छत्तीसगढ़ : घटियारी का शिव मंदिर

फ़ोटो : अजय चंद्रवंशी

भोरमदेव के फणिनागवंशियो के अवशेष मैकल श्रेणी के समानांतर दूर-दूर तक फैले हैं. उत्तर में पचराही से लेकर दक्षिण में खैरागढ़ क्षेत्र तक विभिन्न स्थलों में पुरातत्विक साक्ष्य मिलते हैं. दक्षिण में गंडई-पंडरिया के आस-पास के क्षेत्रों में गंडई का भांड़ देऊर मंदिर, घटियारी का शिव मंदिर प्रमुख हैं. इसके अलावा बिरखा, कटंगी, बिलहरी, बिरोड़ा, भड़भड़ी, कीरितबाँस आदि स्थलों से तत्कालीन समय की मूर्तियां और प्रस्तर खण्ड प्राप्त हुए हैं. इस क्षेत्र से प्राप्त कई मूर्तियां सम्प्रति खैरागढ़ संगीत विश्व विद्यालय के पुरातात्विक संग्रहालय में है.

घटियारी, गंडई से पश्चिम दिशा में लगभग 5 कि.मी. की दूरी पर है. वर्तमान में यह ग्राम आबादी विहीन है. मगर पास ही पूर्व में ग्राम बिरखा और उत्तर में कटंगी है.  तालाब और शिव मंदिर के होने से प्रतीत होता है कि कभी यहां लोग रहते रहे होंगे.

फ़ोटो : अजय चंद्रवंशी

घटियारी के तुरन्त बाद पश्चिम में जंगल प्रारम्भ हो जाता है. अवश्य पूर्व में यह घटियारी से आगे तक रहा होगा. घटियारी के वर्तमान मंदिर स्थल में उत्खनन पूर्व केवल टीला था. पुरातत्व विभाग द्वारा 1978-79 में उत्खनन कराने से मंदिर उभर कर आया. इस  संबंध में डॉ पीसी लाल यादव ने अपने बचपन का रोचक वर्णन किया है

वे बताते हैं कि “बात तब की है जब मैं विद्यार्थी था. 8वी-9वीं में पढ़ता था. तब इस जंगल में अघुवा बनकर भौजी की लकड़ी लेने के लिए जाता था. गांव की महिलाओं के साथ हमारी बड़ी भौजी लकड़ी लाने जंगल जाती थी. तब हम पड़ोस के बच्चे घटियारी तक जाते थे. उनके बोझा से कुछ लकड़ी निकालकर स्वयं लाते थे. इससे उनका बोझ हल्का हो जाता था. अब भी लोग अघुआ जाते हैं. तब हम बच्चे लकड़हारिनों का इंतज़ार करते. घटियारी तालाब के किनारे पास के टीले पर खेलते थे. वहीं पर नंदी की मूर्ति थी. लोहे का बना एक टेपरा था. हम बच्चे उसी नंदी की पूजा करते, टेपरा बजाते और तब तक खेलते रहते जब तक कि लकड़हारिनें हमें पुकारती नही थीं. बालमन की स्मृतियां इस मंदिर को देखकर आज भी मन को आनंदित कर देती हैं. तब किसी को ऐसा कहां अनुमान था कि उस टीले में हमारी यह पुरा संपदा छिपी है. घटियारी की पुरातात्विक आभा के साथ-साथ सागौन व पलास वृक्षों से आच्छादित इसकी प्राकृतिक शोभा बड़ी निराली थी.”

