विश्व निश्चेतना दिवस World Anaesthesia Day पर विशेष

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स्थान :बिलासपुर के सर्जन डॉ राहालकर हॉस्पिटल का ऑपरेशन थियेटर।

तारीख़: 23 मई 2017 समय यही कोई सुबह 11 बजे

??? दृश्य एक???

जब मुझे स्ट्रेचर पर ओ टी में ले जाया गया तो मैंने देखा निश्चेतना विशेषज्ञ डॉ मिसेस रहालकर वहाँ पहले से उपस्थित हैं। मैंने उन्हें अभिवादन किया ।

“ऐसा कीजिए आप उठ कर बैठ जाइए।” उन्होंने मुझसे कहा। मैं उठ कर बैठ गया । फिर उन्होंने मेरी रीढ़ की हड्डी टटोली और नीचे की तरफ एक इंजेक्शन लगाया । फिर मुझसे कहा “अब आप लेट जाइए । आपके पांव में थोड़ी देर झुनझुनी महसूस होगी और जैसे ही महसूस हो आप मुझे बताइए ।”

थोड़ी देर बाद मैंने महसूस किया कि मेरे पांवों में झुनझुनी हो रही है और वे सुन्न पड़ते जा रहे हैं। फिर लगा जैसे मेरे पांव है ही नहीं बल्कि मेरे कमर से नीचे का हिस्सा ही सुन्न हो गया है ।मुझे लग रहा था कि शायद शरीर में कमर से नीचे शरीर है ही नहीं , अनुभव नहीं हो रहा था पर दिखाई तो जरूर दे रहा था ।

मैंने बहुत अच्छे मूड में था ” डॉक्टर, दिख तो रहा है । पर उसे महसूस नहीं कर पा रहा हूँ। मेरी हालत देश के उन तमाम लोगों की तरह हो गई है जो अपना और दूसरों का शोषण , उत्पीड़न, दमन देखते तो हैं लेकिन उसे महसूस नहीं कर पाते ।”

“ठीक है ठीक है..इसे देखने की जरूरत भी नहीं है । हम आपकी आंख पर पट्टी बांध देते हैं । मैडम ने हँसते हुए कहा । मैंने पूछा ” ऐसा क्यों ?” वे मुस्कुराईं “अभी बहुत सारा खून निकलेगा ना वह आपको न दिखाई दे इसलिए।” फिर उनका एक सहायक तत्परता से आया और आंख पर पट्टी बांध दी।

इस बीच सर्जन डॉ रहालकर ओ टी में आ चुके थे और मेरे इंगयुनल हर्निया का ऑपरेशन शुरू हो चुका था ।

निश्चेतना विशेषज्ञ मैडम ने मुझसे पूछा “आपको मराठी आती है ? ” मैं उनकी आवाज पहचान रहा था । “हां ” मैंने कहा । “हमें पता चला आप कविता भी लिखते हैं ? ” उनका चेहरा नहीं देख पा रहा था लेकिन लगा कि वे मुस्कुरा रही हैं। मैंने कहा “लिखता हूं ” “तो सुनाइए ना ।” मैं उनका आग्रह समझ रहा था । वैसे भी ऑपरेशन टेबल पर था मुकर तो नहीं सकता था। ऐसा अवसर भी पहली बार मिला था ।मैंने कहा ” कौन सी कविता सुनाउँ ।” तो उन्होंने कहा ” कोई भी सुनाइए जो आपका मन हो ।”

मुझे मेरी वह चर्चितकविता याद थी जो उन दिनों अमृता प्रीतम के नाम से मोबाइलों पर भटक रही थी।

वह कहता था वह सुनती थी सदियों से जारी था एक खेल कहने सुनने का
खेल में थी दो पर्चियां
एक मे लिखा था कहो एक मे लिखा था सुनो…

कविता समाप्त हुई तो बहुत सारी तालियों की आवाज़ सुनाई दी। मैं समझ गया मैं कविता प्रेमी डॉ दम्पति और उनके स्टाफ के बीच हूँ।

