नई किताब : बच्चों को जलवायु परिवर्तन के मायने समझाएगी यह किताब

jalvayu parivartan

हमारी दुनिया बादल रही है। पहले ये बदलाव धीमी गति से हो रहा था लेकिन अब हालात बादल चुके हैं। आज आप अपनी आँखों के सामने इस बदलाव को देख सकते हैं।

उदाहरण के लिए उत्तर भारत में दशहरा त्योहार ठण्ड के आने का सिग्नल माना जाता था। इस त्योहार पर अलमारी मे रखे रज़ाई और गद्दे निकाल आते थे। लेकिन क्या अब ऐसा होता है? जवाब है नहीं। ठण्ड का मौसम अब आधा दिसंबर गुजरने के बाद शुरू होता है।

अब ज़रा पुराना वक़्त याद कीजिए। वो वक़्त याद कीजिए जब आप स्वेटर पहनना शुरू कर देते थे। क्या अब भी उसी वक़्त स्वेटर पहनना शुरू कर रहे हैं? क्या पेड़ों मे फूल उसी वक़्त आ रहे हैं, जैसे पहले आते थे? अपने परिवार और दोस्तों से बात करके देखिए। इससे भी अच्छा हो अगर हम अपने दादा-दादी से इस बारे मे बात करें।

हम पाएंगे कि बदलाव तो हो रहा है। लेकिन अभी ये बदलाव हमारी ज़िंदगी के लिए चुनौती नहीं बना है। हालांकि बहुत से लोगों, ख़ासकर आपके दोस्तों के लिए ये बदलाव बहुत ख़तरनाक हो सकता है। कोमिक गाँव के किसान सेरिंग के लिए इस बदलाव का मतलब है भोजन की कमी। असम के डीमेकुची मे रहने वाले रामू डेमारी के लिए इस बदलाव का मतलब है मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों का बढ़ना। हार्वी तूफान से पीड़ित आठ वर्षीय जेवियर सालदीर के लिए इस बदलाव का मतलब है मौत।

अब तक ऊपर आपने जो कुछ पढ़ा वो किताब का ही हिस्सा है। किताब ऐसे ही सरल वाक्यों मे जलवायु परिवर्तन के बारे मे बताती है।

किताब का टाईटल है “जलवायु परिवर्तन, 21वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती”

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने जलवायु परिवर्तन कि तेज़ी से बादल रही परिस्थितियों पर शोध कार कर के, इसके बारे में विस्तार से समझाने वाली ये किताब प्रकाशित की है।

CSE की वेबसाइट पर जाकर ये किताब ख़रीदी जा सकती है। नीचे दी गई लिंक आपको वहाँ पहुंचा देगी। https://csestore.cse.org.in/books/climate-change/climate-change-for-the-young-and-curious-hindi.html

डाउन टू अर्थ में प्रकाशित खबर के मुताबिक राजस्थान के अलवर जिले स्थित अनिल अग्रवाल एनवायरमेंट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (एएईटीआई) में चल रहे तीन दिवसीय अनिल अग्रवाल डायलॉग 2020 के दौरान सीएसई की नई किताब जलवायु परिवर्तन, 21वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती का विमोचन किया गया। यह किताब बच्चों को युवाओं को पर्यावरण के प्रति जागरुकता फैलाने के उद्देश्य से तैयार की गई है। किताब बताती है कि जलवायु प्रदूषण इस वक्त की सबसे बड़ी समस्या कैसे है और इसका कैसा दुष्प्रभाव पृथ्वी पर देखने को मिल रहा है। जलवायु परिवर्तन में विश्व और भारत की भूमिका को भी किताब में दिखाया गया है। इसमें विकसित और विकासशील देशों की जिम्मेदारी पर भी विस्तार से लिखा गया है।

इस किताब का विमोचन पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम और नियंत्रण) प्राधिकरण (ईपीसीए) के अध्यक्ष भूरे लाल ने किया। किताब के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा, “मैं सीएसई जैसी साइंटिफिक संस्था का धन्यवाद देना चाहता हूं जिसकी वजह से हमें सतत कार्य करने के लिए मार्गदर्शन मिलता रहता है।“ वह कहते हैं कि उनकी संस्था का सामान्य उद्देश्य है अच्छी हवा, साफ पानी और अच्छा वातावरण जो सबके लिए जरूरी है। इस उद्देश्य को पाने के लिए उन्हें सही रास्ता दिखाने वाली संस्थाओं का भी बड़ा योगदान है।