फ़ोटो : अजय चंद्रवंशी

उत्खनन से प्राप्त यह भग्न शिव मंदिर भूमिज शैली का है. गर्भगृह सहित विमान तक का भाग एक साथ अवस्थित है. शिखर भग्न है. मंदिर वास्तु के भग्नावशेष इसी परिसर में रखे हुए हैं. स्थापत्य शैली की दृष्टि से यह 12वीं-13वीं शताब्दी का प्रतीत होता है. वास्तु अवशेषों के अतिरिक्त कई देव प्रतिमाएं विद्यमान हैं; जिनमे राजपुरूष, गणेश, खड्गासनस्थ तीर्थंकर, स्थानक विष्णु, योद्धा, प्रतीक्षारत नायिका, भैरव, गवाक्ष,  नृत्यरत शिव, चामरधारिणी, शिवलिंग पूजारत उपासिका, राम-हनुमान, महिषासुर मर्दनी प्रमुख हैं. चारो दिशाओं में चार जलहरियाँ होने के कारण चार अनुषांगिक देवालय होने का संकेत मिलता है. मंदिर का अधिष्ठान तीन तलों में विभक्त है. गर्भगृह का प्रवेश द्वार पंचशाखायुक्त है. मुख्य प्रवेश द्वार,.सभामण्डप,.अंतराल,.गर्भगृह प्रवेश द्वार सभी भग्नावशिष्ठ हैं. आस-पास छोटी -छोटी पहाड़ियों और घाटियों के कारण डॉ सीताराम शर्मा ‘घाटराही’ से ‘घटियारी’ अपभ्रंषित होना सम्भावित मानते हैं.

मंदिर स्थापत्य (डॉ सीताराम शर्मा के आधार पर)

वर्तमान में मंदिर का केवल गर्भगृह तथा उसके सामने स्थित मंडप प्राप्त हुआ है. मंदिर की दीवारें तथा शिखर का भाग गिरकर कई खण्डों में विभाजित हो गए हैं.

प्रवेश द्वार

फ़ोटो : अजय चंद्रवंशी

मंदिर पूर्वाभिमुख है. गर्भगृह का प्रवेश द्वार पत्थर निर्मित और अलंकृत है, जो पंचशाखाओं से युक्त है. प्रथम शाखा जे निचले भाग में दोनो ओर देवमूर्तियाँ स्थानक स्थिति में हैं. उनकी मुखाकृति गोल, सिर पर जटाजूट, कानो में भारी कुंडल, हार और बाजूबन्द आदि अनेक आभूषण अलंकृत हैं. इन देवमूर्तियों के ऊपर दोनो ओर मयूर तथा उसके ऊपर लतापत्रक अलंकरण हैं. द्वितीय शाखा के निचले भाग में दाहिनी ओर चतुर्भुजीय पार्वती स्थानक स्थिति में हैं.

वे अपने हाथों में गदा, डमरू, सर्प एवं अक्षमाला लिए हुए है. चतर्भुजी शिव की मूर्ति बाँई ओर है. उनके दाहिनी ओर गदा है जिसकी मूठ पर बाँई हथेली रखी हुई है। दाहिना हाथ अभय मुद्रा में है. ऊपरी दाहिने हाथ में डमरू तथा ऊपरी बाएं हाथ में मुण्ड सहित त्रिशूल अंकित है. नीचे भाग पर नंदी की आकृति है. द्वितीय शाखा में इन आकृतियों के ऊपर दोनो तरफ पतले दीवाल-स्तम्भ बने हुए हैं. इनके निचले भाग पर ज्यामितिक रेखाओं का अलंकरण तथा ऊपर घटपल्लव है.

फ़ोटो : अजय चंद्रवंशी

घट के निचले भाग में दोनो बाजुओं में कीर्तिमुखों को दिखाया गया है, जिससे सांकल और घण्टियाँ लटक रही हैं. प्रवेश द्वार की तृतीय शाखा में नीचे की ओर शिव की चतुर्भुजी मूर्तियां और ऊपरी भाग में हाथ जोड़े उपासक गण हैं, जिन पर सर्प के फनो का आटोप है. चौथी तथा पांचवी शाखा में भी नीचे शिव की मूर्तियां और ऊपरी भाग में दीवाल-स्तम्भ के अलंकरण बने हैं. प्रवेश द्वार का धरण भी सुसज्जित है.

