हालीना पोस्वियातोव्स्का की दो कविताएं

आज विदेशी कवयित्रियों की कविताओं की इस श्रंखला की अंतिम कड़ी में प्रस्तुत कर रहा हूँ हालीना पोस्वियातोव्स्का की दो कवितायें । इन कविताओं का चयन एवं बहुत ही सुन्दर अनुवाद किया है  कबाड़खाना  ब्लॉग के श्री अशोक पाण्डेय ने । अशोक जी के अनुवाद आप पहले भी पढ़ चुके हैं ।

कवयित्री का परिचय

पोलैंड  की  रहने वाली हालीना (1934- 1967 )को बचपन में टी.बी. हो गई थी । इस वजह से वे स्कूल नहीं जा सकी । माँ के साथ टीबी सेनिटिरियम के चक्कर लगाते हुए उसकी मुलाकात अडोल्फ नामक एक युवा फिल्म निर्देशक से हुई । अडोल्फ को भी टी बी थी । दोनो ने विवाह कर लिया परंतु अडोल्फ की मृत्यु हो गई ।

हालीना कवितायें लिखने लगी थी । लेकिन उसका स्वास्थ्य इस कदर बिगड़ा कि चिकित्सकों ने उसे अमेरिका ले जाने की सलाह दी ।उसके पास इलाज़ के लिये पैसा नहीं था । पोलैंड के महाकवि चेस्वाव मिवोश और ताद्यूश रोज़ेविच के प्रयासों से उसका इलाज का खर्च निकला ।अमेरिका मे पहला ऑपरेशन सफल रहा । वह पोलैंड विश्वविद्यालय मे दर्शन शास्त्र भी पढ़ाने लगी लेकिन 1967 में दूसरे ऑपरेशन के दौरान 33 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई

तब तक उसके तीन कविता संग्रह आ चुके थे । 1968 में चौथा आया । हालीना ने प्रेम और और ऐन्द्रिकता को अपना विषय बनाया था उसे भान था कि कभी भी उसकी मृत्यु हो सकती है ।उसकी कविता में प्रेम की उथल-पुथल के साथ मृत्यु के सामंजस्य का विकट ठहराव देखने को मिलता है ।

हालीना ने बहुत कम जीवन जिया लेकिन पोलैंड के निवासियों ने उसकी कांस्य प्रतिमा उसके गृहनगर में स्थापित की

1 .● मेरी मृत्युएं

कोई कितनी दफ़ा मर सकता है प्रेम के कारण

पहली दफ़ा वह धरती का 
कड़ा स्वाद थी
कड़वा फूल
जलता हुआ सुर्ख़ कार्नेशन

दूसरी दफ़ा बस ख़ालीपन का स्वाद
सफ़ेद स्वाद
ठण्डकभरी हवा
खड़खड़ाते जाते पहियों की 
अनुगूंज

तीसरी दफ़ा, चौथी दफ़ा, पांचवीं दफ़ा

मेरी मृत्युएं कम अतिशयोक्त थीं                        
अधिक नियमबद्ध                                          
कमरे की चार औंधी दीवारें               और तुम्हारी आकृति मेरे ऊपर                         

2 . ● स्मृति पत्र

अगर तुम मर जाओगे           

तो मैं नहीं पहनूंगी हल्की 
बैंगनी पोशाक                                                 
फुसफुसाती हवाओं से भरे रिबनों से बंधी                                            
रंगीन कोई भी चीज़ नहीं
कुछ भी नहीं

घोड़ागाड़ी पहुंच जाएगी – 
पहुंचेगी ही
घोड़ागाड़ी चली जाएगी – 
जाएगी ही
मैं खिड़की से लगी खड़ी रहूंगी देखती रहूंगी

हाथ हिलाऊंगी
रूमाल लहराऊंगी

उस खिड़की पर खड़ी

अकेली कहूंगी :
“अलविदा”

और भीषण मई की
गर्मी में
गर्म घास पर लेट कर
मैं अपने हाथों से
छुऊंगी तुम्हारे बाल
अपने होठों से सहलाऊंगी
मधुमक्खियों के रोओं को
जिसका डंक उतना ही सुन्दर
जैसे तुम्हारी मुस्कान
जैसे गोधूलि का समय
उस समय वह
सोना-चांदी होगी

या शायद सुनहरी और सिर्फ़ लाल

जो ढिठाई से घास के कान में फुसफुसाती जाती है
प्रेम, प्रेम
वह उठने नहीं देगी मुझे

और ख़ुद चल देगी
मेरे अभिशप्त ख़ाली घर की ओर

हालीना पोस्वियातोव्स्का

अनुवाद : अशोक पाण्डे

प्रस्तुति : शरद कोकास

विदेशी कवयित्रियों की यह कविता श्रंखला आपको कैसी लगी ? ज़रूर बताइयेगा । इस श्रंखला की कविताओं को उपलब्ध करवाया श्री अशोक पाण्डेय , श्री सिद्धेश्वर . ने । इसके अलावा कुछ कवितायें मैने ज्ञानरंजन जी की पत्रिका पहल से भी लीं जिनके अनुवादक हैं श्री गीत चतुर्वेदी ,रजनीकांत शर्मा और सलीम अंसारी आप सभी के प्रति मैं आभार व्यक्त करता हूँ – शरद कोकास

Anuj Shrivastava

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