“सरदार सरोवर में डूबे विस्थापित”

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विमल भाई, एनएपीएम

“हम अपना अधिकार मांगते नही किसी से भीख मांगते” जैसे तमाम नारो के साथ नर्मदा घाटी के अनेकानेक डूबते गांव से, संपूर्ण पुनर्वास की मांग को लेकर एक बड़ा जत्था 21 अगस्त को दिल्ली पहुंचा। जंतर-मंतर पर दिन भर का धरना दिया जिसमें देश के विभिन्न जन संगठन व मान्यवन्त पहुंचे।

मानसून की शुरुआत होते ही इस बार तेज बारिश के कारण नर्मदा पूरी लबालब भरी। गुजरात के प्रत्येक जलाशय में पानी है। लगभग 192 गांव के हजारों हजार परिवार जिनका पुनर्वास नहीं हुआ वे अभी गांव में ही है। उसके बावजूद सरदार सरोवर बांध का जल पुरा भरा जा रहा है।

आंदोलन के वरिष्ठ साथी देवराम कनेरा ने कहा कि हम पुनर्वास की भीख मांगने नहीं आए हैं यह हमारा हक है जिसको हम सरकार से लेने के लिए आए हैं । जिसको सुप्रीम कोर्ट व नर्मदा जल विवाद प्राधिकरण के तहत विस्थापितों को अधिकार दिए गए हैं। सरस्वती बहन,श्यामा बहन, चंचला बहन, कमरू जीजी जैसी तमाम बहने और गांव गांव के विस्थापित जो अपने अपने गांव में पानी से टक्कर ले रहे हैं। रात रात भर पानी में खड़े हुए और पानी में अगर बिजली भी आई दो साथी की मृत्यु हुई। ऐसी कठिन परिस्थिति में भी वे दिल्ली सरकार को जगाने आए।

नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन विमेन की वरिष्ठ साथी कॉमरेड एनी राजा, जो घाटी में कई बार गई है। उन्होंने आंदोलन को समर्थन देते हुए कहां की सरकार प्राकृतिक संसाधनों को लूट कर कारपोरेट घरानों को दे रही है। जन संघर्ष वाहिनी के किसान नेता भूपेंद्र रावत ने कहा कि गुजरात की जमीन को सिंचित करने के नाम पर नर्मदा घाटी को बाढ़ ग्रस्त किया गया है। मगर असलियत में यह पानी कार फैक्ट्री और इंडस्ट्री को दिया जा रहा है। आखिर यह कारपोरेट कितने किसानों की जिंदगी लेगा और जमीन लूटेगा। किसान सभा के कॉमरेड मनोज, पाकिस्तान इंडिया पीपुल फोरम फ़ॉर पीस एंड जस्टिस के एम जे विजयन, साथी मधुरेश, कचरा कामगार यूनियन के श्री प्रकाश दलित, आदिवासी अधिकार शक्ति मंच के अशोक कुमार, डायनेमिक एक्शन केरला के साथी विनोद कोशे, महान संघर्ष समिति की साथी प्रिया पिल्लई, दिल्ली समर्थक समूह के अनिल, एमलोन, ऋषित नियोगी, दिव्यांश व आर्यमन आदि साथियों ने आंदोलन को समर्थन दिया।

नर्मदा बचाओ आंदोलन के एक प्रतिनिधिमंडल, जिसमें सरस्वती बहन, जगदीश पटेल, रोहित ठाकुर, और समन्वय के साथी विमल भाई जल शक्ति मंत्रालय के सचिव श्री उपेंद्र प्रसाद सिंह से मुलाकात की। मुलाकात के बाद प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि “”सचिव महोदय ने मिलते ही कहा ” मैं तो अभी आया हूं मगर मुझे मालूम पड़ा है कि सर्वोच्च न्यायालय में सब कुछ हो चुका है, गुजरात सरकार सब पैसा दे चुकी है, मध्यप्रदेश भी पुनर्वास कर चुका है। शिकायत विभाग भी है। जानकारी मिली है कि जब तक पानी नहीं भरा जाएगा तब तक लोग निकल कर नहीं जाएंगे।” प्रतिनिधिमंडल ने प्रत्येक गांव के आंकड़े और एनवीडीए द्वारा दिए गए आंकड़े भी सामने रखें और बताया कि एनवीडीए ने पहले जीरो और अब 6000 की संख्या में विस्थापित बताए हैं जिनका पुनर्वास नहीं हुआ जबकि आंदोलन का कहना है कि अभी 32000 परिवार गांव में हैं जिनका पुनर्वास पूरा नहीं हो पाया है। पुनर्वास स्थलों की स्थिति भी बहुत खराब है । उसमें बहुत भ्रष्टाचार हुआ है। शिवराज सिंह जी की सरकार पिछले 15 सालों में कभी लोगों को नहीं मिली। बांध के गेट भरने का निर्णय प्रधानमंत्री जी का एकल निर्णय था । हमने उनसे कहा कि आप तुरंत एक टीम भेज सकते हैं और अपनी आंखों से जांच कर सकते हैं। इस टीम में कुछ स्वतंत्र विशेषज्ञ भी रखे जाएं । इस पर सचिव महोदय ने कहा कि गुजरात को बड़ी आपत्ति होगी कि अब तो मुद्दा खत्म हो चुका, पुनर्वास का काम पूरा हो चुका, फिर दोबारा यह बात उठाना सही नहीं। तब उन्हें बताया कि आप मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को पत्र लिखिए और उनसे उनकी प्रतिक्रिया जाने। इस पर भी वे तैयार नहीं हुये। मगर उन्होंने यह जरूर कहा कि वे तुरंत मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को फोन करके स्थिति का जायजा लेंगे।””

