घरेलू हिंसा

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औरत की हथेलियां छिपा सकती हैं अपने वक्ष
पर पीठ पर बनाए बेल्ट के निशान नहीं
औरत की छाती से ज्यादा छिली जाती है उसकी पीठ
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एक ये भी मापदंड है शादी बचाए रखने का
प्रेम भले न हो
कम से कम वे हाथ तो नहीं उठाते
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“यू आर डम्ब, कैरेक्टर लैस वुमन”
“आखिर तुम्हारी औकात ही क्या है”
“करती क्या हो सारा दिन घर में…..”
उनका अक्सर मुझे यूँ कहना…
खैर जाने दो
तिरस्कार और व्यंग्य बाण
हाथ उठाने से बढ़कर थोड़े ही हैं
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मैं स्वावलंबी न हो जाऊँ
स्वच्छंद न हो जाऊँ
सृजनात्मक न हो जाऊँ
मेरे व्यक्तित्व विहीन बने रहने के लिए जरूरी है
मेरी देह पर बनते रहें हर हफ्ते
लाल नीले निशान
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वे शालीन संभ्रांत परिवार से हैं
मेरे शरीर पर कोई चोट के निशान नहीं छोड़ते
क्या उनकी चुप्पी और उपेक्षा के लिए
कोई शिकायती थाना है?

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दृश्य 1

“कबसे मार रहा वो तुम्हें”
जवाब में सकपका कर बोली 5 साल
“तुम लोगों को आदत है सहने की,
पहले क्यों नहीं बताया”

दृश्य 2

“कबसे मार रहा वो तुम्हें”
“पहली बार हाथ उठाया”
“और तुम शिकायत करने चली आयीं,
तुम लोगों को आदत है घर तोड़ने की”


किसी ने उसे नहीं बताया कि कब चीखना सही है
दूसरे, दसवें या पचासवें थप्पड़ पर

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एक बुद्धिजीवी ने औरतों की आत्महत्या पर उठाई थी ये बात
कि औरत को आदमी नहीं उसकी खुद की कमजोरी मारती है
और मैं मूर्ख नहीं समझा सकी उसे ये बात
कि साहब औरतें मारी नहीं जातीं औरतें छलीं जाती हैं

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एकता

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