वर्धा हिंदी विश्वविद्यालय प्रशासन : उल्टा चोर कोतवाल को डांटे

वर्धा. हिंदी विश्वविद्यालय प्रशासन की सवर्ण-सामन्ती अकड़ अभी ढीली नहीं हुई है। विश्वविद्यालय के वेबसाइट पर 13 अक्टूबर को बिना किसी अधिकारी के हस्ताक्षर वाली एक सूचना अपलोड की गई है। यह शायद पहला मौका है, जब विश्वविद्यालय ने बिना किसी सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर के यह सूचना अपलोड कराई है। इससे पूर्व भी विश्वविद्यालय ने छात्रों द्वारा पीएम मोदी को देश की मौजूदा हालात पर सामूहिक पत्र लेखन कार्यक्रम की लिखित सूचना दी थी तो उसके जवाब में विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा अपनी वेबसाइट पर एक परिपत्र अपलोड करते हुए कैम्पस में बिना अनुमति के कोई कार्यक्रम आयोजित करने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की धमकी दी थी। किंतु एक घण्टे के अंदर उस परिपत्र को वेबसाइट से हटा लिया गया था। जब छात्र-छात्राओं ने इसे सोशल मीडिया में उछाल दिया और कुछ वेब मैगजीन ने इस आशय की खबर लगा दी तो विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर पुनः उस परिपत्र को अपलोड कर दिया गया था। हालांकि दोनों बार अपलोड किए गए परिपत्र में सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर थे। किंतु इस बार जो सूचना अपलोड हुई है, उसपर किसी के हस्ताक्षर नहीं हैं।

राष्ट्रव्यापी भारी जनदबाव के कारण विश्वविद्यालय ने 6 बहुजन छात्रों के निष्कासन को तकनीकी भूलों का हवाला देते हुए वापस करने की सूचना 13 अक्टूबर को ही अपलोड की थी। किंतु उसके बाद यह बिना हस्ताक्षर वाली सूचना अपलोड की गई है। इसमें पिछले दिनों पीएम को देश में दलितों-अल्पसंख्यकों के बढ़ते मोब्लिंचिंग पर रोक लगाने; कश्मीर में नागरिकों के नागरिक स्वतंत्रता की गारंटी करने; बढ़ती यौन हिंसा व बलात्कार की घटनाओं पर रोक लगाने; एनआरसी के नाम पर मुस्लिमों को निशाने पर लिए जाने पर रोक लगाने; रेल-रेलवे स्टेशन, बीपीसीएल आदि के निजीकरण को रोकने तथा बैंकों-रिजर्व बैंक के खोखला किये जाने पर सवाल पर पत्र लिखने तथा बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम के परिनिर्वाण दिवस मनाए जाने के प्रसंग में विश्वविद्यालय द्वारा संवैधानिक वसूलों को दरकिनार करते हुए 6 बहुजन छात्रों के छात्र हित में निष्कासन वापसी की जानकारी दी गई है। इसमें कुलपति रजनीश शुक्ला की अध्यक्षता में विवि के पदाधिकारियों की एक बैठक का हवाला दिया गया है।

उक्त बिन हस्ताक्षरित सूचना में जिन शब्दों का उपयोग किया गया है, वह अत्यंत ही अलोकतांत्रिक और गोलमटोल है। जो विश्वविद्यालय प्रशासन के वास्तविक चरित्र को ही उजागर करता है। यह एक किस्म की सवर्ण-सामंती तानाशाही मानसिकता को सामने लाता है। विवि प्रशासन ने इस सूचना में छात्रों को दंडित करने के अपने अधिकार को पूरे गर्वोक्ति के साथ जस्टिफाई करने की कोशिश की है।

उक्त सूचना के दूसरे पैराग्राफ में विश्वविद्यालय प्रशासन का मानसिक दिवालियापन खुलकर सामने आता है। जब वह छात्रों के पत्र लेखन व मान्यवर कांशीराम के परिनिर्वाण दिवस मनाए जाने को राष्ट्रव्यापी जनसमर्थन एवं 6 बहुजन छात्रों के निष्कासन के राष्ट्रव्यापी विरोध के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन  छात्रों-नागरिकों के संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों के सम्मान के बजाय उसे कुचलने की मनोभावना रखता है। विवि द्वारा जारी सूचना में विद्यार्थियों के पत्र लेखन व मान्यवर कांशीराम के परिनिर्वाण दिवस पर कार्यक्रम आयोजित करने के व्यापक कारणों का पता लगाने एवं घटना में सम्मिलित हुए लोगों की शिनाख्त करने हेतु विवि ने एक ‘जांच समिति’ गठित करने की बंदर घुड़की दी है। इससे साफ जाहिर होता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन को अपनी गलतियों पर तनिक भी पछतावा नहीं है और आज भी उसकी नजर में छात्रों का सामूहिक पत्र लेखन और बहुजन नायक कांशीराम को याद करना जायज नहीं है। विवि प्रशासन आज भी छात्रों के संविधान प्रदत्त अधिकारों के सम्मान के प्रति कृतसंकल्प दिखाई नहीं दे रहा है। उलटे खुद के द्वारा ही गठित जांच समिति का भय दिखाकर छात्रों की आवाज को दबाना चाहता है। यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों के दोषी विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने को दोषमुक्त करने और छात्रों पर नकेल कसने की ही नियत से यह जांच कमेटी गठित की है।

जबकि न्याय का तकाजा तो यह है कि विश्वविद्यालय के इस पूरे कारनामे और अपनी सीमाओं का उल्लंघन करते हुए चुनाव आयोग के अधिकारों का दुरुपयोग करने का अपराध करने हेतु विश्वविद्यालय प्रशासन और कुलपति पर उच्च स्तरीय जांच कमेटी गठित होनी चाहिए और दोषियों को सेवा से बर्खास्त किया जाना चाहिए। ताकि देश का कोई विश्वविद्यालय अपने छात्रों के संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों के हनन की हिम्मत न जुटा सके। एक शिक्षण संस्थान द्वारा जातिवादी मानसिकता का परिचय देते हुए संविधान का उल्लंघन करने और छात्रों को जाति के आधार पर प्रताड़ित करने के गंभीर अपराध के लिए माफ नहीं किया जा सकता है। विवि प्रशासन द्वारा छात्रों को लगातार आतंकित किए जाने की इस कोशिश को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। एक विश्वविद्यालय प्रशासन के इसी रवैये के कारण रोहित वेमुला जैसे होनहार छात्र को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। विश्वविद्यालय में नई पीढ़ी संवैधानिक वसूलों व मूल्यों के प्रति शिक्षित-प्रशिक्षित व जागरूक सचेत होना सीखते हैं, किंतु यदि विश्वविद्यालय प्रशासन ही इस तरह से संवैधानिक अधिकारों का खुला उल्लंघन करने लगे तो वह अपने विद्यार्थियों को किस प्रकार का नागरिक बनाएगा! हिंदी विश्वविद्यालय प्रशासन के मौजूदा रवैये से देश-समाज के समक्ष यह एक गंभीर सवाल उठ खड़ा हुआ है।

वर्धा से चंदन सरोज की रिपोर्ट

Anuj Shrivastava

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

परसा कोल ब्लाक को निरस्त करने की मांग, हसदेव अरण्य बचाओ संर्घष के आन्दोलन का आज दूसरा दिन

Tue Oct 15 , 2019
Share on Facebook Tweet it Share on Google Pin it Share it Email हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति के बैनर […]

You May Like