शंकर गुहा नियोगी तुम कहां हो !

आलेख : कनक तिवारी

जिन्दगी किसी हासिल का नाम होती है। चाहे असफलता ही क्यों न हासिल हो। जिंदगी में धड़कन होती है। कशिश होती है। उसमें उद्दाम और अवसाद भी होता है। वह खतरों से भी खेलती है। पराजित होकर भी नई जीत के लिए कुलांचे भरना शुरू करती है। जिंदगी के सपनों में जीता इंसान आंखों में आंसू, ओले और शोले दोनों रखता है। वह तय करता है कहीं खून में सफेद रक्तकण लाल रक्तकणों पर हावी तो नहीं हो रहे हैं। वह अपनी देह के रंध्रों और रोएं रोएं को पहचानकर उन्हें पसीने से नहलाता रहता है। वह चमकदमक, कपड़ेलत्ते, भोजन, भवनों, मोटरगाड़ियों और किसी तरह के ऐश में जीने को अधमरा हो जाना समझता है। वह अकेले नहीं जीता। उसे घर आंगन में और फिर जीवन प्रांगण में हमकदम करते साथियों का परिवार चाहिए। वह जब दुनिया छोड़ता है तो लाखों आंखें उसकी याद में बस केवल रोती ही रहती हैं।

यह रेखाचित्र कोई पढ़े तो छत्तीसगढ़ के लाखों जुझारू, श्रमिक किसान और मुफसिल भी एक साथ कह उठेंगे कि यह तो शंकरगुहा नियोगी का परिचय है। मैं जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, लालबहादुर शास्त्री से लेकर न जाने कितने लेखकों, नेताओं, कलाकारों, फिल्मी हस्तियों और कई ख्यातनाम लोगों से मिल चुका हूं। सबके व्यक्तित्व का अलग अलग असर हुआ है। दुर्ग के साइंस काॅलेज में 1969 में अध्यापक के रूप में ट्रांसफर पर आने के बाद नियोगी के बारे में सुना। दो साल बाद इस्तीफा देकर वकील और पत्रकार बना। तब नियोगी से परिचय, प्रेम और परस्पर हो जाना हो ही गया।

1974 में नियोगी को चोरी से सरकार ने कैद कर लिया और राजनांदगांव जेल भेज दिया। मैंने सत्र न्यायाधीश की अदालत में याचिका लगाई और अवैध गिरफ्तारी को निरस्त करते अदालत के आदेश पर नियोगी को छोड़ दिया गया। उसके बाद राजहरा का पुलिसिया गोलीकांड हुआ। उसकी जांच के लिए जस्टिस रज्जाक न्यायिक आयोग बैठा। मैंने नियोगी के वकील के रूप में सरकारी गवाहों से जिरह की। फिर आगे चलकर राजहरा में छत्तीसगढ़ श्रमिक संघ और छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा की सात श्रमिक सहकारी समितियां बेईमानी से भंग कर दी गईं। उनका उपचार रायपुर में संयुक्त पंजीयक के यहां अपील के जरिए होना था। मैंने सीधे राजस्व मंडल ग्वालियर में याचिका दाखिल की और मुझे तत्काल स्थगन मिल गया। बाद में अंतिम बहस के दौरान वरिष्ठ आईएएस अधिकारी राजस्व मंडल में अध्यक्ष ने पक्ष में फैसला दिया। मैंने पूछा आप पर सरकार का दबाव नहीं है। उन्होंने जवाब दिया। तो जरूर है लेकिन नियोगी के मामले में मैं सरकार के खिलाफ रहूंगा। भले ही मेरा तबादला हो जाए। ऐसी थी इस जुझारू संघर्षधर्मी नेता की छवि।

लोहा जब गर्म होता है तब चमकता भी है और उसे सांचे में ढालकर जिस तरह चाहें चेहरा या आकार बनाया जाता है। दल्ली राजहरा का यह चट्टान पुरुष मेरे पास घंटों बैठता। उसके अंदर से टैगोर और काज़ी नजरुल इस्लाम की नस्ल की कवितामय पंक्तियां फूटती रहतीं। उसे संसार के हर विषय में जिरह और जिज्ञासा की आदत थी। वह केवल छत्तीसगढ़ की श्रमिक राजनीति तक सीमित नहीं था। मैं उन दिनों कांग्रेस पार्टी का कार्यकर्ता था। इसके बावजूद पार्टी के नेताओं और लगातार होते मुख्यमंत्रियों की परवाह किए बिना नियोगी के साथ जुड़ना बौद्धिक जीवन में ईमानदारी का प्राण संचार करता था।

