शालवनों का द्वीप : बस्तर की एक और छवि

बस्तर अपनी दुर्गम भौगोलिक स्थिति और आदिम जनजातीय संस्कृति के कारण बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में मानवशास्त्रियों के आकर्षण और अध्ययन का केंद्र रहा है। ग्रियर्सन का ‘माड़िया गोंड्स ऑफ बस्तर’ के बाद वेरियर एल्विन का ‘मुरिया एंड देयर घोटुल’ विश्व प्रसिद्ध हुआ।यों इनके पूर्व और बाद भी स्थानीय साहित्यकारों, भाषाशास्त्रियों द्वारा अध्ययन होते रहे हैं। शानी जी इस क्षेत्र से चर्चित कथाकार हुए हैं; जिनका हिंदी कथा जगत में अपना विशिष्ट स्थान है।किसी भी कथाकार की तरह वे भी अपने कहानियों में अपने परिवेश को चित्रित करते रहे हैं।

मगर ‘शालवनों का द्वीप’ एक अलग तरह की कृति है। यह उपन्यास नही है मगर इसको पढ़ते समय उपन्यास का अहसास होता है।यह तटस्थ यात्रा विवरण भी नही है। यह एक तरह से जनजातियों के बीच रहते हुए; उनके जीवन व्यापारों को देखते, उनके सुख-दुख,पीड़ा, आनन्द से एक कथाकार और सम्वेदनशील व्यक्ति का संवेदनात्मक जुड़ाव है। इस जुड़ाव में आत्मालोचन भी और स्थिति को न बदल सकने की बेबसी की छटपटाहट भी है। चूंकि चित्रण एक कथाकर ने किया है, इसलिए इसमे कथारस भी है।

इस अनुभाविक चित्रण का आधार बस्तर में मानवशास्त्रीय अध्ययन के लिए आये अमेरिकन युवा शोधार्थी जे.जे. एडवर्ड और उनकी पत्नी फिलिस के साथ लेखक द्वारा बस्तर के ‘ओरछा’ में बिताये दो माह का समय है।इस दौरान लेखक ने उन चरित्रों और घटनाओं को करीब से देखा है, जो इस पुस्तक में चित्रित है। यद्यपि यह समाजशास्त्रीय अथवा मानवशास्त्रीयअध्ययन नही है तथापि इसमे जनजातियों के संस्कृति, कर्मकांड और लोकाचार का चित्रण है। श्री एडवर्ड ने भूमिका में उचित ही लिखा है ” श्री शानी की यह रचना शायद उपन्यास नही, एक अत्यंत सूक्ष्म संवेदनायुक्त सृजनात्मक विवरण है जो एक अर्थ में भले ही समाजविज्ञान न हो लेकिन दूसरे अर्थ में यह समाजविज्ञान से आगे की रचना है”।

जे.जे. एडवर्ड साठ के दशक के शुरूआत में बस्तर में शोध के लिए आये थे। उन्होंने लगभग दो वर्ष बस्तर के ‘ओरछा’ में रहकर अपना शोधकार्य किया था।इस अध्ययन के सिलसिले में ही शानी से उनका सम्पर्क हुआ और उनमे मित्रता हुई। शानी जी ने इस पुस्तक में एडवर्ड दम्पत्ति की सहजता, आदिवासियों से प्रेम, मानवीयता, सम्वेदनशीलता की जगह-जगह प्रशंसा की है।एडवर्ड जनजातियों के लिए अध्ययनकर्ता से अधिक सहयोगी थे।वे उनकी कई तरह से सहयोग करते थें जिसमे चिकित्सकीय सहयोग का मार्मिक चित्रण है,जबकि वे चिकित्सक नही थे।उनकी पत्नी भी अपनी सहजता और मानवीयता के कारण जनजातियों के प्रेम की भागी थी। एडवर्ड की सहजता कई बार शानी जी को आत्मालोचन के लिए विवश कर देती थी मसलन एक घटना में एडवर्ड ने आश्चर्य व्यक्त किया की यहां(भारत में) थोड़ा भी धनाड्य होने पर लोग अपना छोटा-छोटा काम भी स्वयं न कर नौकर से कराते हैं, जबकि अमेरिका में ठीक इसका उल्टा होता है। वहां ऐसे लोग बेचारे अपाहिज समझे जाते हैं, जिन पर समाज तरस खाता है। जाहिर है ऐसी प्रदर्शनप्रियता को समाज के लिए सकारात्मक नही माना जा सकता। एक अन्य जगह एडवर्ड को गंभीर रोगों से ग्रस्त लोगों की चिकित्सा सहजता से करते देख लेखक को अपनी स्थिति का अहसास होता है।

