किरीट ठक्कर की कविता रौशनदान


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धुप्प अंधेरे कमरे में
एक छोटा सा रौशनदान ,
खुला रहने दो।

नजर आती है यहाँ से
थोड़ी हरियाली , थोड़ा आसमान
खुला रहने दो।

धुप्प अंधेरे कमरे में….
लकीर सी घुस आती है
सूर्य किरणें ,
कभी छिटकती है चांदनी ,
गर्म हवा के झोंके ,
कभी भीगी ऋतु का बखान
सुनने सुनाने दो।

एक छोटा सा रौशनदान ,
खुला रहने दो।

धुप्प अंधेरे कमरे में…..
दादे से लिपटता पोता ,
नानी से नवासी ।
पत्नि का निर्विकार मौन
बहन की हांसी।।
रिश्तो की ये तान – बान
गूँथने गुथाने दो।

धुप्प अंधेरे कमरे में ….
बेशक हर एक फांसीवादी हो जाये ,
या समाजवाद का हो निशान ।
हिन्दू हुआ कोई ,
कोई रहे मुसलमान ।
खुला रहने दो ,
इंसानियत का एक रौशनदान।

नजर आती है यहाँ से थोड़ी हरियाली , थोड़ा आसमान ।

खुला रहने दो
धुप्प अंधेरे कमरे में
एक छोटा सा रौशनदान ।

   ----  किरीट ठक्कर ।

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