ढहती अर्थव्यवस्था: मोदी सरकार द्वारा महाअमीरों को संजीविनी बूटी और आम जनता को विष का प्याला

आखिरीकार नीति आयोग को भी स्वीकार करना पड़ गया है कि भारत की अर्थव्यवस्था चरमारा गई है । अर्थव्यवस्था की सत्तर साल मंे पहली बार इतनी बुरी हालत हुई है । अब वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन इसे और अधिक ढहने से बचाने के लिए महाअमीरों के लिए कुछ उपहार लेकर आई हैं । सीतारामन ने विदेशी और देशी इक्विटी निवेशकों, शेयर बाजार मे पोर्टफोलियो निवेश के जरिए धन कमानेवाले सट्टेबाजों पर इस बजट में लगाये गये महाअमीर शुल्क को वापस लेने का ऐलान किया और साथ ही बड़ी आॅटोमोबाइल कम्पनियों एवं अन्य कारपोरेटों के लिए रियायतों की घोषणा की, ताकि उनकी मदद से अर्थव्यवस्था की गाड़ी को फिर से पटरी पर लाया जा सके ।

लेकिन खबरें बताती हैं कि अर्थव्यवस्था की सुस्ती किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य क्षेत्रों को भी अपनी गिरफ्त में लेती जा रही है । आॅटोमोबाइल, दोपहिया वाहन, कार, भारी वाहन और रीयल इस्टेट से लेकर टेक्सटाइल और यहां तक कि बिस्कुट एवं अन्य उपभोक्ता वस्तुओं तक । क्यों ? इसका एक सीधा सा कारण यह है कि उपभोक्ताओं की खरीद करने की क्षमत कम होती जा रही है । स्वाभाविक रूप से, मध्य आय समूह की नौकरियां भी तेजी से खत्म हो रही हैं और बेरोजगारी की दर पिछले 45 वर्षों में सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है । जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था में सुस्ती पसर रही है, वैसे-वैसे हर रोज हजारों लोग नौकरी से हाथ धो रहे हैं । कृषि क्षेत्र में गंभीर संकट में है, जिसके चलते हजारों किसान आत्महत्या करने के लिए बाध्य हो रहे हैं और लाखों खेतिहर मजदूर परिवार शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं । इसके साथ-साथ, मानव-निर्मित जलवायु परिवर्तन के कारण सूखा, अचानक बाढ़ और भू-स्खलन जैसी घटनाएं आम होती जा रही हैं । इन सबकी वजह से व्यापक जनता की क्रय शक्ति काफी कम हो गई है ।

अब तो कई कारपोरेट चिन्तक भी इस बात से सहमत हैं कि वित्त मंत्री द्वारा बजट में की गई घोषणाओं को वापस लेने और कारपोरेट घरानों को कुछ रियायत देने मात्र से बढ़ते संकट का समाधान नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इस आर्थिक सुस्ती की शुरुआत, मुख्यतः, नोटबंदी के साथ हुई थी और जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) लागू करने के बाद यह ज्यादा तीखा हो गया । हालांकि मोदी चुनाव प्रचार के समय पुलवामा और बालाकोट के बहाने मर्दाना राष्ट्रवाद की मुहिम चलाकर सिर पर मंडराते आर्थिक संकट के बादल से जनता का ध्यान भटकाने में सफल रहा था और उसके वित्त मंत्री ने आर्थिक सर्वे के आंकड़ों में हेरफेर कर अपना बजट पेश किया था, किन्तु कश्मीर मुहिम, पाकिस्तान-घृणा और राष्ट्रीय नागरिकता पंजी जैसी परियोजनाओं के जरिए बहुसंख्यक हिन्दुत्व वोट बैंक के बीच उन्माद पैदा करने की कोशिशों के बावजूद, एक दिन सच्चाई को तो सामने आना ही था, क्योंकि आर्थिक संकट इतना विकट रूप ले चुका है कि उस पर अब पर्दा डाल पाना सम्भव नहीं था । यहां तक कि कारपोरेट मीडिया को भी ढहती अर्थव्यवस्था के बारे में बोलना पड़ा ।

आज लाख टके का सवाल यह है कि क्या वित्त मंत्री कारपोरेट घरानों और सट्टेबाज दैत्यों को दी गई इन रियायतों के जरिए अर्थव्यवस्था की सुस्ती को गति प्रदान कर पायेंगी ? मौजूदा दरबारी पूंजीवाद के दौर में, जहां इन रियायतों का सारा फायदा ये दैत्य चूस ले जायेंगे, आम जनता तक इसका रत्ती भर अंश ही पहुंच पायेगा । इसलिए, बेरोगजारी बढ़ती रहेगी और क्रय शक्ति कम होती रहेगी और अर्थव्यवस्था की सुस्ती और सुस्त हो जायेगी।

जरूरत इस बात की है कि इस जाली आर्थिक पहल की दिशा को उलटा जाये और आखिरकार नव-उदार, कारपोरेट-परस्त नीतियों को ही रद्द किया जाये और इसकी जगह आत्म-निर्भर, टिकाऊ, जनपक्षीय अर्थनीति लागू की जाये । लेकिन यह न तो मोदी सरकार को स्वीकार्य है और न ही कारपोरेट साम्राज्यवादी व्यवस्था को । अतः संकट का और भी गहरा होना तय है । और जैसा कि आम तौर पर होता है, इस संकट का बोझ मेहनतकश और उत्पीड़ित जनता के कंधे पर ही आयेगा । ऐसे में उनके पास एक ही रास्ता बचता है: सड़कों पर उतरो, इस बर्बर शासन व्यवस्था को उखाड़ फेंको ।

कॉमरेड के.एन. रामचन्द्रन
महासचिव
भाकपा(मा-ले) रेड स्टार

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