मज़बूती का नाम महात्मा गांधी, बिलासपुर में हुई संगोष्ठी पर एक नज़र

बिलासपुर. शहर का लखीराम ऑडिटोरियम निर्माण प्रक्रिया में प्लानिंग की कमी और घोर जहालत का सटीक नमूना है. पर चूंकि शहर के बीच प्राईम लोकेशन पर ये भवन है इसलिए शहर के आयोजकों की मजबूरी होती है यहां कार्यक्रम करना. भवन की ये भूमिका इसलिए पेश की क्योंकि इस अव्यवस्थित भवन में भी ज़िला काँग्रेस द्वारा किया गया संगोष्ठी का आयोजन “मज़बूती का नाम महात्मा गांधी” व्यवस्थित और भव्य नज़र आया.

कार्यक्रम कुछ यूं रहा

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को लेकर युवाओं के मन में थोड़ी शंका है. युवा ये तप मानते हैं कि गांधी अच्छे हैं, लेकिन गांधी व्यवहारिक हैं या नहीं इस बात की दुविधा भी उनके मन में बैठी हुई है. ये दुविधा इसलिए है क्योंकि लम्बे समय से गांधी को लेकर दुष्प्रचार किए गए, उनके विचारों पर लगातार सुनियोजित कुठाराघात किए गए हैं. भारत में गांधी की वैसी पूछ-परख नहीं है जैसी बाकी दुनियाभर में है. इसका प्रमाण है महात्मा गांधी के 150वें वर्ष में फिलिस्तीन द्वारा जारी किया गया डाक टिकट. सच्चा गांधीवादी वही है जो घर से निकले, रचनात्मक कार्य करे, जो केवल शब्दों की क्रान्ति तक सीमित न रहे, जो लोगों के बीच जाए और जन आंदोलन की क्रांति करे. यह बातें दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रो. प्रदीप कांत चौधरी ने कार्यक्रम में पहले वक्ता के तौर पर कहीं.

गांधी पर जब कोई झूठ बोले तो उसे जाँचिये

उन्होंने बताया कि गांधी और नेहरु की तस्वीरों को एडिट करके उसमें लड़कियों को जोड़कर वाट्सऐप यूनिवर्सिटी में फैला दिया जाता है. गलत इतिहास और फ़र्ज़ी जानकारियों वाली एक वेबसाईट के लेख का ज़िक्र उन्होंने किया कि इस लेख के अनुसार “फ्रीडम एट मिडनाईट” नाम की किताब में गांधी हिन्दू महिलाओं को ये सलाह दे रहे हैं कि “कभी कोई मुसलमान तुम्हारा रेप करे तो उसे वो करने दो उसका विरोध मत करो ताकि वो जल्दी ही तुम्हें छोड़ दे”

प्रोफ़ेसर चौधरी ने बताया कि उन्होंने जब “फ्रीडम एट मिडनाईट” किताब पढ़ी तो पाया कि पूरी किताब में कहीं भी गांधी के ऐसे किसी भी कथन का कोई ज़िक्र नहीं है. और ये सीधे तौर पर युवाओं में गांधी को दुष्प्रचारित करने की कोशिश है.

हरिजन पत्रिका के 01-03-1942 के अंक में गांधी कहते हैं की महिलाओं को अपनी इज्ज़त पर यदि कोई आँच महसूस हो तो वे इसका विरोध करें और लड़ें, उस समय यदि हिंसा भी करनी पड़े तो करें.  

प्रोफ़ेसर चौधरी ने कहा कि विचार के स्तर पर समाज की तीन धाराओं, दक्षिणपंथी धारा, मध्यवर्गीय धारा और वामपंथी धारा, सभी ने महात्मा गांधी को लेकर अपने-अपने तरीके से बातें कही हैं.

दक्षिणपंथी धारा में कुंठा की भावना से जन्मे आरएसएस जैसे कट्टर संगठन हैं जिसने गांधी को हिन्दू विरोधी और मुसलमानों का हितैषी साबित करने की कोशिश की है. जबकि उनसे जुड़ी कई घटनाएं व उनका पूरा जीवन अपने आप में प्रमाण है हिन्दू धर्म के प्रति उनकी आस्था का.

मध्यवर्गीय धारा में अम्बेडकरवादी आते हैं जिन्होंने आंबेडकर और गांधी के बीच एक दीवार खड़ी कर दी है. जबकि गांधी और आंबेडकर की कार्यशैली में कई समानताएं हैं जैसे दोनों ने ही समुदाय आधारित न्याय की बात की, दोनों ने ही धर्म की सहायता से ही जीवन बेहतर बनाने की बात की और दोनों ने ही अहिंसक प्रतिरोध का मार्ग चुना. महात्मा गांधी की ही तरह आंबेडकर ने भी हथियारबंद क्रान्ति की कभी बात नहीं की.