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ऊपरी चौखट के निचले भाग के मध्य में चतुर्भुजी गणेश सुखासन में वीणाधारी विद्या सहित विराजमान है. मध्य चौकी पर विभिन्न वाद्य और नृत्य करती हुई देवांगनाएँ अंकित हैं. चौकी के दाहिनी ओर चतुर्भुजी सरस्वती तथा चतुर्भुजी गणेश की छोटी-छोटी आकृतियां बनी हैं. लंबाई 5 फुट 4 इंच तथा चौड़ाई 2 फुट 4 इंच है.

गर्भगृह

फ़ोटो : अजय चंद्रवंशी

अलंकृत प्रवेश द्वार को लाँघकर गर्भगृह ने सात सीढ़ियों से नीचे उतरकर पंहुचा जाता है. गर्भगृह पूर्व से पश्चिम 16 फुट 4 इंच और उत्तर-दक्षिण 14 फुट 4 इंच चौड़ा है तथा उसकी गहराई 9 फुट 8 इंच है. पार्श्व दीवारें सुदृढ़ पत्थरों से बनी हैं. प्रस्तर निर्मित दीवारें 9 फुट 8 इंच उँची हैं जिसकी ऊपरी कपोत अलंकृत है. दीवाल के तीनो बाजू आले बने हुए हैं जिससे गर्भगृह का स्वरूप स्वस्तिक के आकार का बन जाता है तथा अंदर की दीवार विभिन्न कोणों को बताती है. बाजू के दोनो आले वर्तमान में रिक्त हैं केवल पृष्ठ दीवार के आले में महिषासुरमर्दिनी की मूर्ति बनी है. गर्भगृह के मध्य में जलहरी पर शिवलिंग है. जलहरी दीर्घाकार है परन्तु वर्तमान शिवलिंग का ऊपरी भाग अनगढ़ है. इससे स्पष्ट आभास होता है कि यह वास्तविक शिवलिंग नही है. जलहरी का प्रस्तर काला और चमकदार है जो इसे नित्य नवीन निरूपित करता है. गर्भगृह की दाहिनी दीवार के पास एक भारी भरकम नांद रखी है. इसके ऊपर दीवार में बनी नाली में पानी आने का मार्ग दिखाई देता है. नाली का गोमुख टूटा पड़ा है, संभवतया उत्खनन के समय या मलबा हटाते समय खण्डित हुआ हो. गर्भगृह की दायीं दीवार के मध्य में पानी के निकास के लिए एक डिस्री नाली भी निर्मित है.

मंडप

फ़ोटो : अजय चंद्रवंशी

प्रवेश द्वार के सामने छोटा सा मंडप बना है जिसकी पार्श्व दीवारों को उत्खनित किया गया है. दोनो दीवारों के बीच का अंतर 7 फुट 10 इंच है. मण्डप की ऊंचाई 5 फुट 3 इंच है. इसमे कुल चार स्तम्भ हैं जो दो मध्य में और दो पार्श्वों मे अवस्थित है. मध्य का एक स्तम्भ सुरक्षित है परंतु शीर्ष भाग भग्न है. इस स्तम्भ से मन्दिर के सभामण्डप स्थित स्तंभो की कल्पना सम्भव है. स्तम्भ की चौकी तीन तलों में बनी है जिसकी यष्टि छोटे आकार की है. ऊंचाई 4 फुट 10 इंच तथा 12 पहल युक्त है. ऊपर का का शीर्ष घटाकृति युक्त है. इसके ऊपर विभिन्न कोण युक्त चौकी हैं जिस पर छत की धरण आधारित रही होगी. स्तम्भ की ऊंचाई से यह अनुमान होता है कि इस मंदिर की छत अधिक ऊंची नही रही होगी. दाहिने ओर की आले में महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा तथा बायीं ओर के आले में गणेश की. प्रतिमा विराजमान है जो कलात्मक रूप से उत्कृष्ट है.