जबकि यह बात दीगर है कि मध्य प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव सचिव डॉ राजीव कुमार गुप्ता ने जल शक्ति मंत्रालय के सचिव महोदय को 4-4-2019 को पत्र भेजा था। जिसके अंदर में उन्होंने तकनीकी तथ्यों को रखते हुए यह अपेक्षा की थी कि ऐसे इस वर्ष बिजली उत्पादन ना किया जाए ताकि जलाशय में पानी रहे और अन्य मुद्दों पर उन्होंने जलशक्ति मंत्रालय की सचिव महोदय से समय मांगा था। ताकि वे तकनीकी समूह के साथ इस विषय में विस्तार से तथ्यों को रख सके स्पष्ट है कि जल शक्ति मंत्रालय की सचिव महोदय ने यह बात प्रतिनिधिमंडल से छुपाने की कोशिश की।

इन सबके बावजूद बांध विस्थापितों के पुनर्वास पर पूरी तरह से आंख मूंदना सरकार की नकारात्मकता का प्रतीक है।

नर्मदा घाटी में स्थिति गंभीर है। बाढ़ से जुड़े मामलों में दो लोगों की पहले ही मौत हो चुकी है। गाँवों में पानी भरता जा रहा है। बिजली काटी जा रही है। अधिकारी सरदार सरोवर बांध में 138.68 मीटर के पूर्ण जलाशय स्तर को भरने की ठान चुके हैं।
आज जल स्तर 133 मीटर है और पानी लोगों के घरों और खेतों तक पहुंच गया है, जब की वह जलमग्न स्तर के उपर हैं।

192 गाँवों और मप्र की एक बस्ती में 32,000 से कम परिवार नहीं हैं, और सतीपुर और विंध्य के पहाड़ी क्षेत्र में सैकड़ों आदिवासी बस्तियां हैं। इन गाँवों में हजारों घर, उपजाऊ खेत, दुकानें, छोटे उद्योग, मछली पालन और मवेशी हैं, साथ ही मंदिर, मस्जिद और विभिन्न सांस्कृतिक स्मारक भी हैं, जिनमें लाखों पेड़ हैं।
2000, 2005 और 2007 के सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार पुनर्वास और नर्मदा ट्रिब्यूनल अवार्ड पूरा होने से बहुत दूर है। आदिवासियों और अन्य किसानों, मज़दूरों, मछुआरों और उनकी संपत्ति के समुदायों को जलमग्न करना अवैध, अन्यायपूर्ण और अनैतिक हैं।

इस मांग के साथ कि पूर्ण पुनर्वास के बिना कोई जलमग्नता नहीं होनी चाहिए और नर्मदा घाटी के सैकड़ों लोग नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण से मांग करने के लिए दिल्ली आ रहे हैं। पूर्ण जलाशय को पूरी तरह से भरने की अनुमति तब तक नहीं दी जाए जब तक पूर्ण पुनर्वास पूरी तरह से पूरा ना हो जाए।

आंदोलन व देशभर के समर्थकों की मांग है कि:-
1-सरदार सरोवर को पूर्ण जलाशय स्तर तक भरने की अनुमति न दी जाए
2-192 गांव मैं 32000 परिवार का पुनर्वास नहीं हुआ है लेकिन बढ़ता जलस्तर उनकी जान – जीविका को खतरा है। उनका पुनर्वास तुरंत पूरा किया जाए
3-जब तक पुनर्वास पूरा ना हो सरदार सरोवर बांध के गेट खुले रखे जाये और जलस्तर कम किया जाए।

विमल भाई, एनएपीएम

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