तीसरी है वामपंथी विचारधारा, जिसमें कम्युनिस्ट आते हैं. उसने महात्मा गांधी को कभी-कभी मजदूर और किसान विरोधी बताया जबकि गांधी ने समाज में अंतिम पंक्ति में खड़े ग़रीब व्यक्ति के लिए न्याय पर ही हमेशा ज़ोर दिया है.

तीसरी विचारधारा को लेकर प्रोफ़ेसर चौधरी की बातों से मैं सहमत नहीं हो पा रहा हूं. निश्चय ही प्रोफ़ेसर चौधरी के संपर्क मुझसे कहीं ज़्यादा लोगों के साथ होंगे. उनका ज्ञान भी मुझसे ज़्यादा है. अपने छोटे से संपर्कों में मुझे ऐसा तो कोई वामपंथी नहीं मिला जो गांधी को किसान व ग़रीब विरोधी कहता हो. बल्कि इससे उलट गांधी को मानने वाले किसान मिले.

हां ये बात ज़रूर है कि कुछ फ़र्ज़ी लोगों से भी मुलाक़ात हुई है.

फ़र्ज़ी….जैसे फ़र्ज़ी समाजसेवी होते हैं,

जैसे फ़र्ज़ी गांधीवादी होते हैं,

जैसे फ़र्ज़ी राष्ट्रवादी होते हैं…

वैसे ही कोई-कोई फ़र्ज़ी वामपंथी भी होते ही होंगे. इन फ़र्ज़ी लोगों के लक्षण पर बात फिर कभी करेंगे. अभी बस इतना, कि गांधी को समझना, गांधी को जीवन में उतारना इन फर्जियों के बूते का नहीं है. संघियों की तरह ये फ़र्ज़ी लोग भी गांधी से बहुत डरते हैं. वामपंथ और गांधी के प्रति इन फर्जियों की अनभिज्ञता इस एक बात से समझी जा सकती है कि गांधी जेल जाने से डरते नहीं थे. जनविरोधी कानूनों का सड़कों पे उतर कर खुलेआम विरोध करते थे और दमनकारी सत्ता के सामने डटे रहते थे. गांधी के इस व्यवहार से उलट, जेल जाने के नाम से ही इन फ़र्ज़ी लोगों का पोटा कांप जाता है. ये फ़र्ज़ी वामपंथी बेशक ही गांधी को किसान विरोधी बता सकते हैं. पर उनकी कही ये बात वामपंथ का बयान नहीं कही जा सकती.

प्रोफ़ेसर चौधरी से बस यही एक छोटी सी असहमति थी, एक वही तो थे जिनकी बातें कार्यक्रम के बाद भी याद रहेंगी.

कार्यक्रम में आगे

इससे पूर्व जिला काँग्रेस कमिटी की ओर से आयोजित संगोष्ठी की शुरुआत करते हुए जिलाध्यक्ष विजय केशरवानी, काँग्रेस प्रदेश महामंत्री अटल श्रीवास्तव व शहर अध्यक्ष नरेन्द्र बोलर ने अथिथियों का स्वागत किया.

संगोष्ठी के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ रागिनी नायक ने कहा कि एक साज़िश के तहत महात्मा गांधी के साथ मजबूरी जैसे शब्दों को जोड़ा गया है. हमें इसे रोकना है और ये भरपूर कोशिश करनी है कि आज से कमजोरी को नहीं बल्कि मजबूती को महात्मा गांधी कहा जाए. उन्होंने कहा कि गांधी के विकास का माडल किसी एक व्यक्ति के लालच को पूरा करने वाला नहीं बल्कि सबके विकास का माडल था. गांधी को कमज़ोर कहने वालों को ये नहीं भूलना चाहिए कि अहिंसा किसी कायर का काम नहीं है. डॉ रागिनी नायक ने चम्पारन, नील की खेती और महात्मा गाँधी से जुड़ी दूसरी कई घटनाओं का ज़िक्र किया. बापू को बदनाम और उन्हें इस्तेमाल करने को लेकर आरएसएस औ भाजपा की खुलकर तीखी आलोचना भी की. उनके वक्तव्य में बस एक “छोटी सी” कमी रह गई. अगले पैराग्राफ़ में मैंने इस “छोटी सी” कमी का ज़िक्र किया है.

