भाग 7 – जल से ढँकी हुई थी पृथ्वी .एक पुरातत्ववेत्ता की डायरी शरद कोकास.

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अब तक आपने पढ़ा कि विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन की प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययनशाला के छात्र उत्खनन के लिए दंगवाड़ा नामक स्थल पर आये हैं । आने के बाद से वे विभिन्न चर्चाओं में लगे हैं और अब तक उनकी बातचीत में ग्रीक माइथोलॉजी, ट्रॉय का युद्ध, सिक्कों के बारे में बातचीत आदि शामिल हो चुके हैं । आज उनका दूसरा दिन है और रात भोजन के पश्चात वे लोग अपने तम्बू में गपशप कर रहे हैं ठण्ड के दिन हैं लेकिन नींद किसी को नहीं आ रही है.. आज पढ़िए प्रलय की मूल कथा .. शरद कोकास

7..जल से ढंकी हुई पृथ्वी

रवींद्र के फ़रमान के बावज़ूद किसीको नींद नहीं आ रही थी । दरअसल ठण्ड कुछ बढ़ गई थी और हम लोग हल्की हल्की कंपकंपाहट महसूस कर रहे थे । हर कोई थोड़ी थोड़ी देर में रजाई से मुँह बाहर निकालता था और देखता था कि कौन कौन हिल-डुल रहा है ।”कितना अच्छा हो खजूर के गुड़ और अदरक वाली एक कप गरमागरम चाय मिल जाए ।” अजय ने एक असंभव सी इच्छा प्रकट की । “चुप रह ।” रवीन्द्र ने उसे डाँटते हुए कहा “चाय की कल्पना भी नहीं करना, भाटी जी चूल्हा बुझाकर कबके सो चुके होंगे और अब भगवान भी आ जाएँ तो वे नहीं जागने वाले ।” “ठीक है यार, हम भी ठण्ड भगाने के लिए अशोक की चुंगी से एक सुट्टा मार लेंगे ।” अजय ने कहा ।

अचानक अशोक को ख़याल आया कि उसने बहुत देर से सिगरेट नहीं पी है ।”सुलगाऊं क्या ?” उसने अजय से पूछा और बिना उसके जवाब की राह देखे अपने बिस्तर के नीचे छुपाकर रखे पैकेट से एक सिगरेट निकाल कर जला ली । सिगरेट जलाकर उसने ढेर सारा धुआं तम्बू की छत की ओर फेंका और दाहिने हाथ को ऊपर उठाकर डमरू की तरह एक विशिष्ट स्टाइल में मटकाते हुए कहा ” जोसी .. ठण्ड वंड कुछ पास न आवै जब हम अपनी सिगरेट सुलगावें।” “ अजय ने अपनी नाक के सामने आया धुआँ हटाने का अभिनय करते हुए कहा “ठीक है भैया, तुम्हारे द्वारा फैलाये हुए प्रदूषण से ही ठण्ड भाग जाए और नींद आ जाये तो कितना अच्छा हो ।”

नींद न आने तक बातचीत करना हमारी विवशता ही नहीं ज़रूरत भी थी इसलिए कि ठण्ड की दुश्मनी नींद से थी और वह इस कदर हावी थी कि अपने अलावा कुछ सोचने ही नहीं दे रही थी । अजय ने मेरी ओर मुखातिब होकर कहा  “ कामरेड, तुम यह जो वर्ग - संघर्ष की कथा सुना रहे थे इसे बाद में सुनाना पहले यह बताओ कि क्या प्रलय की मूल कथा भी यहीं की है ? ऐसा मैंने सुना है ।" “हाँ ।” मैंने कहा “ यह बात सही है । उस समय मेसोपोटामिया के इस क्षेत्र में बार बार बाढ़ आया करती थी, कभी कभी तो बाढ़ की वज़ह से यहाँ की दोनों नदियाँ दज़ला और फ़रात आपस में मिल जाती थीं और प्रलय जैसी स्थिति हो जाती थी, शायद उसी के चलते यहाँ इस कथा ने जन्म लिया हो । कथा कुछ ऐसी है कि..." मैंने देखा अचानक अजय की रज़ाई में एक जलजला सा आ रहा है l 

“अरे सुनो, सुनो ” अजय ने रजाई फेंकी और सीधा होकर बैठ गया .. “भाई कहानी सुना रहा है ।” मैंने मुस्कुराते हुए कहा ..” सुनाता हूँ, लेकिन वादा करो कि बीच में टोकोगे नहीं । और ढंग से रज़ाई ओढ़कर बैठो नहीं तो वाकणकर सर को बता दूँगा कि यह जानबूझकर आत्महत्या का प्रयास कर रहा था ।” अजय ने अपने चारों और ठीक से रज़ाई लपेट ली और मुँह पर उंगली रख कर अच्छे बच्चे की तरह चुपचाप बैठ गया ।

