लखनऊ में जो योगी कर रहे हैं, अपने विरोधियों को लेकर हिटलर का ठीक यही रवैया था

Written by Mayank Saxena

Lucknow Hoarding Case

मैंने और हम में से किसी ने ये नहीं देखा था…कभी नहीं देखा था…दरअसल शायद ये मुल्क़ वो मुल्क़ बन पाता, जिन मुल्क़ों में हम अपने बच्चों को पढ़ने और नौकरी करने भेजना चाहते हैं…पर हम ये देख रहे हैं और अच्छा है कि हम देख रहे हैं…क्योंकि हम ये और इससे भी भद्दा और बुरा नहीं देखेंगे तो हम याद नहीं रख पाएंगे कि हम जो इस दौर में भी ज़िंदा थे, जेल में नहीं थे, सड़क पर नहीं थे और चुप थे…हम कितने बड़े अपराधी थे…ये तस्वीर हमको एक समाज के तौर पर हमेशा शर्मिंदा रहने और शायद इस दौर से निकलने के बाद दोबारा ऐसा न होने देने के लिए मजबूर करती रहेगी…

ये तस्वीर लखनऊ की है…इस तस्वीर में एक होर्डिंग है, जिसके जैसी और होर्डिंग्स भी हैं…ये होर्डिंग्स सरकार ने लगवाई हैं और ये क़ानून और संविधान ही नहीं लखनऊ की आत्मा और मूलभूत मानवता की भी धज्जियां उड़ाती हैं…सरकार आपने चुनी है और सीएम अमित शाह ने…इन होर्डिंग्स पर मेरे कुछ बेहद करीबी लोगों के नाम भी हैं…मगर इसमें ऐसा क्या है, जो क़ानून और संविधान की धज्जियां उड़ा रहा है…इसमें सरकार के मुताबिक, सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन में सार्वजनिक संपत्ति को कथित नुकसान पहुंचाने वालों की तस्वीरें, उनके नाम और उनके पते तक हैं…

फिर से पढ़िए…लोगों की तस्वीरें, नाम और उनके पते…जबकि इनमें से ज़्यादातर के ख़िलाफ़ केस दर्ज हुए हैं – मामले पर कोई अदालती फैसला नहीं आया…ये दोषी साबित नहीं हुए हैं…बल्कि इसमें न कुछ गांधीवादी या अहिंसक एक्टिविस्ट हैं, कलाकार हैं-एक पूर्व आईपीएस भी हैं…

तो आखिर सरकार ये कैसे कर सकती है? इस तरह की बेशर्म ग़ैरक़ानूनी हरक़त के पीछे का कारण क्या है…थोड़ा इतिहास में चलते हैं और समझते हैं…

ये दरअसल सीधा-सीधा हेट क्राइम है…यानी कि सरकार के विरोधियों के ख़िलाफ़ हिंसा को उकसावा देना…ये इतिहास के हवाले में वहीं आता है, जहां इसको आना चाहिए…1932 में 37 फीसदी वोट पाकर जब जर्मनी में हिटलर सत्ता में आता है और नाज़ी जर्मनी की ओर बढ़ने की शुरुआत होती है, तब ठीक ये ही होता है…न केवल यहूदियों के ख़िलाफ़ क़ानून से लेकर, उनकी नागरिकता तो दोयम करने की शुरुआत होती है…बल्कि अपने विरोधियों को लेकर हिटलर का ठीक यही रवैया शुरु होता है…हिटलर का विरोध करने वालों को निशाना बनाया जाता है…उनके नाम, पते और चेहरे – देशद्रोही कह कर सार्वजनिक किए जाते हैं…यहूदियों के घर और दुकानों की निशानदेही की जाती है…सड़क पर होर्डिंग और प्लेकार्ड्स के साथ उनके ख़िलाफ़ माहौल बनाया जाता है…(तस्वीरें संलग्न) 1933 आते-आते ये सब सामान्य हो जाता है…तमाम लोगों को देश छोड़ना पड़ता है…6 साल में ही जेल में दोगुने क़ैदी हो जाते हैं…राजनैतिक क़ैदी, जिन पर आपराधिक मुकदमें दर्ज किए जाते हैं…

