकर खरीदने में, वे निश्चित ही बड़े कॉर्पोरेट या सियासी घरानों की संपत्ति आज सत्ता के लिए पूंजी बनाकर उपयोग में लेंगे। कल उसी सत्ता के सहारे उन्हीं की पूंजी, संपदा बढाने में सहायता करेंगे। इसी पूंजी को हासिल कराने और स्वयं उसमें हिस्सा पाने के लिए बदल रहे हैं, कानून, पूंजीपतियों के पक्ष में। इन्हें न श्रमिकों की परवाह है, न मतदाताओं की।

हर राजनीतिक दल ने इसके लिए शरमिंदगी व्यक्त करनी चाहिए। राजनीतिक दल के भीतर जनतंत्र की प्रक्रिया, पारदर्शिता और जवाबदेही लाने के लिए सूचना का अधिकार, दल की पूंजी का ऑडिट और दलों के घोषणापत्रों की बंधनकारकता कानूनी ढांचे में अगर नहीं लाई गई तो इस देश की राजनीति में न राज रहेगा, न नीति! दलों के नेतृत्व में ऐसे व्यक्ति क्वचित ही रहे हैं जो कि इस भयावह हकीकतों की असंवैधानिकता और अनैतिकता का कड़ा विरोध करें। अब तो बैंगलूर, गुडगाव और जयपुर के होटलों में रखकर उपभोग दिलाने के नाम पर उनका सत्ताभोग लेने की ख्वाहिश बताती है कि, सत्ताधीशों के रिश्ते नाते कितने मजबूत हैं और कितने मजबूर हैं नेतृत्व? इस पर हो रहा खर्चा जब कि जनता का ही है, श्रमिकों के खून-पसीने का है, तब जनता भी कैसे बैठ सकती है चुप?

जनजन ने इसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। जनता ने सत्याग्रही बनकर अपने किसी भी दल से रही कटिबद्धता की गुलामी ना मानते हुए अब बन जाना चाहिए शासन निर्माता! हो जाए अपने-अपने बिकाऊ विधायकों के और खरीददार नेताओं के द्वार पर इकट्ठा!

मूक सत्याग्रह का रास्ता अपनाएं। उन्हें फिर कभी किसी भी पार्टी के झंडे तले चुनकर न देने का संकल्प लें। 

आज इतने हथियार हैं युवाओं के हाथ। वे न हि बिकाऊ पार्टी के होने के कारण शर्मिंदा और न हि जश्न मनाएं अपनी पार्टी ने करोड़ों रुपये खर्चकर लाई या लाने वाली जीत के लिए! जो राजनीति को, नेतागिरी की झूठी  घोषणाओं के जैसे नहीं, लेकिन सच में मानते हैं समाज सेवा का आधार, वे हो जाएं तैयार, इस बाजारी व्यवहार को ‘राजनीति’ के दायरे से बाहर करने। सर्वप्रथम उठाएं अपनी कलम और आवाज भी, जो कि इसका धिक्कार करें। अपने-अपने दल की दलदल से उपर उठकर, शर्म छोड़कर नेताओं को अपने खयाल से अवगत कराएं। धिक्कार करें पुलिस बल और धनबल दोनों के उपयोग का। और जनबल या जनशक्ती जगाने के लिए अपना निषेध तो अभिव्यक्त करें, व्यक्ति, समूह या संगठन…किसी भी स्तर से, आज और अभी! राजनीति अब केवल विधानसभा या लोकसभा ही नहीं पंचायत से राज्यसभा तक, हर शासकीय विभाग से न्यायपालिका तक भ्रष्ट आचार और विचार के सहारे, हावी हो रही है। यही समय है, उस पर लगाम लाने का, जनतंत्र और संविधान बचाने का! 

नहीं तो छोड़ देना होगा मतदान, हमें ही बनाना होगा हमारा अपना विधान!

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