मैंने प्रलय की कथा शुरू की .."माइथोलॉजी में ऐसी मान्यता है कि शुरुआत में यह समूची पृथ्वी जल से ढँकी हुई थी और सब ओर सिर्फ जल ही जल था । आसमान से भी ऊपर एक देवलोक था जहाँ देवता रहते थे और पृथ्वी को जल में डूबा हुआ देखकर बहुत अफ़सोस किया करते थे । देवताओं का प्रयास था कि पृथ्वी को किसी तरह जल से अलग किया जाए ताकि इस पर मनुष्यों को बसाया जा सके, लेकिन एक दैत्य उन्हें ऐसा करने से रोक रहा था । उसे समाप्त किये बगैर कोई चारा नहीं था । सो देवताओं ने उससे युद्ध किया जिसमें देवाधिपति द्वारा वह दैत्य  मार दिया गया l फिर देवताओं ने उस दैत्य के मृत शरीर के दो टुकड़े कर दिए,  फिर देह के ऊपरी  भाग से आकाश व तारों का निर्माण किया और निचले भाग से ज़मीन का । फिर उन्होंने ज़मीन पर पेड़ पौधे उगाए , मिटटी से इंसान और जानवर बनाये और उन्हें इस धरती पर बसाया  । “

“लेकिन यह तो कोरी कल्पना है भाई, बृह्मांड,तारे, पृथ्वी और मनुष्य इस तरह तो नहीं बने थे ।“ अजय ने कहा । “ लो तुमने टोक दिया न, अरे भाई मैंने कब कहा कि ऐसा सचमुच में घटित हुआ था । मैंने पहले ही कहा था कि यह कहानी है, पृथ्वी और मनुष्य के जन्म को लेकर हमारे यहाँ भी इस तरह की कितनी ही कहानियाँ हैं । उस समय मनुष्य के पास जितना ज्ञान था उस आधार पर उसने यह कथायें रचीं । कुछ कल्पनायें आगे जाकर सत्य साबित हो गईं और कुछ कल्पनाएँ ही रह गईं । जैसे कि आज से चार सौ साल पहले तक यही सत्य था कि पृथ्वी स्थिर है और सूर्य उसकी परिक्रमा करता है । अगर गेलेलियो और ब्रूनो जैसे वैज्ञानिक नहीं होते तो आज भी यही सत्य माना जाता । “ रवीन्द्र ने कहा “ नहीं, ये लोग नहीं होते तो कोई और होता लेकिन सच तो एक न एक दिन सामने आता ही है । खैर, तुम आगे की कहानी सुनाओ ।"

“ज़रूर..” मैंने कहा ।“ अब देवताओं की बसाई पृथ्वी पर सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था, मनुष्य झोपड़ियाँ बनाकर रह रहे थे और अपना भरण-पोषण कर रहे थे कि अचानक किसी बात पर देवता मनुष्य से नाराज़ हो गए, उन्होंने तय किया कि मनुष्यों की इस पृथ्वी को फिर से पानी में डुबो दिया जाए ।" "भैया हमें पता है, देवता किस बात से नाराज़ हुए होंगे ।" राममिलन भैया ने तुरंत हमारी कहानी में ब्रेक लगाते हुए कहा " ई इंसान तो सुरु से ही पापी रहा है, जैसे तुम लोग देवी-देवताओं को नहीं पूजते वैसे ही उसने भी देवी देवताओं को पूजना बंद कर दिया होगा, अब नाराज़ नहीं होंगे तो क्या ।" 

" ठीक कह रहे हो भैया" मैंने कहा " सारी ग़लती तो मनुष्यों से ही होती है देवता भी कभी कोई ग़लती करते हैं मेसोपोटामिया में भी ऐसा ही हुआ ।  असीरियों के देवता एंलिल ने मनुष्यों के पाप की वज़ह से ही ऐसा किया था, खैर, देवताओं की नाराज़गी के कारणों पर हम बाद में शोध करेंगे, आगे सुनो कि क्या हुआ ।" मैंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा " हुआ यह कि अन्य देवताओं की नाराज़गी के बावजूद  जल देवता इया मनुष्यों पर प्रसन्न थे सो उन्होंने यह खबर लीक कर दी । 

