देश के मूल रहवासी को ही अतिक्रमणकारी व घुसपैठी साबित करने की हो रही साज़िश: पीयूसीएल छत्तीसगढ़

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PUCL- लोक स्वातंत्रय संगठन, छत्तीसगढ़.

प्रेस नोट


रायपुर
११ सितंबर २०१९,

  वनाधिकार कानून के तहत आदिवासी तथा परंपरागत वनवासियों के जंगल अधिकार को मान्यता देने के विरुद्ध उन्हें अतिक्रमणकारी साबित करने वाइल्ड लाइफ फर्स्ट एवं अन्य की तर्ज़ पर छत्तीसगढ़ उच्चन्यायालय में भी एक याचिका दाखिल की गई है।गत 06 सितंबर को नितिन सिंघवी नामक व्यक्ति के द्वारा दायर याचिका, जिस पर आदिवासियों और अन्य परंपरागत वनवासियों के अधिकारों को चुनौती दी गयी है, की सुनवाई करते हुए माननीय न्यायालय ने छत्तीसगढ़ सरकार को आगामी दो माह तक वनाधिकार कानून के तहत पट्टा देने तथा अधिकारों को मान्यता देने की क्रियानवयन प्रक्रिया पर रोक लगा दी है । याचिका में पूर्व में निरस्त किये गए लगभग 04 लाख 62 हज़ार दावों पर वर्तमान सरकार द्वारा पुनर्विचार के निर्णय और संकल्पना को भी चुनौती दी गयी है।इस आदेश के बाद पूरे प्रदेश में 24925 आदिवासी परिवारों के बेदखली और उन्हें उजाडे जाने की आशंका फिर से बढ़ गयी हैै । 

छ0 ग0 पी यू सी एल का यह स्पष्ट मत है कि इसे जमीनी स्तर पर ग्राम सभाओं और वन समितियों को निष्प्रभावी करने तथा उनके सिफारिशों पर रोड़ा अटका दिए जाने की गहरी साजिश के तौर पर देखा जाना चाहिए । लाखों की संख्या में तो जानबूझकर दावे निरस्त कर दिए गए और दावा कर्ताओं को इसकी सूचना भी नहीं दी गयी। अनुभाग स्तर पर दावों हेतु हजारों की संख्या में आवेदन स्वीकार नही किये गए । कानून के मुताबिक अपील के मौके भी नही दिए गए । पूरे प्रदेश मे छत्तीसगढ़ के संदर्भ में देखा जाए तो इस कानून के लागू होने के शुरुआत से ही प्रशासनिक मशीनरी का रवैया नितांत उपेक्षापूर्ण रहा ।गौरतलब हो कि प्रदेश में अभी भी लाखो आदिवासी और अन्य परम्परागत वन निवासी अपने वनाधिकारों से वंचित हैं l

  यह चिंताजनक है कि प्रदेश में वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन की संकल्पना ही विद्वेषपूर्ण प्रतीत होता है।बलौदाबाजार के कसडोल में कलेक्टर द्वारा उच्च न्यायालय  के आदेश का हवाला देते हुए वनाधिकार दावों को स्वीकार नही किया जाना इसका ताजा उदाहरण है । पूरे प्रदेश में  प्राप्त दावों पर पट्टा देने का प्रतिशत 47.54 है । सामुदायिक अधिकारों की मान्यता नगण्य है । आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में 30 हज़ार से अधिक गैर आदिवासियों को पट्टे वितरित किये गए हैं, दिलचस्प है कि इस मामले में छत्तीसगढ़ पूरे देश मे अव्वल है ।

राज्य सरकार इस मामले में उच्च न्यायालय के समक्ष जनता के हित में पक्ष रखने विफल रहा और जो कानून जनसंघर्षों के फलस्वरूप ऐतिहासिक अन्याय को ठीक करने की संकल्पना के साथ आया था ,आज वही कानून प्रशासनिक विफलता के कारण देश के मूल रहवासियों को ही अतिक्रमणकारी  और घुसपैठिया साबित करने पर आमादा है। प्रदेश में अतिक्रमण को परिभाषित करने और अवैध अतिक्रमण रोकने अन्य सम्यक कानून प्रभावी हैं। यदि यह वनों के विनाश और वनकर्मियों के सुरक्षा से संबंधित मामला है तो भी ऐसे कथित अवैधानिक कृत्यों के रोकथाम के लिए व्यापक विधिक और प्रशासनिक उपचार मौजूद हैं , बावजूद इसके बिडंबना यह कि राज्य सरकार आदिवासियों के हित संरक्षण में पक्ष रखने में नाकाम रही और कोर्ट ने राज्य के कमजोर दलील के परिणामस्वरूप वनाधिकार मान्यता पर ही रोक लगाने का आदेश पारित कर दिया ।छत्तीसगढ़ पी यू सी एल प्रदेश में सन 2005 के पहले से वनों पर काबिज लाखों आदिवासियों तथा अन्य परंपरागत वनवासियों का पक्ष लेते हुए उनके संवैधानिक अधिकारों की संरक्षा का पुरजोर मांग करती है ।

द्वारा जारी-

लोक स्वातंत्रय संगठन छत्तीसगढ़,

डिग्री प्रसाद चौहान
(अध्यक्ष)

शालिनी गेरा
( सचिव )

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