प्रदूषण की समस्या पर भूरे लाल का मानना है कि आज के समय में कचरे का जलाना और कचरा प्रबंधन सबसे बड़ी समस्या के रूप में सामने है। अगर प्रदूषण से लड़ना है तो कचरा प्रबंधन को ठीक करना होगा। किसी भी जंगल, खाली स्थान को देखते हैं तो दिखता है कि वह कचरा जलाने का स्थान या कचरा फेकने का स्थान बनता जा रहा है। वह कहते हैं कि दिल्ली में इंडस्ट्रियल इलाकों में कचरा प्रबंधन को लेकर बड़े उपाय किए जा रहे हैं।

प्रदूषण नियंत्रण को लेकर किए प्रयासों को लेकर वह कहते हैं कि दिल्ली में 30 इंडस्ट्रियल एसोशिएशन ने कचरा प्रबंधन के लिए करार किया है जिसका असर देखने को मिलेगा और आने वाले समय में पूरे एनसीआर में ऐसी कोशिश की जाएगी। चुनौतियों की बात करते हुए वे कहते हैं कि 2004 में गाड़ियों की संख्या देश भर में महज 5 करोड़ थी जो कि बढ़कर 2016 में 23 करोड़ हो गई। दिल्ली में ऑटोमोबिल की संख्या 70 के दशक में लगभग 8 लाख थी जो कि जो कि आज के समय में एक करोड़ से अधिक है। हमें सार्वजनिक यातायात को बढ़ावा देने की जरूरत है

2018, पिछले 117 सालों मे छठा सबसे गर्म साल रहा

किताब में लिखा है कि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने जनवरी 2019 मे बताया कि साल 2018, पिछले 117 सालों मे छठा सबसे गरम साल था। 2018 छठा ऐसा साल है जब मानसून कि बारिश सबसे कम हुई। इस साल भूमि सतह और वायु का औसत तापमान 1981-2000 के औसत तापमान के मुक़ाबले 0.41 डिग्री सेल्सियस अधिक था। IMD के विश्लेषण के मुताबिक, अब तक सबसे गर्म 11 साल पिछले 15 वर्षों कि अवधि यानि 2002-2018 के दौरान रहे। 2016 और 2017 के बाद 2018 लगातार तीसरा सबसे गर्म साल रहा। यूरोप कि कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस के अनुसार, साल 2019 का सितंबर महीना अब तक का सबसे गर्म सितंबर रहा।

साल 2019 में दुनियाभर में 2.2 करोड़ लोग प्राकृतिक आपदाओं के चलते विस्थापित हुए।

दुनिया की सबसे ऊंची जगह पर बसे गाँव मे जलवायु परिवर्तन का असर

सेरिंग अंगदुई हिमाचल प्रदेश के कोमिक गांव में रहते हैं। उनका गांव दुनिया की सबसे ऊंची जगह पर है। हिमालय की गोद में बसे उनके गांव में कुल 15 परिवार रहते हैं। सेरिंग और गांव के अन्य परिवार ज्वार (बार्ली) की फसल पर मुख्य रूप से आश्रित हैं। उनके पूर्वज पिछली कई पीढ़ियों से भारी बर्फबारी से होने वाली नमी में इस फसल को उगाते रहे हैं। लेकिन पिछले 15 सालों के दौरान यहां बर्फबारी काफी कम हो गई है। पहले दो से तीन मीटर तक बर्फबारी होती थी लेकिन अब हर साल एक मीटर तक ही बर्फ गिर रही है। उनके गांव में ग्लेशियर के पानी से बनी जलधारा थी लेकिन वह 1990 के दशक में गायब हो गई। कभी यहां फसलों को एकत्रित करने के लिए जगह कम पड़ती थी। अब जगह तो है लेकिन फसल कम हो गई है।

धरती तेजी से गर्म हो रही है। जलवायु पहले के मुकाबले अधिक तेजी से बदल रही है। ऐसा क्यों हो रहा है? कौन-सा विज्ञान इसके पीछे है? 21वीं सदी की इस सबसे बड़ी चुनौती के लिए मनुष्य कितना जिम्मेदार है?

क्या विकसित देश इस समस्या के लिए विकासशील देशों से अधिक दोषी हैं? दुनियाभर के देश इस समस्या से निपटने के लिए क्या जरूरी कदम उठा रहे हैं? वर्तमान में कैलिफोर्नि या का सैम अगर कुछ करता है तो उसका प्रभाव पटना के हरि पर भी पड़ता है।

किताब में इस पारस्परिक संबंध को समझने का प्रयास किया गया है। यह किताब जलवायु परिवर्तन से जुड़े तमाम महत्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर तलाशती है और इस मुद्दे पर दुनियाभर में चल रही खींचतान पर भी रोशनी डालती है।

इस खबर में दी गईं जानकारी व आंकड़े सीएसई की वेबसाइट और “डाउन टू अर्थ” मे प्रकाशित खबर से इकट्ठे किए गए हैं।

Anuj Shrivastava

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