देश के 22 लाख तालाबों पर इमारतें तान कर अब हम पानी को रो रहे हैं

एक समय था जब भारत में करीब 24 लाख तालाब हुआ करते थे। हर गांव की अपनी संस्कृति और अपना तालाब होता था। यूं कहें कि तालाब संस्कृति का ही एक हिस्सा हुआ करते थे। हर तालाब का अपना एक नाम और महत्व होता था। तालाबों के किनारे जंगल या वृक्षों का घेरा होता था। तालाबों का कैचमेंट यानी जलग्रहण क्षेत्र घने जंगलों के बीच होने से भू-कटाव को रोकने में सहायता मिलती थी और तालाब में गाद भी कम जमा होती थी। जिस कारण तालाब हजारों साल तक चलते थे। उस दौरान तालाब, कुंए, पोखर आदि वर्षा जल संचय का सफल माध्यम होते थे। इस पानी को पीने और खेती सहित अन्य कामों में लाया जाता था। साथ ही भूजल स्तर को रिचार्ज करने में इनकी अहम भूमिका रहती थी। लोग जल संचय और जल संरक्षण को भी संस्कृति का ही अहम हिस्सा और जल संरक्षण को हर व्यक्ति अपना कर्तव्य समझता था, लेकिन आधुनिकता की दौड़ में तालाबों की संस्कृति ही खत्म हो गई। जिस कारण देश में केवल सवा दो लाख तालाब बचे और देश का नागरिक बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहा है। 

लगभग 22 लाख तालाब विलुप्त हो चुके हैं

5वें माइनर इरीगेशन सेंसस (2013-14) के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में करीब 2 लाख 14 हजार 715 तालाब हैं। शेष लगभग 22 लाख तालाब विलुप्त हो चुके हैं, यानी इन पर भवन निर्माण कर काॅलोनियां बसाई गई हैं। इन काॅलोनियों का नाम भी तालाबों के नाम पर ही रखा गया है। इससे यहां आने वाले नए शख्स को या काॅलोनी का नाम सुनने से ही प्रतीत होता है कि यहां कोई तालाब होगा, लेकिन तसदीक करने पर पता चलता है कि यहां कभी तालाब हुआ करता था, अब तालाब की कब्र पर इमारते खड़ी हैं और इमारतों का संरक्षण तालाब पर कब्जा करने वाले इंसान कर रहे हैं। बेशक, तालाब पर कब्जा करना उस दौरान किसी को नहीं खला होगा, क्योंकि आधुनिकता की दौड़ में वोट बैंक की राजनीति में बढ़ती आबादी को आशियाने के लिए जमीन देनी थी, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम पर न तो शासन ने ध्यान दिया और न ही प्रशासन ने तथा जनता तो लाभ पाने में व्यस्त थी। 

भारत की करीब 24 प्रतिशत भूमि मरुस्थल में तब्दील हो चुकी है

जल संरक्षण की इन प्राकृतिक धरोहरों को नुकसान पहुंचाने का खामियाजा ये हुआ कि बरसात का पानी पोखर, कुओं, तालाबों आदि में संग्रहित होकर भूजल को रिचार्ज करने के बजाए नालों के माध्यम से नदियों और नदियों से समुद्र में जाकर व्यर्थ होने लगा। इससे वर्षा जल को भूमि के अंदर जाने का माध्यम नहीं मिला और भूजल तेजी से कम होने लगा। तो वहीं भू-जल पर अधिक निर्भर होने के कारण हमने इतना पानी खींच लिया कि हैदराबाद, दिल्ली, चेन्नई, बेंगलुरु, कोलकाता आदि बड़े शहरों में भूजल समाप्त होने की कगार पर पहुंच गया है। जल गुणवत्ता सूचकांक में 122 देशों की सूची में भारत 120 पायदान पर पहुंच गया। दूसरी तरफ आधुनिकता के दौर में बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े स्तर पर जंगलों के कटान ने आग में घी डालने का काम किया। वनों के कटान से मिट्टी ढीली पड़ गई। हल्की बरसात में भू-कटाव शुरू हो गया। इसका सबसे ज्यादा नुकसान पहाड़ी इलाकों में हुआ। पेड़ों के कटने से पर्यावरण संतुलन बिगड़ने लगा और गर्मी बढ़ने लगी। भूमि में पहले से ही जल की कमी होने के कारण वनस्पतियों आदि को पर्याप्त नमी और जल नहीं मिला, इससे उपजाऊ भूमि मरुस्थलीकरण की चपेट में आ गई और भारत की करीब 24 प्रतिशत भूमि मरुस्थल में तब्दील हो चुकी है। देश की करीब 40 प्रतिशत जनता स्वच्छ जल के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। जिस कारण जनता समय समय पर अपने-अपने राज्य की सरकारों कोसती है। 

40 प्रतिशत जल किसी न किसी कारण से व्यर्थ हो जाता है

जल की इस भीषण समस्या को देखते हुए कई संगठन जरूर सक्रिय हुए और उन्होंने लोगों को जागरुक करना शुरू किया। नतीजा ये रहा कि देश के कई गांवों में तालाब निर्माण का कार्य शुरू हुआ। कई लोगों/किसानों ने स्वयं के स्तर पर भी तालाबों का निर्माण व सफाई की। सभी के इन प्रयासों से देश भर में हजारों तालाब बनाए जा चुके हैं, लेकिन सरकार की नींद फिर भी नहीं टूटी। सरकार की नींद कुछ माह पूर्व ही टूटी और जलशक्ति मंत्रालय का गठन किया गया। अभी तक तो मंत्रालय के अंतर्गत जल संरक्षण का कार्य जोर-शोर से चल रहा है, लेकिन धरातल पर परिणाम ही मंत्रालय की सफलता की दास्तान को बयां करेंगे, लेकिन गौर करने वाली वाली बात ये है कि आज भी देश के करोड़ों लोग पानी बचाने के प्रति जागरुक नहीं हैं। 40 प्रतिशत जल किसी न किसी कारण से व्यर्थ हो जाता है।

तालाबों और नदियों पर अधिकारियों और मंत्रियों की सांठगांठ से धड़ल्ले से अतिक्रमण हो रहा है। पर्यावरण संरक्षण की दुहाई देने वाले मंत्रियों और अधिकारियों के काल में ही विकास के नाम पर पर्यावरण को क्षति पहुंचाई जा रही है। इसलिए पर्यावरण और जल संरक्षण के लिए देश को एक ठोस नीति की आवश्यकता है। नीति केवल फाइलों नहीं बल्कि धरातल पर लागू भी हो और नियम कानून का अनुपालन सभी के लिए समान रूप से हो तथा कथनी और करनी में अंतर न हो। साथ ही जनता पर्यावरण के प्रति अपने कर्तव्य का अनुपालन करे। नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब हर इंसान के पास रहने के लिए घर तो होगा और घर में नल भी होगा, लेकिन नल में पानी नहीं होगा। इसलिए अपने भविष्य का निर्धारण हमें स्वयं करना होगा।

ये लेख एग्रो इंडिया में प्रकाशित हो चुका है। वहां से साभार cgbasket.in के पाठकों के लिए प्रस्तुत है। नीचे दिए लिंक में क्लिक कर आप एग्रो इंडिया की अन्य खबरें भी देख सकते हैं
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Anuj Shrivastava

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