कवयित्री दून्या मिख़ाइल की महत्वपूर्ण कविता

नवरात्र के छठवें दिन आज प्रस्तुत है अरबी में लिखने वाली कवयित्री दून्या मिख़ाइल की एक महत्वपूर्ण कविता 

दून्या की इस कविता पर कवि गीत चतुर्वेदी की यह टिप्पणी प्रस्तुत कर रहा हूँ । इस कविता का अनुवाद भी गीत ने ही किया है और यह मैने ज्ञानरंजन जी की पत्रिका “ पहल “ के अंक 83 से साभार ली है । 

गीत चतुर्वेदी कहते हैं “ अरबी में लिखने वाली दून्या मिख़ाइल का व्यंग्य कहता है कि आप शब्दों को , उसी अर्थ में न समझें , उन्हे इस्तेमाल करने के पीछे की सोच भी समझें । जब वह कहती है ‘हमेशा’ तो उसका मतलब पूरी तरह हमेशा नहीं होता , ऐसा तो उसने सिर्फ तुक मिलाने के लिये कहा था । जब वह चुप रहती हो तो उसे पूरी तरह चुप्पी न समझा जाये , हो सकता है उसकी आँखों के रास्ते अभी अभी बगदाद की गलियों में गुजरा उसका बचपन आया हो ।“

गीत चतुर्वेदी कहते हैं “ दून्या के यहाँ महिला होने का सियापा नहीं है । उसमें प्रेमिकाओं की तरह इंतज़ार करने की ताकत है और यह हुनर उसे  “ मेहनतकश  जंग “ ने सिखाया है । अरबी कविता जब से वयस्क हुई है उसमें गोली,धमाके, ख़ून से लथपथ चांद और एक बूढ़े पेड़ की उसांसों से निकलता तूफ़ान बेसाख़्ता आता रहा है । 

ये कवितायें उस कवयित्री ने लिखी हैं जो बहुत हड़बड़ी में थी जिसने अभी कल ही अपना देश खोया है ।
ये कवितायें उन लोगों को सम्बोधित हैं जो आनेवाले दिनों में अपना देश खो देंगे । क्योंकि वे सब भी बहुत हड़बड़ी में हैं । हम ऐसे समय में हैं जहाँ हर सुबह संज्ञाएँ बदल जाती हैं ,सर्वनाम वही रहते हैं पर क्रियायें बदल जाती हैं ।“

आप भी जानिये कुछ दून्या मिख़ाइल के बारे में   –

दून्या की पैदाइश 1965 की है । उनके चार संग्रह आ चुके हैं 2001 में सन्युक्त राष्ट्र का “ फ्रीडम ऑफ राइटिंग अवार्ड “ मिला है । ईराक से उसे धमकियाँ मिली हैं ,जान बचाने की फिक्र मिली , बग़दाद की गलियों में लाशें चीख पुकार मिली , अंतत: 1996 में वह अपना वतन छोड़कर अमेरिका स्थित मिशिगन में जा बसी । बग़दाद से अंग्रेज़ी मे बी.ए. किया अमेरिका की वेन स्टेट  यूनिवर्सिटी से एम.ए.किया और अब अरबी पढ़ाती हैं । “

प्रस्तुत है युद्ध और युद्ध की विभीषिकाओं को लेकर ,समय के महत्वपूर्ण सवालों से लड़ने वाली दून्या मिख़ाइल की यह कविता इसमें व्यंग्य की धार के साथ आप जंग के नये नये सन्दर्भ देख सकते हैं ।

हमने युद्ध की स्थितियों को ज़्यादा जिया नहीं है फिर भी हम जानते हैं, युद्ध से क्या क्या होता है भले ही राष्ट्रप्रेम की भावना के चलते बहुत सी बातों को हम अनदेखा करें । दून्या के शब्दों  में कहें तो “ ईराक में मैने युद्ध को जिया है इसलिये मुझे पता है कि युद्ध क्या होता है । “

पढ़िये बिना किसी रूपक या बिम्ब के ,सरल सरल शब्दों में लिखी युद्ध के दूसरे पक्ष पर लिखी  अंत में एक सवाल छोड़ जाने वाली एक अलग तरह की कविता । आप महसूस करेंगे इस कविता की हर पंक्ति मे एक नई कविता का विषय है |

जंग कितनी मेहनतकश है

कितनी अद्भुत होती है जंग
कितनी कर्मठ
कितनी हुनरमन्द

अलस्सुबह उठकर
वह जगाती है सायरन को
एम्बुलेंसों को रवाना करती है सब दूर
हवा में झुलाती है लाशों को
घायलों के आगे फिसलाती है स्ट्रेचर

मांओं की आँखों के लिये बुला लाती है बारिश
कितना खोदती है ज़मीन को
अपने फावड़े से

मलबे के भीतर से निकाल लाती है कितना कुछ

कुछ बेजान चमकती चीज़ें
बाक़ी मुर्दुस , फिर भी धड़कती हुई

यह बच्चों के दिमाग़ में
कई नये सवाल भरती है
आसमान में दाग़ती है मिसाइलें और आग के गोले

और ईश्वर का मनोरंजन करती है

यह खेतों में बोती है बारूदी सुरंग
उगाती है फफोले और मवाद
परिवारों से करती है आग्रह
कहीं और बसने का
और हाकिमों के साथ खड़ी रहती है
जब वे कोस रहे होते हैं शैतान को

( बेचारा शैतान ,उस वक़्त भी उसका एक हाथ
झुलस रहा होता है लपटदार आग में )

जंग दिन-रात करती रहती है अपना काम
बिना थके

यह आततायियों को लम्बे लम्बे भाषण देने को
प्रेरित करती है

सेनाध्यक्षों को देती है तमग़े
और कवियों को एक अदद विषय

यह कृत्रिम अंग बनाने वाले उद्योग को भी
सहारा देती है

मक्खियों और कीड़े- मकोड़ों के लिये जुटाती है भोजन

इतिहास की किताबों में जोड़ती पन्ने

मारे गये और हत्यारे के बीच समानता स्थापित करती है

प्रेमियों को सिखाती पत्र लिखना
लड़कियों को सिखाती है इंतज़ार करना

अख़बारों को देती है ख़बरें-तस्वीरें

अनाथों के लिये बनाती है नए-नए मकान
ताबूत बनाने वालों को व्यस्तता देती है
थपथपाती है क़ब्र खोदने वालों की पीठ
और नेता के चेहरे पर एक मुस्कान रंगती है

कितनी मेहनतकश  होती है जंग

इतनी बेमिसाल है फिर भी
कोई इसे सराहता क्यों नहीं

कविता : दून्या मिखाईल

अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

संकलन व प्रस्तुति : शरद कोका

Anuj Shrivastava

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