दमन के खिलाफ अभियान का राज्य सम्मलेन

छत्तीसगढ़ बॉस्केट

28 अगस्त 2019 को छत्तीसगढ़ के विभिन्न नागरिक समाजिक और मानवाधिकार मज़दूर व महिला और जन संगठनों द्वारा गास मेमोरियल, जैस्ताम्भ, रायपुर में ‘दमन के खिलाफ अभियान’ सम्मलेन रखा गया | दमन के खिलाफ अभियान जनता, जल, जंगल, जमीन व जन आन्दोलनों पर बढ़ते दमन के खिलाफ आवाज़ उठाता है |

२८ अगस्त को भीमा कोरेगाँव केस में फ़र्ज़ी आरोपों पर वक़ील लेखक व सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किए गए एक साल हो गए हैं। इन ग़ैर क़ानूनी गिरफ़्तारियों के ख़िलाफ़ और साथियों रिहाई के लिए यह कार्यक्रम किया गया।

पिछले कुछ सालों में देश में बढ़ते मानवाधिकार हनन, नफरत के माहौल, अभिव्यक्ति के अधिकारों पर बढ़ते दबाव के विरोध में यह सम्मलेन रखा गया| सरकार और उसकी नीतियों की आलोचना करने वाले किसी भी व्यक्ति या संस्थाओं या संगठनों को देश द्रोही घोषित कर दिया जा रहा है और राजकीय संस्थाओं जैसे पुलिस, जांच एजेंसी, गृह मंत्रालय द्वारा उनको दबाया जा रहा है| ठीक एक साल पहले 28 अगस्त 2019 को इस राजकीय दमन की एक मिसाल कामरेड सुधा भारद्वाज, वर्नन गोंजलवेज, वर वरा राव, अरुण फेरेरा की और उससे पहले 6 जून को प्रफ़ेसर शोमा सेन, महेश राउत, अधिवक्ता सुरेन्द्र गैडलिंग, सुधीर धवले और रोना विल्सन की गिरफ्तारियों में देखी गयी|

वर्तमान भाजपा सरकार द्वारा इन वर्षों में संविधान से छेड़छाड़ करके कई गैर कानूनी बदलाव किये जा रहे है जो संवैधानिक, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक सिधान्तों और अधिकारों को कुचलते है |

कार्यक्रम में वक्ता विमल भाई द्वारा कश्मीर में अनुच्छेद 370 खारिज करने के बाद कश्मीर में आर्मी की स्थिति और कश्मीरियों के दर्द और गुस्सों को बयान किया गया| अधिवक्ता रजनी सोरेन द्वारा बताया गया की एन.आई.ए एक्ट और यू.ए.पी.ए. एक्ट में संशोधन न्याय के नैसर्गिक मूल्यों के खिलाफ है और सरकार को असीम शक्तियां देता है| अधिवक्ता बेला भाटिया ने नेशनल सिटीजन रजिस्टर से असम में लोगों को हो रही मुश्किलों के बारे में बताया और नागरिक संशोधन अधिनियम के खतरों को साझा किया| सरकार के ये कदम और देश में अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमले, भाजपा और आर.एस.एस. की मुस्लिम विरोधी मानसिकता को दर्शाता है | वही SC/ST कानून में संशोधनों की कोशिशें और दलितों पर बढ़ते हमले जातीवाद और मनुवाद की जड़ो को मजबूत करते है|

गुरु घासीदास सेवा संघ के लाखन सुबोध ने बताया कि यह नीतियाँ भारत को हिन्दुत्ववादी फासीवादी देश बनाने की ओर बढ़ाता है|
माकपा के धरमराज माहापात्रा द्वारा श्राम कानून में किये गए बदलावों का विरोध किया गया जो नव उदीराकरण के दौर से जारी है |
बिलासपुर उच्च न्यायालय कि अधिवक्ता कांता मराठे जी, दलित आदिवासी मंच सोनाख़ान देवेंद्र जी और धरमजयगढ़ के सज्जल जी ने आदिवासी अधिकारों पे बात राखी जिसमें वनाधिकार कानून और इंडियन फारेस्ट एक्ट में किये जा रहे संशोधनों और सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदिवासीयों को उनके स्थान से निकालने का विरोध किया गया | ऐसे निर्णय और संशोधन आदिवासियों को अपने ही जमीन और संसाधन से बेदखल करके उन्हें और हाशियाकृत करते है | उन्ही के जमीन पर बड़े कॉर्पोरेट घराने और कारखाने सरकार से दलाली स्थापित कर रहे है | छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, ऐसे संशोधन व बदलाव के चलते यहाँ की जल जंगल और खनिज सम्पदा के साथ साथ यहाँ के दलित, आदिवासी व अल्पसंख्यक जनता के जीवन को भी ख़तरा है । इस बात को ज़ोर देते हुए मकपा के संजय पराते और ज़िला किसान संघ राजनांदगाँव सुदेश टिकम ने सत्र का समेकन किया।

