कवयित्री अन्ना अख़्मातोवा की कविता

नवरात्र के नौ दिनों में हर रोज़ की एक कविता की कड़ी तीसरे दिन प्रस्तुत है यूक्रेन रूस की कवयित्री अन्ना अख़्मातोवा की कविता

अन्ना अख़्मातोवा व उनके परिवार का चित्र गूगल से साभार

लक्ष्मण रेखा से
आगे चली गई थी
बर्फ हो गए थे पांव
दाएँ हाथ का दस्ताना
बाएँ हाथ में पहन लिया
जितनी आगे बढ़ी
निगाहें टेढ़ी होती गईं
एक सपाट चेहरे वाले ने कहा
” मेरे साथ मरना चाहोगी “
नमक हराम हूँ नख से शिख तक
गिरगिट की तरह रंग बदलती हूँ
हूँ ही ऐसी , जवाब दिया था
हाँ मेरे प्यार के देवता ,
मैं मरना चाहती हूँ ,तुम्हारे साथ
बीटिंग रीट्रीट
आखिरी धुन
अन्धेरे में
शयन कक्ष की खिड़की से झाँकती हूँ
धुन्धले प्रकाश में
सारस का एक जोड़ा उड़ा जा रहा है

अन्ना अख़्मातोवा का परिचय : 11 जून 1889 को जन्मी यूक्रेनिया रूस की कवयित्री अन्ना अख़्मातोवा ने 11 साल की उम्र में पहली कविता लिखी । माता पिता से अलगाव ,वैवाहिक जीवन में तनाव , युद्ध निर्वासन, क्रांति , प्रतिक्रांति उसके परिणाम ,स्वदेश वापसी के बीच उनका लेखन चलता रहा । उनकी कविता परिवार के इर्द गिर्द रहती है ,लेकिन उसमे जैसे किसी को जवाब देने की ताकत है ।

अन्ना अख़्मातोवा व उनके परिवार का चित्र गूगल से साभार

1912 में पहला संग्रह “ईवनिंग” 1917 में “ ए वाइट बर्ड फ्लाइट “ 1922 में “प्लेंटेन “ व “एनो डोमिनी “ 1962 में” ए पाएम विदाउट हीरो “ उनके चर्चित कविता संग्रह हैं । 5 मार्च 1966 को 76 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ ।

ज्ञानरंजन जी की पत्रिका “ पहल “ के 66 वे अंक में प्रकाशित इस कविता का अनुवाद किया है श्री रजनीकांत शर्मा ने । पहल से यह कविता साभार ।

कविता : अन्ना अख़्मातोवा
अनुवाद : रजनीकांत शर्मा
प्रस्तुति : शरद कोकस

Anuj Shrivastava

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