यह रहस्य है नियोगी को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम में निरोधित कर दिया गया। एक साल तक जमानत का सवाल नहीं था। तब मैंने उस समय के अधिनियमित बोर्ड के सदस्यों न्यायमूर्ति जगदीशरण वर्मा और न्यायमूर्ति बिपिनचंद्र वर्मा से बेझिझक उनके चेम्बर में जाकर बातचीत की। दोनों न्यायमूर्तियों ने कहा यह एक वकील का अजीब साहस है। इस तरह कोई हमसे मिले तो उसे मुश्किल हो सकती है। फिर कहा हम जानते हैं यह नैतिक साहस शंकर गुहा नियोगी के किरदार के कारण है। उन्होंने कहा हम यह भी जानते हैं कि नियोगी के साथ अन्याय हो रहा है। नतीजतन नियोगी को छोड़ दिया गया।

पुलिस उन्हें अन्य किसी अपराध में फिर गिरफ्तार करना चाहती थी। जबलपुर से दुर्ग टैक्सियां बदलकर किसी तरह नियोगी को बुलवा लिया गया। इसके बाद जिले के पुलिस अधीक्षक बहुत देर तक मेरे घर के सामने प्रतीक्षा करते रहे। यह फितरत थी मजदूर साथियों की कि वे उन्हें निकालकर राजहरा के जनसैलाब में होशियारी से ले गए। जनकलाल ठाकुर, शेख अंसार, सुधा भारद्वाज, अनूप सिंह, विनायक सेन, राजेन्द्र सायल, प्रेमनारायण वर्मा, गणेशराम चौधरी और अन्य कई साथी इस तरह मिलते थे जब आभिजात्य की चटनी पीसकर हम जिंदगी का लुत्फ उठाते थे। शंकर गुहा नियोगी के चले जाने से जिंदगी का वह आस्वाद खत्म हो गया है।

जिस दिन नियोगी की हत्या हुई। उस दिन मैं जबलपुर में था। एक दिन पहले वे मेरे घर आए बहुत देर मेरे परिवार के साथ बैठकर गपशप करते रहे। हाईकोर्ट के काम की वजह से मैं उस दिन नहीं आ सका था। वरना हत्या के उस मनहूस दिन नियोगी की मेरे घर में भिलाई के कई रसूखदार उद्योगपतियों से बात होनी थी। मैं चाहता था मामले का सम्मानजनक हल निकले। नियोगी की जिद अपने व्यवहार में लचीली होती थी। जब मामला आत्मसम्मान तक पहुंचे तब वे अपनी रीढ़ की हड्डी पर सीधे हो जाते थे। मनुष्य होने का करतब कोई शंकर गुहा नियोगी से सीखे।

राजीव गांधी की मौत के वक्त मैं मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी का महामंत्री था। छतीसगढ़ में लोकसभा चुनाव के संचालन का भार भी मुझ पर था। उस हादसे के कारण अपने सैकड़ों साथियों के साथ गमगीन होना नियति ने हमारे खाते में लिख दिया था। उसी दरम्यान नियोगी मेरे पास अकेले आकर घंटों बात करते थे। राजीव गांधी की मौत पर उन्होंने मेरे घर पर बैठकर एक लंबा लेख लिखा। वह उस समय के अखबार ‘नवभास्कर‘ में संपादक रमेश नैयर ने दो किश्तों में छापा था।

इस श्रमिक नेता की आंखों में भाषा की इबारत बोलती रहती थी। शर्त यही है कि आपको पढ़ना आना चाहिए। नियोगी की मौत पर आक्रोशित लाखों की संख्या में मजदूर थे। शव के पीछे चलता मेरा पूरा परिवार इस तरह टूट गया था मानो परिवार का कोई सदस्य चला गया है। उस असाधारण जनसैलाब ने अद्भुत आत्मसंयम रखा। वह अहिंसा के इतिहास में दर्ज करने लायक है। नियोगी का जाना लगता है आने जाने की तरह है। यह जाबांज युवक मेरी यादों से जाता नहीं है। बार बार लौट लौट आता है।

आलेख : कनक तिवारी

Anuj Shrivastava

Next Post

मैं कोई देवी बनूँगी : फातिमा नावूत

Mon Sep 30 , 2019
नवरात्र में आज से नौ दिनों तक आप के लिए नौ कवयित्रियों की कविताएँ. प्रथम दिवस पर फातिमा नवूत की […]

You May Like