“बहुत बढ़िया कविता ।” मैडम की आवाज़ आई । “और एक सुनाइये ।” अब तो मैं फॉर्म में आ चुका था । क्लोरोफॉर्म या जो भी निश्चेतक दवा हो उसका असर कमर के नीचे था ही लेकिन ऊपर का भाग जहाँ दिमाग होता है वह तो फॉर्म में था यानि चैतन्य था ।

मैंने कहा “सुनाता हूं .. लीजिये यह कविता…

नाटक में काम करने वाली लड़की

पिता हुए नाराज़
भाई ने दी धमकी
माँ ने बन्द कर दी बातचीत
उसने नाटक नहीं छोड़ा

घर में आए लोग
पिता ने पहना नया कुर्ता
माँ ने सजाई बैठक
भाई लेकर आया मिठाई

वह आई साड़ी पहनकर
चाय की ट्रे में लिए आस

सभी ने बांधे तारीफों के पुल
अभिनय प्रतिभा का किया गुणगान

चले गए लोग
वह हुई नाराज़
उसने दी धमकी
बन्द कर दी बातचीत

घरवालों ने नाटक नहीं छोड़ा ।

तालियाँ इस बार भी खूब बजी । बीच-बीच में डॉक्टर साहब की आवाज़ भी आती थी । एक बार उन्होंने कहा ” मैश देना।” मैं समझ गया मेरी खिड़की से बाहर झांक कर विद्रोह करने वाली आँतों को दबाने के लिए जाली लग चुकी है और अब सिलाई जारी है।

अब डॉ रहालकर मुझसे पूछ रहे थे । “आप तो इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुड़े हैं ना?” “हाँ “मैंने कहा। “तो फिर आपको जनगीत तो आते होंगे । बिल्कुल मैंने कहा और मैंने बिना उनके कहे गाना शुरू कर दिया ।

“तू ज़िंदा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर

अबकी बार डॉ साहब ने भी मेरे स्वर में स्वर मिलाना शुरू कर दिया ..

जुलम के और चार दिन
सितम के और चार दिन
यह दिन गुजर भी जाएंगे
गुजर गए हजार दिन

डॉक्टर साहब भी प्रगतिशील और वामपंथी विचारधारा के हैं यह तो मुझे मालूम ही था । वे बताने लगे कैसे अपने मेडिकल कॉलेज के दिनों में वे छात्र संगठन से जुड़े थे और आंदोलनों में जनगीत गाते थे।

थोड़ी देर बाद हर्निया की सर्जरी समाप्त हुई और मुझे यकीन हो गया कि मैं ज़िंदा हूँ ।

ज़िंदगी की जीत पर यकीन करते हुए मैं खुश था।

“तुम्हाला झोपायच आहे ? यानि आप सोना चाहते हैं।” निश्चेतना विशेषज्ञ मैडम ने मुझसे पूछा ।

मुझे याद नहीं उसके बाद क्या हुआ । मुझे नींद सी आने लगी थी। मैं ऑपरेशन थिएटर से रूम में आ चुका था । मन ही मन क्लोरोफॉर्म और उस जैसी विभिन्न निश्चेतना औषधियों के खोजकर्ता वैज्ञानिकों का आभार मानते हुए ।

आपको शायद पता नही होगा जिस ज़माने में निश्चेतना औषधियों की खोज नहीं हुई थी कई पहलवान टाइप के लोग मरीज को पकड़ लेते थे और फिर सर्जन उसका ऑपरेशन करते थे । उस समय मरीज केवल बेबस होकर चीख सकते थे।

क्या उस वक्त मुझ जैसे मरीज के बारे में कोई सोच सकता था जो सर्जरी के दौरान कविता सुना रहा हो या गीत गा रहा हो ?

समस्त वैज्ञानिकों का मन से आभार । विज्ञान ज़िंदाबाद।

शरद कोकास

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