रोहित वेमुला का आख़िरी खत : शरद कोकास की कविता

रोहित वेमुला ने अपनी आत्महत्या से पूर्व जो ख़त लिखा था उसे पढ़ने के बाद जो तकलीफ़ मुझे हुई उसने इस कविता को जन्म दिया। चाहें तो आप भी पढ़ सकते हैं वह ख़त आज रोहित के स्मृति दिवस पर – शरद कोकास

रोहित वेमुला का आख़िरी ख़त

“जब आप यह ख़त पढ़ रहे होंगे
मैं इस दुनिया में नहीं होऊंगा”

जिस तरह प्राण निकलते हैं देह से
उसी तरह निकले होंगे यह शब्द
रक्त ठहर गया होगा शिराओं में कुछ वक़्त के लिए

दूसरों की सुबह में कड़वाहट घोलने के लिए क्षमाप्रार्थी उँगलियों ने
सुहानी सुबह की कामना लिखी होगी
मित्रों परिजनों के लिए
अपने जीवन को मृत्यु के हवाले करने से पहले
विगत और आगत के बीच झूलती रस्सी से
गुजरे होंगे उसके विचार

आख़िरी बार शब्दों को कागज़ पर उतारते हुए
उसने सोचा होगा
उसे तो कोई हड़बड़ी नहीं थी
फिर क्यों दौड़ता रहा जीवन के पथरीले रास्तों पर
क्यों हवाओं पर सवार होकर
वह तारों के पार जाना चाहता था
नदियों सा उमडना घुमडना
झरनों सा मचलना चाहता था
इतिहास की रहस्यमयी गुफाओं में खोजना चाहता था
प्रकृति और मनुष्य के बीच गुम हो चुके सम्बन्ध
विज्ञान की उपत्यकाओं में तलाशना चाहता था मनुष्य की अस्मिता
आस्था की अंधी गलियों में भटकते लोगों को बताना चाहता था
कि सूरज जो डूबता हुआ रोज दिखाई देता है
दरअसल कभी नहीं डूबता
हवा जो साँस के रूप में आखरी बार निकलती है
यहीं मौज़ूद रहती है
जीवन जो किसी देह के भीतर समाप्त होता प्रतीत होता है
करोड़ों करोड़ लोगों की देह में उपस्थित रहता है
विचार बनकर

दुनिया के तमाम लोगों से प्यार करना चाहता था वह
जानते हुए भी
कि यह लोग प्रकृति से कब के दूर हो चुके हैं
और उनकी पहचान सिर्फ एक वोट
एक नंबर
और एक वस्तु के रूप में बची है
मनुष्य को उसकी इस तात्कालिक पहचान से परे
वह बताना चाहता था उसकी असलियत और उसकी ताकत

दुर्घटना वहाँ क्या मायने रखती है
जहाँजहाँ जन्म ही एक दुर्घटना हो
इच्छाएं जहां दम तोड़ देती हों घुटन के माहौल में
प्रतिशोध अपनी निरर्थकता में
जीवन की व्यर्थता के पक्ष में मत देता हो
और बदला लेने के लिए जीवित रहने में कोई अर्थ न दिखाई देता हो
आदर्शों का गला घोट दिया जाता हो
स्वार्थस्वार्थ की दहलीज़ पर
दोषारोपण का कोई औचित्य न प्रतीत होता हो
और सबको माफ़ कर देने के अलावा
कोई रास्ता न दिखाई देता हो
यह सब कुछ वह किताबों में लिखना चाहता था
रचना चाहता था वह मनुष्य की चेतना का महाकाव्य
लेकिन अफ़सोस ..उसे आख़िरी ख़त लिखना पड़ा

एक नाव था उसका जीवन
जिसमे बचपन से ही प्यार का अभाव था
षडयंत्र का एक छेद था
जिससे निरंतर प्रवेश करते रहे
दुःख पीड़ा अवसाद और उपेक्षाएँ
शिकायतों के चप्पू लिए मांसपेशियों में आक्रोश भरकर
वह खेता रहा सपनों की नाव
और कोशिश करता रहा मनुष्यता के द्वीप तक पहुँचने की
लेकिन हार गया वह
डूबने से पहले फेंक दीं उसने पतवारें
इच्छाओं और अपेक्षाओं का बोझ उतार दिया
दूर फेंक दिया सपनों को
खाली कर दिया अपने आप को भीतर से
भुला दी ज़माने से की गई सारी शिकायतें
माफ़ कर दिया उन लोगों को
जो लोग उसकी मृत्यु के लिए ज़िम्मेदार थे
अंततः छोड़ दी उसने अपनी नाव
मृत्यु के अथाह समंदर में चुपचाप डूब जाने के लिए

रोहित वेमुला के आख़िरी ख़त को वे लोग
एक मरे हुए साँप की तरह लाठियों से पीटते रहे
भयभीत होते रहे इस बात को लेकर
कि वेवे शब्द आग की तरह फ़ैल जायेंगे
और बस जायेंगे करोड़ों दलित शोषित और वंचितों की देह में
भविष्य की विडम्बनाओं में एक पुकार सी उठेगी
और फिर अंतिम बार लिखा जायेगा शोषण का अध्याय

इस बात को दर्ज किया जाए कहीं
कि एक जान करोड़ो जान बनकर फिर आएगी
भविष्य की कोख में पलते सपने फिर जन्म लेंगे
रोहित वेमुला के लिखे आख़िरी ख़त की तरह
कवि लिखेंगे अन्याय अत्याचार और असमानता पर

आख़िरी कविता

Anuj Shrivastava

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