तस्वीर – जर्मनी, 1933
तस्वीर – जर्मनी, 1934

तो लखनऊ में जो हो रहा है, वो क्या है…वो योगी का चोला ओढ़ कर बैठे, साम्प्रदायिक अपराधी-हेट क्रिमिनल अजय बिष्ट यानी कि विधिक तौर पर सीएम की ओर से इन एक्टिविस्ट्स और प्रदर्शनकारियों को भीड़ का निशाना बनाने की साज़िश है…ज़ाहिर है अदालत इनको बेल दे चुकी है, क्योंकि इनके ख़िलाफ़ कोई ऐसा साक्ष्य नहीं है…तो इन साइको क्रिमिनल्स ने ये नाज़ी तरीका चुना है, इनको रास्ते से हटाने का…ये चेहरे और नाम से भीड़ के लिए निशानदेही और पता सार्वजनिक कर के, सुरक्षित ठिकाना भी छीन लेने की साज़िश है…ये साज़िश है कि अपने समर्थकों की पागल भीड़ से सरकार के ख़िलाफ़ बोलने-लिखने-विरोध करने वालों को डरा कर, उनके ख़िलाफ़ हिंसा कर के, उनकी जान का ख़तरा पैदा कर देने की आपराधिक योजना है…

वरना सोच कर देखिए कि यूपी में न जाने किस तरह के अपराध होते हैं, भाजपा के ही गुंडे न जाने कौन-कौन सी, कैसी हिंसा और अपराध करते रहे हैं…कई तो सरकार में मंत्री हैं…एक विधायक तो रेप और हत्या करवाते रहे, जेल में बैठ कर और सरकार ने कभी ऐसा कुछ किया…

लेकिन सवाल लखनऊ के लोगों से है…क्या आपको ये सब दिखना बंद हो गया है…क्या लखनऊ, राजनैतिक विरोध के लिए किसी की जान लेने या उसे भीड़ का निशाना बनाने के साथ खड़ा हो जाएगा…क्या लखनऊ की सेक्युलर, मानवतावादी आत्मा अब मर गई है…क्या अदालत फैसला देगी या कोई दंगाई भीड़ और उनका नेतृत्व करता कोई मुख्यमंत्री….

मुझे चिंता है…डर है…लेकिन गर्व भी है कि मैं Sadaf Jafar का दोस्त हूं… Deepak Kabir मेरे सीनियर कॉमरेड हैं…और उनका नाम और तस्वीर भी इसमें है…मैं इनके साथ अपने प्राण और प्रण से खड़ा हूं…हम सब से कहीं ज़्यादा हिम्मत उत्तर प्रदेश के हमारे ये साथी दिखा रहे हैं…सदफ़..दीपक भाई…ये होर्डिंग्स आप सबकी वीरता के शिलालेख हैं…हम रहेंगे या नहीं रहेंगे ये लड़ाई चलेगी…आप सब ( S.R. Darapuri सर को मेरा संदेश दें) मेरे लिए प्रेरणा हैं…ताक़त हैं…ये मुल्क़ एक दिन वैसा बनेगा, जैसा उसे होना चाहिए…ये बहुत मुश्किल वक़्त है और ये अंतिम पड़ाव सा है, भारतीय नाज़ियों के ख़िलाफ़ लड़ाई का…हम लड़ेंगे, हम जीतेंगे…

अब अंतिम बात, लखनऊ से…ये मेरा शहर है…कब तक रहेगा, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि इस आपराधिक हरक़त से ये शहर कैसे डील करेगा…क्या ये शहर इस मुख्यमंत्री को जवाब देगा…क्या वाजिद अली शाह, आसफुद्दौला, मजाज़, चकबस्त का शहर…क्या गंगा-जमुनी तहज़ीब का सबसे रोशन मीनारा…क्या मुहब्बत और तहज़ीब का शहर, इस नफ़रत से लड़ेगा…लखनऊ से मेरा रिश्ता इस पर ही निर्भर करेगा…ये कोई धमकी या नफ़रत नहीं…मेरी आत्मा की पुकार है…मुझे लखनऊ जाना था, होली पर…नहीं जाने का फैसला किया है…त्योहार मनाने तब जाऊंगा, जब वाजिद अली शाह फिर से होली खेलेंगे और छन्नूलाल दिलगीर मुहर्रम में फिर से मर्सिया लिखने लगेंगे…

तब तक, इन साथियों को सलाम…हम हैं…जब ज़रूरत होगी, हम वहां आकर आपके साथ खड़े होंगे…ज़िंदाबाद…
-मयंक

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