वादे से मुकर गई भूपेश सरकार, 20 गाँव के लोगों ने धरना स्थल में मनाई दिवाली, प्रकृति की रक्षा का संकल्प

धरना स्थल पर मौजूद ग्रामीण

छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में परसा, पातुरिया, गिड़मूड़ी, मदनपुर साउथ आदि कोल खनन परियोजनाओं के खिलाफ़ आज पंद्रहवें दिन भी ग्रामीणों का आंदोलन जारी है। कल पूरे देश ने घरों मे दिवाली मनाई लेकिन ये आदिवासी आंदोलन स्थल पर ही डटे रहे क्योंकि वो जमीन जिसे छत्तीसगढ़ की भूपेश सरकार अडानी जैसे उद्योगपतियों को खदानें खोलने के लिए दे रही है वही जमीन इन आदिवासियों का घर है वो छिन गई तो जीवनभर कि दिवाली खत्म हो जाएगी।

धरने पर बैठी महिलाओं ने कहा कि सरकार हमारे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन कर, पीढ़ियों से बसे गांव उजाड़ रही है, जंगल का विनाश कर रही है। इस स्थिति में हम दिवाली त्यौहार कैसे मनाएं। हमारी लड़ाई तो अपनी आजीविका, संस्कृति, एक तरह से जीवन बचाने की लड़ाई है जिसे हम जारी रखेंगे क्यूंकि और कोई विकल्प ही हमारे पास नही हैं।

कल दिवाली के दिन 20 गाँव के लोगों ने प्रदर्शन स्थल पर ही दिए जलाए और दिवाली मनाई। सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया। लोगों का कहना है कि “आज लाखो की संख्या में इमारती, औषधीय पौधों को, दर्जनों प्रकार के वन्य प्राणियों को, दर्जनों जलीय जीवों को, आदिवासियों के देव स्थलों को, सरई, साजा, करमी, भरही, चिल्ही, भेलवा, हर्रा, महुआ आदि अनेक प्रकार के दुर्लभ वृक्षों को, जो आदिवासियों के पूजनीय वृक्ष हैं वो इन कोयला खदानों के कारण समूल नष्ट हो जाएंगे। नदी नाले झरने सब सूख जाएंगे। हम सब भीषण गर्मी झेलेंगे और हमारी ज़मीन हड़पने वाले लोग एसी में बैठेंगे तो हम कैसे दिवाली मनाएं साहब।  इसलिए प्रभावित गांव के सभी लोगों ने मिलकर प्रकृति की रक्षा के लिए 100 दिए जलाए हैं।“ प्रत्येक गांव की तरफ़ से 5-5 दिए जलाए गए हैं

पहला दीपक ग्राम देवी डिहारीन दाईं के नाम से संगठन की एकता के प्रतीक स्वरूप।

दूसरा दीपक गांव के शिवरिहा देवता के नाम से जो गांव की रक्षा के प्रतीक हैं।

तीसरा दीपक ठाकुर देवता के नाम से जो सत्य, अहिंसा व न्याय के प्रति सजग व अन्याय के खिलाफ संघर्ष के प्रतीक हैं

चौथा दीपक आदि शक्ति, प्रकृति शक्ति, बड़ा देव के नाम जल, जंगल, जमीन, पर्यावरण के प्रतीक स्वरूप

पांचवां दीपक गौरी-गौरा कें नाम जो प्रकृति के समस्त जीवों की रक्षा के प्रतीक हैं

इस तरह फत्तेहपुर घाट बर्रा, परोगिया, सैदू, हरिहरपुर, साल्ही, ठिर्री आमा, गिद्ध मुड़ी, पतुरिया डांड, मदनपुर, मोरगा, धाज़ाक, उच्छलेंगा, खिर्टी, केत्मा, पुटा, चारपारा, परसा, आर्सियाँ, जामपानी, आदि गांव के लोगों ने सैकड़ों की संख्या में उपस्थित होकर अपने अपने गांव की ओर से पांच-पांच दिए जलाकर प्रकृति की रक्षा के साथ-साथ अपनी संस्कृति की रक्षा का संकल्प लिया। दिन भर धरना स्थल में करमा नृत्य का आयोजन किया गया जो कि आदिवासियों का लोक नृत्य व गीत है। करमा एक सामूहिक नृत्य है जो औद्योगिक अतिक्रमण के कारण विलुप्त होता जा रहा है।

करमा नृत्य करते लोगों ने बड़े आक्रामक ढंग से ये बात कही कि “छत्तीसगढ़ कि भूपेश सरकार ने पांचवीं अनुसूची व पेसा कानून के पालन कि बात अपने घोषणा पत्र में कही थी पर अब सरकार अपने वादे से सरकार मुकर रही है। जो खुद आकर अन्याय के विरूद्ध लड़ेंगे कहकर गए थे वो आज खुद अन्याय को बढ़ावा दे रहे हैं।

गाँव वालों ने कहा कि अब सरकार को पर्यावरण और वन विभाग को बन्द कर देना चाहिए। जब जंगल ही नहीं बचेगा और ये विभाग कंपनियों को पेड़ काटने से रोक नहीं रोक पाएगा तो ऐसे वन विभाग के होने के क्या मतलब है। जब पर्यावरण विभाग को पर्यावरण की चिंता नहीं है तो क्यों बनाया गया है ये विभाग। हजारों हेक्टेयर घने वनक्षेत्र जिससे हजारों आदिवासियों का जीवन और पूरे प्रदेश का मौसम निर्भर करता है उन वनों को छत्तीसगढ़ कि सरकार काटने पर आमादा है इसका सीधा सीधा मतलब है कि विभाग पर्यावरणीय मामले में गंभीर नहीं है।

ग्रामीणों ने कहा कि जो देश के लिए आवश्यक है उसपर विभाग गंभीर नहीं है ऐसे विभागों को सरकार को अविलंब बन्द करना चाहिए सरगुजा सूरजपुर व कोरबा के ग्रामीण क्षेत्र के जंगल समूल नष्ट होंगे आदिवासी विस्थापित होंगे पूरे छत्तीसगढ़ में भीषण गर्मी होगी बांगो का पानी बर्बाद होगा जांजगीर कोरबा बिलासपुर की खेती बर्बाद होगी जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण, होगा इसलिए हम खदान खोलने नहीं देंगे। हम सरकार से मांग करते है कि जंगल क्षेत्र के सभी खदानों को निरस्त किया जाए।”

Anuj Shrivastava

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