“वायु प्रदूषण का फैलता ज़हर”सरकारी तंत्र इस पर आंख मूंद कर बैठे हुए हैं

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वायु प्रदूषण का फैलता ज़हर”सरकारी तंत्र इस पर आंख मूंद करबैठे हुए हैं।जन प्रतिनिधि कोई गम्भीर नहीं”।अब और ज्यादा लापरवाही बहुत खतरनाक हो सकती है।*-गणेश कछवाहा

पूरे देश में प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्थिति में पहुंच गया है।
प्रदूषण को लेकर विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा आगाह किए जाने के बावजूद इस क्षेत्र में सुधार की गति बेहद धीमी है। अब एक और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने भारत में इसकी भयावहता की ओर ध्यान खींचा है। आईक्यूएयर एयर विजुअल और ग्रीनपीस के नए अध्ययन के मुताबिक दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित 10 शहरों में से सात भारत में हैं, जिनमें पांच तो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में ही मौजूद हैं।प्रदूषण को लेकर अब और ज्यादा लापरवाही बहुत खतरनाक हो सकती है।*सरकारी तंत्र इस पर आंख मूंद कर बैठे हुए हैं। जन प्रतिनिधि कोई गम्भीर नहीं *”।

विश्व में सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में कोरबा 17वें और रायगढ़ 48वें स्थान पर
ग्रीनपीस की रिपोर्ट (Greenpeace report) के मुताबिक सबसे ज्यादा प्रदूषण (Pollution) फैलाने वाले विश्वभर के शहरों में कोरबा को 17वें और रायगढ़ को 48वें नंबर पर रखा गया है. इन शहरों से निकलने वाले प्रदूषण का असर पूरे छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) पर पड़ रहा है. ग्रीनपीस के एनओ 2 उपग्रह डेटा के विश्लेषण में दावा किया गया है कि परिवहन और औद्योगिक क्लस्टर देश के सबसे खराब नाइट्रोजन ऑक्साइड (एनओएक्स) हॉट स्पॉट के हालात पैदा कर रहे हैं. इसमें मध्य प्रदेश में सिंगरौली, उत्तर प्रदेश में सोनभद्र, छत्तीसगढ़ में कोरबा, ओडिशा में तलचर, महाराष्ट्र में चंद्रपुर, गुजरात में मुंद्रा और पश्चिम बंगाल में दुर्गापुर शामिल हैं.

विकास के नाम पर विनाश की खुली छूट
विकास के नाम पर सरकार ने औद्योगिक इकाइयों को धुआं फैलाने की खुली छूट दे रखी है।पर्यावरण में प्रदूषण (Pollution) फैलाने के मामले में छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के दो शहरों का बुरा हाल है. छत्तीसगढ़ के कोरबा (Korba) और रायगढ़ (Raigarh) को दुनिया के उन टॉप 50 शहरों में शहरों में शामिल किया गया है, जो सबसे ज्यादा प्रदूषण फैला रहे हैं. प्रदूषण को लेकर जानी मानी संस्था ग्रीनपीस ने एक विश्लेषित रिपोर्ट जारी की है. ये रिपोर्ट नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA) के आंकड़ों को आधार कर तैयार की गई है. इसमें छत्तीसगढ़ के कोरबा के हालात तो बेहद की खराब बताए गए हैं.“सरकारी तंत्र इस पर आंख मूंदकर बैठे हुए हैं।और जनप्रतिनिधि कोई गम्भीर नहीं ।”

इस स्टडी में प्रदूषण मापने के लिए पीएम 2.5 यानी ढाई माइक्रॉन (1 माइक्रॉन = 1 मिलीमीटर का सौवां हिस्सा) के आकार वाले कण को आधार बनाया गया। पिछले साल विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दुनिया के 15 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची जारी की थी, जिनमें 14 भारत के थे। इधर कुछ सालों से सरकार पर्यावरण के मुद्दे को अपने अजेंडे में सबसे ऊपर रखने का दावा करने लगी है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। हर तरफ से दबाव पड़ता है तो सरकार आनन-फानन कुछ कदम उठा लेती है लेकिन फिर सब कुछ पुराने ढर्रे पर आ जाता है।

ज्यादातर औद्योगिक इकाइयों में वायु प्रदूषणरोधी उपाय नहीं
कई और राज्यों ने भी पर्यावरण के नियमों को धता बताते हुए औद्योगिक इकाइयों, बिल्डरों और खनन माफिया को मदद पहुंचाई है। आईआईटी कानपुर की एक स्टडी के अनुसार प्रदूषण के लिए औद्योगिक इकाइयों और पराली जलाने जैसी सामयिक वजहों के अलावा गाड़ियों की बढ़ती संख्या, छोटे उद्योगों का डीजल जैसे प्रदूषणकारी ईंधनों पर निर्भर होना और निर्माण कार्यों व टूटी सड़कों की वजह से हवा में धूल का उड़ना भी जिम्मेदार है। आज भी ज्यादातर औद्योगिक इकाइयों में वायु प्रदूषणरोधी उपाय नहीं किए गए हैं।

दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ उससे निपटने के उपाय लागू करने होंगे-


प्रदूषण कम करने के लिए सबसे पहले हमें उसकी गंभीरता को समझना होगा, फिर दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ उससे निपटने के उपाय लागू करने होंगे। पड़ोस में चीन ऐसा कर सकता है तो हम क्यों नहीं कर सकते?
ग्रीनपीस इंडिया की तरफ से जारी की गई ऑनलाइन रिपोर्ट में कहा गया है कि चिंताजनक रूप से प्रदूषण बढ़ा है। सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत देश के विभिन्न राज्यों के प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड से मिली जानकारियों के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है।
इसमें दक्षिण भारत के कुछ शहरों को छोड़कर देश के किसी भी शहर ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के प्रदूषण नियंत्रण के लिए बनाए गए मानकों की सीमा का पालन नहीं करने की बात भी सामने आई है।24 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के 168 शहरों की स्थिति पर ग्रीनपीस इंडिया की इस रिपोर्ट का नाम ‘वायु प्रदूषण का फैलता जहर’ नाम दिया गया है। इसमें प्रदूषण का मुख्य कारण जीवाश्म इंधन को जलाना बताया गया है।

वायु प्रदूषण अब स्वास्थ्य से जुड़ी एक राष्ट्रीय समस्या का रूप ले चुका है-


ग्रीनपीस कैंपेनर सुनील दहिया ने कहा, “वायु प्रदूषण अब स्वास्थ्य से जुड़ी एक राष्ट्रीय समस्या का रूप ले चुका है। रिपोर्ट में शामिल शहरों ने इसे नियंत्रित करने का कोई कारगर उपाय नहीं किया है, जिसके कारण ये शहर वायु प्रदूषण के आधार पर रहने योग्य नहीं कहे जा सकते। यहां सांस लेना तक मुश्किल हो गया है, लेकिन सरकारी तंत्र इस पर आंख मूंद कर बैठे हुए हैं।”
बहुत सारी वैज्ञानिक रिपोर्टो ने इस दावे की पुष्टि समय-समय पर की है कि वायु प्रदूषण अब खतरे की घंटी बन चुकी है। दहिया का कहना है कि वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों की संख्या तंबाकू के कारण होने वाली मौतों से कुछ ही कम रह गई है।

प्रदूषण का मुख्य कारण-


रिपोर्ट में इसके कारणों को चिन्हित करते हुए बताया गया है कि इसका मुख्य कारण जीवाश्म ईंधन जैसे कोयला, पेट्रोल, डीजल का बढ़ता इस्तेमाल है। सीपीसीबी से आरटीआई द्वारा प्राप्त सूचनाओं में पाया गया कि ज्यादातर प्रदूषित शहर उत्तर भारत के हैं। यह शहर राजस्थान से शुरू होकर गंगा के मैदानी इलाकों से होते हुए पश्चिम बंगाल तक फैले हुए हैं।

इस खतरनाक स्थिति से निपटने के लिए तत्काल एक निगरानी व्यवस्था लागू करने की जरूरत है।”उन्होंने कहा, “बीते महीने सर्वोच्च न्यायालय ने ग्रेडेड रिस्पांस सिस्टम को स्वीकार्यता दी है, ताकि दिल्ली में वायु प्रदूषण की समस्या से निपटा जा सके। ग्रीनपीस इस कदम का स्वागत करता है। हमारा मानना है कि इस सिस्टम को दूसरे शहरों में भी लागू करना और उसे संचालित करना होगा। इसके लिए मजबूत और कारगर मॉनिटरिंग सिस्टम बनाना होगा, ताकि आम जनता को अपने शहर के प्रदूषण की स्थिति की जानकारी समय-समय पर मिलती रहे।”
हमें प्रदूषण नियंत्रण की रणनीति बेहद मजबूत, कारगर और लक्ष्य केंद्रित करनी होगी। साथ ही इसे समय-सीमा के भीतर लागू करना होगा।
एक ईमानदार, दृढ़ संकल्पित, गम्भीर और सख्त पहल की जरूरत है।(ग्रीनपीस रिपोर्ट से साभार)

गणेश कछवाहा, रायगढ़

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Anuj Shrivastava

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