उच्चतम न्यायलय में वन अधिकार पर सुनवाई, केंद्र सरकार फिर से गायब।

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आज उच्चतम न्यायलय में फिर से वन अधिकार कानून के बारे में सुनवाई हुई। न्यायपीठ ने पूछा कि केंद्र सरकार का वकील कहाँ है, लेकिन सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता कोर्ट में उपस्थित नहीं थे। पीठ ने आदिवासियों और अन्य जंगलवासियों के संघटनों को इस मामले में पक्ष बनने के आवेदनों को स्वीकार कर लिया, और फारेस्ट सर्वे ऑफ़ इंडिया को भी पक्ष बना दिया। पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि लोगों की बेदखली पर जो रोक लगायी गयी थी, वह जारी रहेगी। अगली सुनवाई 26 नवंबर को होगी।

जंगल में रहनेवाले लोगों के आंदोलनों के बाद राज्य सरकारें इस कानून के क्रियान्वयन की समीक्षा कर रहे हैं। याचिकाकर्ता चाह रहे हैं कि इन समीक्षाओं पर रोक लगायी जाये। इसके लिए उन्होंने आज आवेदन पेश किये थे। इन आवेदनों पर भी कोर्ट ने नोटिस जारी किया। इन आवेदनों पर केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को चार सप्ताह के अंदर जवाब देना होगा।

पीठ ने राज्य सरकारों को फारेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा किए जा रहे निरस्त दावों सर्वे के अधिकार को बहाल रखा और निरस्त हुए दावों पर आंकड़े व जानकारी देने के लिए चार हफ़्तों का समय दिया।

आज वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया (जो एक बड़ी पर्यावरण वादी संस्था है) ने आवेदन दिए की उनका नाम इस याचिका से हटाया जाये। कोर्ट अगली सुनवाई में इस आवेदन पर भी शायद फैसला करेगी।

आखिर में पीठ ने कहा की अगली सुनवाई में सारे मुद्दों पर बहस होगी।

फरवरी 2019 से लाखों आदिवासी और जंगलवासी परिवार डर और आतंक में रह रहे हैं कि इस याचिका की वजह से उन्हें जंगल से बेदखल किया जा सकता है। आज पीठ ने दोहराया कि बेदखली पर वर्तमान में रोक है। केंद्र सरकार की उदासीनता और चुप्पी की वजह से वन अधिकार कानून के पक्ष में कोर्ट में कोई भी तर्क नहीं रखने के कारण कोर्ट द्वारा बेदखली का आदेश दिया गया था लेकिन देशभर में आंदोलन होने के बाद केंद्र सरकार कोर्ट में जाने के लिए मजबूर हुई थी, जिसकी वजह से कोर्ट ने बेदखली पर रोक लगायी थी। आज केंद्र सरकार फिर से कोर्ट में अनुपस्थित रही, यह बहुत चिंताजनक और निंदनीय है।

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Anuj Shrivastava

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