गंगा की चिंता कीजिए : विमल भाई व पूरन सिंह राणा

23 वर्षीया साध्वी पद्मावती को 20 घंटे बाद दून अस्पताल द्वारा पूरी तरह स्वस्थ घोषित किए जाने पर प्रशासन को आखिर उनको सम्मान वापस मातृ सदन, हरिद्वार लाना पड़ा। उनको बृहस्पतिवार की रात्रि 11:00 बजे उत्तराखंड प्रशासन-पुलिस द्वारा मातृसदन आश्रम, हरिद्वार से उठाया गया था।

एक युवती सन्यासी जो अपने आश्रम में 15 दिसंबर से गंगा के अविरल निर्मल प्रवाह व  अन्य मांगों को लेकर तपस्यारत हो उसको रात्रि 11:00 बजे, उसके आश्रम में जबरन घुसकर जबरदस्ती स्ट्रेचर पर ले जाने की कोशिश और बहुत प्रतिरोध के बाद फिर उसको उठाकर पुलिस एंबुलेंस में ले जाना क्या कानूनी रूप से सही है ?

वीडियो में साफ दिखता है कि उनका स्वास्थ बिल्कुल सही था। वह काफी तेज स्वर में बोल भी रही है और पुलिस के साथ पूरे तर्क कर रही है। जिनका पुलिस कोई जवाब नहीं देती। बस उनको उठाकर ले गई।

माटू जनसंगठन इसकी घोर निंदा करता है और मांग करता है कि गंगा की अविरलता के लिए सरकार तुरंत कदम उठाए। यह जांच होनी चाहिए कि आखिर सभी रिपोर्ट सही होने के बावजूद उनको जीवन रक्षा के नाम पर देर रात्रि में जबरदस्ती क्यों उठाकर ले जाया गया?

गंगा की रक्षा करने की बजाय मात्र सन्यासियों की तथाकथित जीवन रक्षा के नाम पर उनको उनकी तपोस्थली से उठाना गलत है। पूर्व में स्वामी निगमानंद और स्वामी सानंद के उदाहरण हमारे सामने हैं। जिनको आश्रम से उठाया गया और बाद में उनकी संदिग्ध परिस्थितियों में अस्पताल में मृत्यु हुई।

हरिद्वार स्थित मातृ सदन उत्तराखंड में प्रस्तावित और निर्माणाधीन बांधों को तुरंत प्रभाव से रोकने गंगा की, अविरलता-निर्मलता की अन्य मांगों के साथ साध्वी पद्मावती मात्र पानी,नींबू व शहद लेकर तपस्या कर रहीं हैं।

साध्वी पद्मावती के उपवास में अब तक

इस बीच उनके गुरु स्वामी शिवानंद जी की जल मंत्री के साथ भी बातचीत हुई। इस बैठक में गंगा मिशन के निदेशक राजीव भी मौजूद रहे। साध्वी पद्मावती नालंदा बिहार से हैं इस नाते बिहार के मुख्यमंत्री ने भी सप्ताह भर पहले उनको अपने प्रतिनिधि के माध्यम से पत्र भेजकर उपवास समाप्त करने और सरकार से बात कर उनकी मांगों पर ध्यान देने का आग्रह किया था। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पूर्व में उत्तराखंड के निवासी अजय बिष्ट ने भी उन को पत्र भेजकर ऐसे ही आग्रह किया था। अजय बिष्ट जी को गंगा यात्रा आरंभ करनी थी शायद इसलिए यह पत्र भेजकर गंगा के प्रति अपना प्रेम दिखाने की कोशिश की गई थी।

नए बांध नहीं! किंतु सरकार का सात बांधों पर रुख अड़ियल 

ज्ञातव्य है कि मातृ सदन के ही एक सन्यासी ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद ने 194 दिन का उपवास इस समझ के साथ समाप्त किया था कि सरकार उनकी मांगों पर कार्यवाही करेगी। फरवरी 2019 के अंतिम सप्ताह में प्रधानमंत्री कार्यालय में तत्कालीन प्रधान सचिव श्री नृपेन मिश्रा की अध्यक्षता में उत्तराखंड के प्रमुख सचिव व अधिकारियों के साथ एक बैठक में यह निर्णय लिया गया था कि गंगा पर प्रस्तावित बांध अब नहीं बनेंगे। नितिन गडकरी ने भी तत्कालीन जल संसाधन मंत्री होने के नाते उस समय कई बार व्यक्तिगत मुलाकात में भी यह कहा कि  गंगा पर नए बांध नहीं बनेंगे।  भले ही उन पर 10 या 15% कार्य हो चुका हो। किंतु उस बैठक के मिनिट्स आधिकारिक रूप से बाहर नही आए। यद्यपि जल मंत्री तथा पर्यावरण सचिव ने व्यक्तिगत बातचीत में कहा कि हम कोई नोटिफिकेशन नहीं लाएंगे, मगर गंगा पर नए बांध नहीं बनेंगे।