मजबूरी का नहीं मजबूती का नाम महात्मा गाँधी: पुरुषोत्तम अग्रवाल

प्रोफ़ेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल जाने माने लेखक, आलोचक और विचारक हैं. साल 2005 में गाँधी शांति प्रतिष्ठान नई दिल्ली उन्होंने एक व्याख्यान दिया जिसका विषय था “मजबूरी का नहीं मजबूती का नाम महात्मा गाँधी”. बाद में इस व्याख्यान को लेख के रूप में प्रकाशित भी किया गया. बिलासपुर में हुई संगोष्ठी का टाइटल पुरुषोत्तम जी के इसी व्याख्यान से निकला है. व्याख्यान का ये अंश पढ़िए :-

“गौर से सोचें तो हम सब महसूस कर सकते हैं कि असल में मजबूरी हिंसा है. हिंसा दृढ़ता और शक्ति को प्रकट नहीं करती. हिंसा मजबूरी को प्रकट करती है. मैं आज तक किसी ऐसे व्यक्तिविचार या सत्ता के सम्पर्क में नहीं आया हूंजिसने हिंसा करते हुए यह न कहा हो कि हम तो हिंसा के लिए मजबूर थे.’ राज्यसत्ता हिंसा करती है क्योंकि उसे व्यवस्था बनाए रखने की मजबूरी है. क्रांतिकारी हिंसा करते हैं क्योंकि राज्य सत्ता ने उन्हें विवश कर दिया हैउन्हें मजबूर कर दिया है कि वे हिंसा करें.

अध्यापक हिंसा करते हैं क्योंकि बिना हिंसा और अनुशासन के बच्चों को सिखाया नहीं जा सकता. बच्चे हिंसा करते हैं क्योंकि हिंसा के बिना समाज सुनने को तैयार नहीं है. तो इस उलटबांसी को हम आत्मसात किए बैठे हैं. औरकेवल हम ही नहीं सारी दुनिया आत्मसात किए बैठी है कि अहिंसा मजबूरी का प्रमाण है और हिंसा ताकत का. मुझे लगता है बात उलटी है. असल में स्वयं हिंसा करने वालों पर अगर आप ध्यान देंचाहे वे सरकारी अफ़सर के तौर पर हिंसा करते होंचाहे वे विचार में हिंसा को सही ठहराते होंचाहे वे राज्यसत्ता के रूप में हिंसा करते हों. स्वयं हिंसा करने वालों पर अगर आप ध्यान देंतो आप पाएंगे कि हर हिंसक व्यक्ति और विचार अपने आपको परिस्थितियों के मजबूर दास के रूप में प्रस्तुत करके ही अपने नैतिक संकट का समाधान कर पाता है.”

संगोष्ठी में डॉ रागिनी नायक ने पुरुषोत्तम अग्रवाल की इस बात को लगभग हूबहू उधृत भी किया. उनके वक्तव्य में बस एक छोटी सी कमी ये लगी कि कहीं भी उन्होंने इस बात का ज़िक्र नहीं किया के “मजबूती का नाम महात्मा गांधी”, ये कहने वाले पुरुषोत्तम अग्रवाल ही पहले व्यक्ति हैं.  

अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी के सचिव व छत्तीसगढ़ सहप्रभारी चंदन यादव ने आभार संबोधन देते हुए कहा कि केंद्र सरकार आज देश में एक महापुरुष के सामने दूसरे महापुरुष को प्रतिद्वंदी की तरह स्थापित करने की कोशिश कर रही है. जबकि इस देश में नेहरु, गांधी, पटेल, सुभाष, भगत सिंह, आंबेडकर आदि सभी की साझा कोशिशों से आज़ादी आई थी. सभी का अपना महत्व है. केंद्र सरकार की इस साज़िश को हमें समझना है और इसे नाकाम करना है.

सवाल – जवाब

संगोष्ठी के अंत में सवाल-जवाब का दौर भी चला. बात करने का और सवालों के जवाब देने का डॉ. रागिनी नायाक का पार्टी प्रवक्ताओं वाला एक ख़ास अंदाज़ है. इसी अंदाज़ में उन्होंने सवालों के जवाब बखूबी दिए.

प्रोफ़ेसर चौधरी ने जिस खुले तौर से गांधी के बारे में विचार रखे, आरएसएस, भाजपा को आड़े हांथो लिया, गांधी और आंबेडकर की एकरूपता को न समझ पाने और दोनों को परस्पर विरोधी कहने वाले आंबेडकरवादियों की जिन खुले शब्दों में आलोचना की. वैसे ही खुले शब्दों में वे सवालों का जवाब भी देंगे ऐसी हमने उम्मीद की थी. पर इस सेशन वे थोड़े नर्म नज़र आए.

100 तस्वीरों में समेटी गांधी की जीवनगाथा

लखीराम ऑडिटोरियम परिसर में महात्मा गांधी की 150 वीं जयन्ती के अवसर पर चित्र प्रदर्शनी लगाई गई. आधारशिला विद्यामंदिर की ओर से राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय द्वारा संकलित “गांधी – 150” के अंतर्गत महात्मा गांधी के जीवन व कार्यों पर आधारित 100 चित्रों का प्रदर्शन किया गया. इन चित्रों के माध्यम से उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक की गाथा कही गई. चित्रों की ये प्रदर्शनी ज्ञान बढाने वाली और वाकई देखने लायक थी.

एक बात तो हम सभी जानते हैं, यकीनन आयोजक भी जानते ही होंगे कि गांधी समय के कितने पाबन्द थे.

Anuj Shrivastava

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