कार्यक्रम में अन्य वक्ता और भागीदारी देने कोमरेड नीरा डहरिया दिनेश सतनाम नंदकश्यप आनंद मिश्रा जनक लाल ठाकुर रिनचिन भीमराव बागडे बनसी साहू लखन साहू कलदास डहरिय नकुल साहू चुन्नी साहू संगीता साहू बाबूलाल वर्मा बिशनु यादव सावित्री साहू राजकुमार साहू कल्याण सिंह पटेल अखिलेश एड्गर सादिक़ अली तुहिन देव राजकुमार सोनी, सोरा यादव उर्मिला साहू राजेंद्र सायाल गौतम बंदोपाध्याय सुरेन्द्र मोहंती आलोक शुक्ला विजय भाई एम डी सतनाम कमल शुक्ला ए पी जोसी श्रेया उपस्थित थे |

सरकार के इन कदमों की मार सबसे ज्यादा मुस्लिम, आदिवासी, दलित तबके और उनके अधिकारों पे काम करने वाले लोगों पर पड़ रही है|

कार्यक्रम में रेला सांस्कृतिक समूह द्वारा प्रस्तुति दी गयी| कार्यक्रम में विभिनान सामाजिक संगठनों से 200-250 लोग आये और अपना विरोध जताए | अंत में बूढा तालाब से सप्रे स्कूल तक रैली निकाल के शासन को सांकेतिक गिरफ्तारियां दी गयी

उपस्थित जन संगठनों ने प्रस्ताव पारित किया कि –

  1. कामरेड सुधा भारद्वाज और अन्य साथियों की अविलंब रिहाई हो
  2. भीमा कोरेगाँव कांड में असली गुनहगारों – संभाजी भिड़े एवं मिलिंद एकबोटे – को तुरंत गिरफ़्तार कर न्यायिक प्रक्रिया चलायी जाय।
  3. यू॰ए॰पी॰ए॰ क़ानून में हुए संशोधन एवं अन्य दमनकारी क़ानून जो जनता के मौलिक अधिकारों का हनन करते हो को तत्काल प्रभाव से वापिस लिया जाय।
  4. छत्तीसगढ़ की जेलों में बंद वामपंथी उग्रवाद के झूटे आरोपों के तहत बंदी निरपराध आदिवासियों को शीघ्र रिहा किया जावे।
  5. देश भर में बढ़ते भीषण साम्प्रदायिक हिंसा जिसमें मॉब लिंचिंग भी शामिल है जोकि मुख्यतः मुसलमानों एवं ईसाइयों के ख़िलाफ़ हो रहा है पर सरकार अविलंब रोक लगाएँ।
  6. जम्मू कश्मीर में धारा 370 की पूर्ववत बहाली हो तथा नागरिकों के लिए समस्त संवैधानिक अधिकार तुरंत प्रदान किया जावे। वहाँ फ़ौजी दमन बंद हो तथा शांति व समानता के आधार पर जनता से बातचीत की शुरुआत हो।
  7. मोदी सरकार द्वारा कोरपोरेटो के हित में किए गए श्रम क़ानूनों में सुधार बंद हो तथा श्रमिकों के समस्त ट्रेड यूनियन अधिकारों की बहाली हो।
  8. देश में दलितों के ख़िलाफ़ बढ़ते भेदभाव, मनुवाद से प्रेरित जातिगत दमन व हिंसा पर रोक लगे। अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण क़ानून में संशोधन करने से केंद्र सरकार बाज़ आए।
  9. वन अधिकार क़ानून 2006 एवं पेसा क़ानून का क्रियान्वयन केंद्र सरकार सुनिश्चहित करें। वन अधिकार क़ानून संशोधन के ज़रिए लाखों आदिवासियों को वन भूमि से बेदख़ल करने पर तुरंत रोक लगे।
  10. अंत में सदन ने सर्वसम्मति से केंद्र सरकार के गैर संवैधानिक और गैर लोकतांत्रिक कदमों और दमन की नीतियों के खिलाफ अपनी लड़ाई और संघर्ष को मजबूत करने का संकल्प लिया।

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