सरकार का सात निर्माणाधीन बांधों पर रुख अड़ियल रहा है। फरवरी 2019 की बैठक में इन 7 बांधों पर समिति भेजकर स्थिति जानने की घोषणा भी की गई।  समिति तो गई मगर उनकी रिपोर्ट कभी बाहर नहीं आई। बांध के काम चालू रहे।

1-मध्यमेश्वर व 2-कालीमठ यह दोनों ही 10 मेगावाट से कम की परियोजनाएं हैं जो कि मंदाकिनी की सहायक नदी पर हैं। 

3- फाटा बयोंग (76 मेगावाट) और 4- सिंगोली भटवारी (99 मेगावाट) मंदाकिनी नदी पर है।

5- तपोवन-विष्णुगाड परियोजना (520 मेगावाट) का बैराज धौलीगंगा और पावर हाउस अलकनंदा पर निर्माणाधीन है। इससे विष्णुप्रयाग समाप्त हो रहा है।

6- विश्व बैंक के पैसे से बन रही विष्णुगाड-पीपलकोटी परियोजना (444 मेगावाट) अलकनंदा पर स्थित है। 

7- टिहरी पंप स्टोरेज (1000 मेगा वाट) टिहरी और कोटेश्वर बांध के बीच पानी का पुनः इस्तेमाल करने के लिए।

इन बांधों के नाम बनने से राज्य को होने वाले प्रतिवर्ष 12% मुफ्त बिजली के नुकसान को केंद्र सरकार ग्रीन बोनस के रूप में दे सकती है। जो कि 200 करोड़ से भी कम होगा।

सरकार ने पिछले दिनों गंगा के बजट में 50% के करीब कमी की है! यह बताता है कि सरकार को गंगा की कितनी चिंता है? एक तरफ बांधों से गंगा की हत्या, दूसरी तरफ सफाई के बजट में इतनी कमी?

अर्थशास्त्री डॉक्टर भरत झुनझुनवाला ने केंद्र व राज्य सरकार के अधिकारियों, यहां तक कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तक यह बात पहुंचाई कि खासकर सिंगोली-भटवारी और विष्णुगाड-पीपलकोटी परियोजना राज्य के आर्थिक हित में भी नहीं है। किंतु उत्तराखंड सरकार व केंद्र सरकार इसी पर अड़ी रही है। विष्णुगाड-पीपलकोटी बांध परियोजना के प्रभावित लगातार अपनी मांगों को लेकर धरना देते रहे हैं।

2013 की आपदा के बाद भी सिंगोली भटवाड़ी परियोजना की पर्यावरणीय परिसतिथी व मुद्दों पर कोई जांच नहीं हुई। यह परियोजना अभी पूरी होने को आई है। भविष्य में यह घातक ही रहेगी। गंगा के अविरल प्रवाह के लिए इन परियोजनाओं को निरस्त करना अत्यंत आवश्यक है।

गंगा के प्रभाव को अविरल और निर्मल रखने के लिए गंगा पर निर्माणाधीन बांधों को निरस्त करना होगा सिंगोली भटवारी विष्णुगाड-पीपलकोटी और तपोवन-विष्णुगाड परियोजना को तुरंत प्रभाव से रोका जाए। 

तप करने वाले संतो को निशाना ना बनाया जाए वरन उत्तराखंड में बांधों से हो रहे आर्थिक, पर्यावरणीय और जनहक नुकसान वह गंगासागर  तक गंगा की और भविष्य के खतरों को देखते हुए केंद्र व राज्य सरकार को चाहिए कि वह गंगा के लिए सकारात्मक कदम उठाए।

Anuj Shrivastava

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

वर्धा हिंदी विश्वविद्यालय में गांधी स्मृति व्याख्यान

Sat Feb 1 , 2020
वर्धा से शिवानी अग्रवाल की रिपोर्ट यूथ फ़ॉर स्वराज एवं प्रगतिशील छात्रों द्वारा महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में […]