वर्धा हिंदी विश्वविद्यालय में गांधी स्मृति व्याख्यान

फ़ोटो सौजन्य : चन्दन सरोज

वर्धा से शिवानी अग्रवाल की रिपोर्ट

यूथ फ़ॉर स्वराज एवं प्रगतिशील छात्रों द्वारा महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में 30 जनवरी को गांधी शहादत दिवस के मौके पर गांधी स्मृति व्याख्यान का आयोजन कस्तूरबा सभागार में किया गया।

व्याख्यान का विषय ‘कल के गांधी-आज का भारत’,(नागरिकता के सवाल और वर्तमान चुनौतियां) था, जिसमें मुख्य वक्ता के रुप में मुंबई हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता ‘फिरदौस मिर्जा’ और गांधीवादी विचारक ‘सुरेश खैरनार’ उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. मनोज कुमार(अधिष्ठाता, शिक्षा विद्यापीठ) ने की। कार्यक्रम संयोजक योगेश जांगिड ने मंच-संचालन किया।

समाजिक कार्यकर्ता और गांधीवादी विचारक सुरेश खैरनार ने अपने व्यक्त्वय में कहा कि “गांधी नर्मदा बचाओ, शाहीन बाग में आज भी जिंदा है।” वे कहते है आज गांधी हर जगह नजर आ रहा है, उन विद्यार्थियों में, उन युवाओं में, उन महिलाओं में, जो अपने हक-अधिकार और संविधान को बचाने के लिए सड़क पर आ रहे है। उन आदिवासी भाईयों में गांधी हैं जो संविधान की प्रस्तवना के लिए सड़क पर उतर आ रहे हैं। महात्मा गांधी के शरीर को उस वक्त मारा गया था, पर आज उनकी आत्मा को मारने की कोशिश की जा रही है। संविधान के मूल में निहित समानता को खत्म करने की कोशिश की जा रही है। वो सरकार से सवाल करते हुए कहते है कि आज इस दौर में ऐसी कौन सी मुसीबत आ गई थी कि नागरिकता कानून लागू करना जरूरी हो गया। जिसके लिए वे शिक्षा के बजट में कटौती करके एन. पी. आर. में लगा रहे है।

वे कहते हैं कि, 30 जनवरी 1948 को गांधी जी को सिर्फ इसलिए मारा गया कि वे मुस्लिमों के बारे में भी सोचते हैं। हम सभी बहुसंख्यकों का दायित्व है कि हम अल्पसंख्यकों के अधिकारों के रक्षक बनें, ये हमारा मौलिक दायित्व है।

मुंबई हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता फिरदौस मिर्जा ने अपने व्यक्त्व में कहा कि, आज जितने भी लोग आवाज उठा रहे हैं वे सभी देशद्रोही बन चुके हैं। मेरी आज की जो ये यात्रा है गांधी को ढूंढने की यात्रा है। आज गांधी होते तो इस कानून को बनते देख कर क्या करते? आजादी के वक्त बहुत लोगों ने कहा था कि ये नाम मात्र की आजादी है, जब विभाजन हुआ तो एक ने धर्म के नाम पर देश मांगा और एक ने धर्म-निरपेक्ष देश मांगा। वो धर्म-निरपेक्ष देश हमारा भारत है। ऐसे सेक्युलर लोग जो धर्मनिरपेक्ष देश मे रहना चाहते थे वे पाकिस्तान से ज्यादा भारत मे ठहर गए।

नागरिकता कानून पहले बहुत ही सरल था, जब 1955 में आया था तब इसमें कानून के अनुसार जो भारत मे पैदा हुआ है वो भारतीय नागरिक हुआ करता था। 2003 में संशोधन के बाद इसके तीन टुकड़े कर दिए। पहला, जुलाई 1987 से पहले जो भी देश में पैदा हुआ है वो भारतीय नागरिक है और जो 1987 से 2003 में पैदा हुआ है, जिसके माँ-बाप में से कोई एक भारतीय है, वो भारतीय नागरिक है। उसके बाद 4 दिसम्बर 2004 के बाद जो पैदा हुआ, उसके मां बाप में से कोई एक भारतीय है और दूसरा पैरेंट इललीगल माइग्रेंट नहीं है तो वो भारतीय नागरिक होगा।

उस वक्त से ही नागरिकता कानून के बीज बो दिए गए थे। नागरिकता कानून से मुस्लिम समुदाय को ही खतरा नही है, बल्कि उन अनाथ बच्चों को भी खतरा है जिनके माँ-बाप का पता नहीं है। ऐसे बच्चे भारत में 2 करोड़ से ज़्यादा हैं, ट्रांसजेंडर जिन्हें परिवार ने नकार दिया है, ऐसे सन्यासी जिनके दस्तावेज में उनके पिता की जगह उनके गुरु का नाम है। अनुसूचित जनजाति के ऐसे आदिवासी लोग जिनके पास किसी भी प्रकार का कोई दस्तावेज नहीं है। भारत में आज भी 58% बच्चों के पास ही जन्म प्रमाण-पत्र हैं और जिनके पास नही है उनकी नागरिकता पर प्रश्न चिन्ह लग जाना निश्चित है।

कार्यक्रम के अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. मनोज कुमार कहते है कि, लोकतंत्र तभी बचा रहेगा, जब उसमें असहमतियों के लिए जगह हो। गांधी असहमति सुनने में विश्वास करते थे। गाँधी धर्म निरपेक्षता की नहीं सर्वधर्म समभाव की बात करते थे। गाँधी के बारे में जो भी झूठ, भ्रांतिया फैली हुई हैं सब बेतुकी हैं। पाकिस्तान का विभाजन गांधी की सहमति से कभी नहीं हुआ था। इसको पढ़ने और समझने की जरूरत है। आज के वक्त में कौन बोल रहा है ये मायने नही रखता, कोई क्यों बोल रहा है और क्या बोल रहा है, ये मायने रखते है।

कार्यक्रम की शुरुआत में तुषार, विशाल और बापू ने गांधी लोकगीत की प्रस्तुति दी। व्याख्यान के विषय का परिचय शुभम जायसवाल ने रखा, वक्ता का परिचय पंकज कुमार ने दिया। अंत में धन्यवाद ज्ञापन किशन पलाश ने किया।

Anuj Shrivastava

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