हर 40 सेकंड में एक आत्महत्या: विश्व आत्महत्या निवारण दिवस

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आज आपसे एक बेहद निजी सवाल पूछ रहा हूँ । इसका सम्बन्ध आज के विशेष दिन से है । क्या आपके मन में ग़लती से भी कभी आत्महत्या का ख्याल आया है ?

मुझे नहीं पता आप इसका क्या जवाब देंगे क्योंकि परिस्थितियों के साथ मनःस्थिति भी अलग अलग होती है । अगर नहीं आया है तो बहुत अच्छी बात है । समझ लीजिए आप मानसिक रूप से सदा स्वस्थ्य हैं।

अच्छा नहीं है ना …आत्महत्या करना । आपको भी बहुत तकलीफ होती ना होगी जब आप सुनते होंगे कि किसी युवा ने परीक्षा में फेल हो जाने की वजह से, किसी लडकी ने विवाह ना होने की वजह से, किसी वृद्ध ने अपनी बीमारी की वजह से, किसी ने गरीबी, दुख, तकलीफ की वजह से और किसी किसान ने कर्ज में बुरी तरह डूब जाने की वजह से आत्महत्या कर ली है ।

दुनिया वैसे भी दुखों से भरी है । चौंकाने वाली बात है तो यह है कि दुनिया में हर 40 सेकंड में कोई न कोई आत्महत्या करता है । लेकिन दुनिया मे ऐसे लोग भी हैं जो लोगों को आत्महत्या से बचाने की कोशिश करते हैं ।

चलिये आप को बता दूँ कि दुनिया भर में आत्महत्या के विरुद्ध जागरूकता पैदा करने के लिए आज 10 सितंबर को ‘वर्ल्ड सुसाइड प्रीवेंशन डे’ मनाया जाता है । इसकी शुरुआत 2003 से हुई । यह ‘इंटरनल एसोसिएशन ऑफ सुसाइड प्रीवेंशन’ IASP; ‘वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन’ WHO और वर्ल्ड फेडरेशन फ़ॉर मेंटल हेल्थ WFMH के द्वारा प्रेरित है ।

खैर बहुत सारे कारण हो सकते हैं किसी व्यक्ति द्वारा की जाने वाली आत्महत्या के । लेकिन यह ख्याल सबसे पहले मस्तिष्क में ही जन्म लेता है । इसलिए सबसे ज़रूरी है मस्तिष्क का उपचार । फिर स्थितियों से निपटना है। आइए हम आत्महत्या के विरुद्ध और आत्महत्या को प्रेरित करने वाली परिस्थितियों के विरुद्ध जनचेतना जागृत करें ।

मैंने हमेशा सोचा कि आत्महत्या की मनःस्थिति पर कोई कविता क्या लिखेगा ? आत्महत्या का ख्याल आये और कविता लिखने बैठ जाये तो फिर आत्महत्या क्यों करेगा ? रघुवीर सहाय ने कविता लिखी थी ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ । मैंने भी एक कविता लिखी थी, लीजिये पढ़ लीजिये …

आत्महत्या

जब खूब रोने का मन करता है
और फूटती नहीं है रुलाई
भीतर घुट जाती है
कोई बेआवाज़ चीख
अदृश्य जख्मों से रिसता रक्त
जब दिखाई नहीं देता है
असहनीय हो जाती है
दर्द की कोई लहर

तमाम भीड़ के बीच
जाने पहचाने भी ग़ैर लगते हैं
यह ख़याल मन में नहीं आता है
कि दुनिया का क्या होगा हमारे बाद

अपनी ज़िंदगी का मक़सद नज़र आता है
लेकिन बंद हो जाते हैं
उसे पूरा करने के तमाम रास्ते

भीतर ही भीतर उपजती हैं गालियाँ
मन करता है भेदभाव करने वाली
इस व्यवस्था का कोई जिस्म होता
तो उसे लटका दिया जाता फांसी पर

अंतत: मनुष्य के भीतर
जन्म लेने लगता है
सब कुछ दान कर देने का भाव
वह दान के लिए पात्र ढूंढता है
और स्वयं से बेहतर
उसे कोई नहीं मिलता

आत्महत्या अपने आप के प्रति एक सहानुभूति है
अपने आप पर की गई दया है
जो हमेशा दूसरों की वज़ह से उपजती है ।

शरद कोकास ■

(कविता संकलन : हमसे तो बेहतर हैं रंग से )

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कवितांश

आत्महत्या के विरुद्ध/ रघुवीर सहाय

भारत पाकिस्तान अलग-अलग करो
फिर मरो कढ़िलकर
भूल जाओ
राजनीति
अध्यापक याद करो किसके आदमी हो तुम
याद करो विद्यार्थी तुम्हें आदमी से
एक दर्जा नीचे
किसका आदमी बनना हैदर्द?
दर्द, खैराती अस्पताल में डाक्टर ने कहा वह मेरा काम नहीं
वह मुसद्दी का है
वही भेजता है मुझे लिखकर इसे अच्छा करो
जो तुम बीमार हो तुमने उसे खुश नहीं किया होगा
अब तुम बीमार हो तो उसे खुश करो
कुछ करो
उसने कहा लोहिया से लोहिया ने कहा
कुछ करो
खुश हुआ वह चला गया अस्पताल में भीड़
भौचक भीड़ धाँय धाँय
सौ हज़ार लाख दर्द आठ दस क्रोध
तीन चार बन्द बाज़ार भय भगदड़ गर्द
लाल
छाँह धूप छाँह, नहीं घोड़े-बन्दूक
धुआँ खून ख़त्म चीख़
कर हम जानते नहीं
हम क्या बनाते हैं
जब हम दफ़नाते हैं
एक हताश लड़के की लाश बार-बार
एक बेबसी
थोड़ी-सी मिटती है
फिर करने लगती है भाँय-भाँय
समय जो गया है उसके सन्नाटे में राष्ट्रपति
प्रकटे देते हुए सीख समाचारपत्र में छपी
दुधमुँही बच्ची खाती हुई भीख
खिसियाते कुलपति
मुसद्दीलाल
घिघियाते उपकुलपति
एक शब्द कहीं नहीं कि वह लड़का कौन था
क्या उसके बहनें थीं
क्या उसने रक्खे थे टीन के बक्से में अपने अजूबे
वह कौन-कौन-से पकवान
खाता था
एक शब्द कहीं नहीं एक वह शब्द जो वह खोज
रहा था जब वह मारा गयां

सन्नाटा छा गया
चिट्ठी लिखते-लिखते छुटकी ने पूछा
‘क्या दो बार लिख सकते हैं कि याद
आती है?’
‘एक बार मामी की एक बार मामा की?’
‘नहीं, दोनों बार मामी की’
‘लिख सकती हो ज़रूर बेटी’, मैंने कहा
समय आ गया है
दस बरस बाद फिर पदारूढ़ होते ही
नेतराम, पदमुक्त होते ही न्यायाधीश
कहता है समय आ गया है
मौका अच्छा देखकर प्रधानमंत्री
पिटा हुआ दलपति अख़बारों से
सुन्दर नौजवानों से कहता है गाता बजाता
हारा हुआ देश।
समय जो गया है
मेरे तलुवे से छनकर पाताल में
वह जानता हूँ मैं।

◆ कविता : रघुवीर सहाय◆

प्रस्तुति : शरद कोकास■

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