सुधीर चौधरी को देख के मुझे 90’s की फ़िल्मों के अमीर बिगड़ैल लड़के की याद आती है

Written by Puneet Sharma

सुधीर चौधरी को देख के मुझे 90’s की फ़िल्मों के अमीर बिगड़ैल लड़के (मोंटी, विकी) की याद आती है। जो ग़रीब हीरो पर हँसता है और हीरोइन उसकी फ़ैमिली फ़्रेंड है।

जिस के सर के भीतर केवल ईगो है लेकिन सर के ऊपर मस्त हेयरस्टाइल है। रंग भी गोरा है। उसके दोस्त उसके और वो किसी और का चमचा है। 

वैसे इस देश में सुपरहिट न्यूज़ एंकर बनने के लिए भी लुक्स ही सबसे ज़्यादा इमोर्टेन्ट है। एंकर की अदा इमोर्टेन्ट है। चाहे आप अमीश देवगन ही क्यूँ न हों, गोरा रंग और सर के ऊपर पूरे बाल बहुत ज़रूरी हैं। आज न्यूज़ मीडिया का वही हाल है, जो 80 के दशक में मेनस्ट्रीम बॉलीवुड का था।

आप आज सुधीर चौधरी का मज़ाक उड़ाते हैं लेकिन उसने वैसे ही 500-2000 के नोटों में चिप और ब्रम्हांड की हर वस्तु में जेहाद ढूँढ निकाला। जिस तरह राजकुमार ने तिरंगा फ़िल्म में मिसाइल में से फ़्यूज़ कंडक्टर निकाला था और दर्शकों ने ताली बजायी थी।

याद रखिए! ये पत्रकारिता का गिमिक काल है।

आज जनता की ऐसी ही डिमांड के कारण, बहुत सारे अच्छे और ठीक-ठाक पत्रकार भी ऐसे ही गिमिक करते हैं। वो इसे समय की माँग कहते हैं।

आज भी उस समय की तरह एक पैरेलल पत्रकारिता चल रही है। जिस के दर्शक बहुत कम हैं। वो किसी न किसी तरह इस ईमानदार पत्रकारिता को ज़िंदा रखेंगे।

इस तरह की पत्रकारिता को आज से काफ़ी समय बाद याद किया जाएगा। तब भी गिमिक के दर्शक ख़त्म नहीं होंगे। सुधीर चला जाएगा और कोई और आ जाएगा। हाँ लेकिन वो पीढ़ी थोड़ा बेहतर होगी।

फिर जब वो पीढ़ी अच्छी पत्रकारिता करेगी, तो बहुत से एंकर कहेंगे कि हमें अपने टाइम में ऐसा मौका नहीं मिला।

पत्रकारिता के उस बेहतर युग में ईमानदार पत्रकारों के काम को अमोल पालेकर, स्मिता पाटिल, ओम पुरी, शबाना आज़मी, नसीरुद्दीन शाह, दीप्ति नवल, पंकज कपूर, फ़ारुख शेख, नीना गुप्ता की तरह सम्मान के साथ याद किया जाएगा।

हर युग बीतता है। ये युग भी बीतने के सिवाय कुछ नहीं कर सकता।

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