इस रचना में यह भी देखा जा सकता है कि जनजातीय समाज को केवल रोमेंटिक ढंग से देखने वालों का दावा कितना खोखला रहा है। कुछ लोगों को जनजातियों का केवल नृत्य-गीत -संगीत भर दिखाई देता है; उनके जीवन संघर्ष नही। मानो वे किसी अलौकिक दुनिया में रहते हैं और उन्हें भूख प्यास नही लगती। शानी जी ने दिखाया है कि किस कदर उस क्षेत्र में भूख-गरीबी-बीमारी का आतंक है। वहां अधिकांश लोगों के लिए दो जून की रोटी जुटा लेना ही उपलब्धि रहा है।केय, रेको, लाली के जीवन की विडम्बना में इसे देखा जा सकता है। तपेदिक से मर रहे ‘लाली’ का प्रसंग बेहद मार्मिक है।इसी तरह ‘कोसी’ की उन्मुक्त हँसी जितना आकर्षित करती है; बाघ द्वारा उसका मारा जाना एक कसक पैदा कर देती है।

मुड़िया जनजाति का ‘घोटूल’ चर्चित रहा है। देखा जाय तो यह वेरियर एल्विन के शोध के बाद अधिक चर्चा में आया। एल्विन ने घोटुल के उन्मुक्त यौन सम्बन्धो और उसके नियमन पर काफी लिखा है; जिसका कुछ लोग आलोचना भी करते हैं। हालांकि ‘मुरिया एंड देयर घोटुल’ में केवल यौन प्रसंग नही अपितु मुरिया जनजाति का सम्पूर्ण अध्ययन है।एल्विन के दृष्टिकोण या अध्ययन के बलाघात से कोई असहमत हो सकता है मगर चालीस के दशक में घोटुल के यौन उन्मुक्तता से इंकार नही किया जा सकता।यह जीवन राग का उल्लास रहा है। नैतिक-अनैतिक समय और समाज सापेक्ष होते हैं। इस कृति में शानी जी ने ‘घोटुल’ का जो चित्रण किया है इससे इस बात की पुष्टि होती है।मगर यह बताने की आवश्यकता नही की घोटुल संस्कृति-शिक्षा का केंद्र भी रहा है। शानी ने लिखा भी है “यह भी एक पहलू है, मैने सोचा- लेकिन केवल यही सबसे ज़्यादा हमारी दृष्टि की मांग करता हो, ऐसा भी नही है।”

समय बदल रहा है। बस्तर ने भी पिछले पचास-साठ सालों में बदलाव आया है। अब अब वहां आवागमन कठिन नही रह गया है। बाज़ारवाद और नगरीकरण के प्रभाव से जनजातीय संस्कृति में भी काफी बदलाव आया है।घोटुल अब विलुप्त प्राय हैं; जो हैं केवल औपचारिक भर रह गए हैं। लेकिन बस्तर की खुशहाली को जैसे ग्रहण लगा हुआ है। समस्याएं खत्म ही नही होती। आज नक्सलवाद, जल-जंगल-ज़मीन से बेदखली,पर्यावरण की समस्याएं मुह बाये खड़ी हैं।ऐसे में ‘शाल वनों का द्वीप’ जैसी कृतियां और उनके चरित्र और सिद्दत से याद आते हैं।क्या बस्तर की वह उन्मुक्त हँसी वापस आयेगी?

आलेख- अजय चन्द्रवंशी, कवर्धा(छ.ग.)

Anuj Shrivastava

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