मंदिर निर्माता

मंदिर से किसी भी प्रकार के शिलालेख/मूर्तिलेख प्राप्त न होने से मन्दिर निर्माता की जानकारी नही हो पाती. चूंकि इस क्षेत्र में फणिनागवंशियों के अधिपत्य होने से फणिनागवंशी किसी शासक अथवा उसके किसी सामंत द्वारा मन्दिर निर्माण कराया जाना प्रतीत होता है. वैसे यशोराज देव(जसराज देव) की कलचुरी संवत 934[1182ई.]  घटियारी से कुछ दूर ही उत्तर में सहसपुर से प्राप्त हुआ है. घटियारी का मंदिर भी स्थापत्य की दृष्टि से लगभग 12 वी शताब्दी का प्रतीत होता है. इसलिए यशोराज के मंदिर निर्माता की सम्भावना पर विचार जा सकता है. बहरहाल यह शोध का विषय है.

घटियारी के पास के अन्य पुरातात्विक स्थल

बिरखा

फ़ोटो : अजय चंद्रवंशी

घटियारी से 1 कि.मी. पूर्व में. इस ग्राम के माता देवालय में शिव की शक्ति, शिवानी की एक दुर्लभ मूर्ति है. यह काले पत्थर की बनी है. पंचतल मुकुट की शिरोभूषा है. ऊपर की दाहिनी भुजा खंडित तथा नीचे में अक्षमाला है. उर्ध्ववामहस्त ने दर्पण तथा नीचे कमल है. चौकी के ऊपर तीन नरमुंड बने हैं. बायीं ओर शिव तथा दाहिनी ओर स्त्री उपासिका है।. देवी का अलंकरण बड़ा ही भव्य है. देवी सप्तमातृकाओं में से एक है.

इसी मंदिर में एक और भव्य प्रतिमा है, जिसमे पांच पुरुष शरीर के साथ एक ही सिर जुड़ा हुआ है. किसी भी ओर से देखने पर वह पांच मूर्तियां पूर्ण रूप से दिखाई पड़ती है. यहां एक प्राचीन कुआं भी है जिसे लोग बीहर कुआँ कहते हैं.

कटंगी

फ़ोटो : अजय चंद्रवंशी

ग्राम बिरखा से कुछ दूरी पर (घटियारी से उत्तर में 1 कि.मी.) कटंगी ग्राम के सीमांत में काले पत्थर से निर्मित विष्णु की एक खण्डित मूर्ति है।. मूर्ति शिल्प की भव्यता उच्चकोटि की है. इस मूर्ति के आस-पास बिखरे हुए अवशेषों के अवलोकन से ज्ञात होता है कि यहां भव्य मन्दिर रहा होगा. भग्नावशेषों में एक स्तम्भ भी प्राप्त हुआ है जो विश्वविद्यालय के संग्रहालय में सुरक्षित है. इसी ग्राम की प्रवेश सीमा पर उपासक राजा की वाम तथा दक्षिण पार्श्वों में रानियों सहित मूर्ति है. मूर्ति के ऊपर छत्र सुशोभित है.

भड़भड़ी

फ़ोटो : अजय चंद्रवंशी

घटियारी से लगभग 2 कि.मी. दक्षिण में. यहां क्षेत्रीय बोली के अनुसार ‘द्रुपदा'(कमला) की स्थानक मूर्ति है. प्रतिमा विज्ञान के लक्षण के अनुसार यह मूर्ति विष्णुप्रिया ‘कमला’ की है. अपने दो दाहिने हाथों में शंख और चक्र धारण किये हुए है, तथा अन्य दो बाएं हाथों में गदा और कमल लिए हुए है.





संदर्भ
(1) भोरमदेव क्षेत्र: पश्चिम दक्षिण कोशल की कला- डॉ सीताराम शर्मा(1990)
(2) जहां पाषाण बोलते हैं- डॉ पीसीलाल यादव(2008)
संकलन व आलेख :- अजय चन्द्रवंशी, कवर्धा (छ.ग.)

Anuj Shrivastava

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