"पक्की बात है " राममिलन भैया ने कहा " बे लोग जल देवता को ही जल चढाते होंगे।" "भाई कहानी सुनना है कि नहीं ?" मैंने किंचित रोष के साथ कहा .. "हाँ हाँ सुनाओ सुनाओ .." राममिलन भैया ने कहा ।मैंने कहानी आगे बढ़ाई  " तो हुआ यह कि उन्होंने यह बात सरकंडों को बता दी कि देवता फिर से इस पृथ्वी को पानी में डुबोने वाले हैं । उस समय झोपड़ियाँ सरकंडों की बनी होती थीं सो  सरकंडों ने यह बात झोपडी के मालिक ज़िउसुद्दू को बता दी । फिर क्या था, इससे पहले कि प्रलय हो झोपड़ी के मालिक यानि उस मनुष्य ने एक बड़ी सी नाव बनाई, उसमें अपने परिवार को, कुछ शिल्पकारों को व पशु पक्षियों के जोड़ों को बिठा लिया । फिर तयशुदा दिन खूब बरसात हुई, नाव में बैठे लोगों के अलावा सारे लोग डूब गए । फिर एक दिन बारिश थम गई । बारिश थमने पर सबसे पहले नाव से कौवे को भेजा गया कि वह पता लगाये कहाँ पर सूखी ज़मीन है सो कौवा उड़ा, उसने सूखी ज़मीन का पता लगाया वहाँ सारे लोग उतर गए और धरती पर बस गए । फिर उनकी संतानें हुईं और इस तरह दुनिया आगे बढ़ी । “ 

“ यार यह कहानी तो हर धर्म में है जैसे हमारे यहाँ मनु की नाव है, इस्लाम और क्रिश्चेनिटी में नूह या नोहा की नाव है ? “ अजय ने कहा । “ बिलकुल । “ मैंने जवाब दिया । “ ऐसा माना जाता है कि मेसोपोटामिया से ही यह कथा पूरी दुनिया में पहुँची । दज़ला फ़रात के दोआब में स्थित निनेवे नगर में ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता लेयार्ड ने उत्खनन किया था वहाँ लगभग साढ़े चार हज़ार साल पहले की ईटों पर कीलाक्षरी लिपि में लिखी यह कहानी मिली बाद में गिलगमेश नामक महाकाव्य भी मिला जो लगभग तीन सौ पट्टिकाओं पर लिखा हुआ था जिसमे यह पूरी कहानी थी । फिर सन सत्ताईस अठ्ठाइस में ब्रिटेन और अमेरिका के तत्वावधान में पुराविद लियोनार्ड वूली ने सुमेर सभ्यता के अनेक नगर खोज निकाले जिनसे इस कहानी की ऐतिहासिकता की पुष्टि हुई । बाद में अन्य धर्मों में यह कथा आई । इसी से प्रेरित होकर, देवी-देवताओं का भय दिखाकर पुरोहितों ने लोगों को डराया धमकाया, यदि वे देवताओं की बात नहीं मानेंगे तो फिर एक दिन प्रलय होगा । इसके अलावा भी देवी देवताओं के नाम पर,पूजा-पाठ के नाम पर, व्रत-उपवास के नाम पर, दान- दक्षिणा के नाम पर मनुष्य को डराने के लिए बहुत सी कथाएं रची गईं । “

“लेकिन मैं फिर कह रहा हूँ यह इतिहास नहीं है ऐसा कभी हुआ ही नहीं ।“ अजय तर्क के मूड में था । “ हाँ ठीक है तुम्हारा कहना ।” मैंने कहा “यह इतिहास नहीं है, मैंने कहा तो कि उस दौरान वहाँ भीषण बाढ़ आई थी जिसका प्रमाण खुदाई में मिली मिटटी और गाद है जिसकी वज़ह से ऐसी कहानियाँ रची गई । और ऐसा केवल मेसोपोटामिया में नहीं हुआ बल्कि पूरी दुनिया में हुआ ।लेकिन अफसोस यही है कि पढ़े-लिखे लोग भी पुराणकथाओं को इतिहास मान लेते हैं । वे जीवन भर इस बात को सिद्ध करने में लगे रहते हैं कि किसी काल में ऐसा ऐसा हुआ होगा । वे जानना ही नहीं चाहते कि यह कथाएँ देवताओं पर मनुष्य का विश्वास जगाने या इस आधार पर कुछ मनुष्यों द्वारा शेष मनुष्यों पर शासन करने के लिए रची गईं थीं । इसीलिए इतिहासकारों का काम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि वे आम लोगों को इतिहास की वास्तविकता बतायें और बतायें कि इतिहास और कहानी में क्या फर्क है । वरना लोग झूठ को ही हमेशा सच समझते रहेंगे । गोयबल्स की मशहूर उक्ति है, झूठ को सौ बार दोहराओ तो वह सच हो जाता है ।”

“ इतिहास भी यार बड़ी मज़ेदार चीज़ है । “ अशोक त्रिवेदी ने एक और सिगरेट सुलगाते हुए कहा । “बचपन में, स्कूल में गुरूजी कहा करते थे, ’हिस्ट्री जाग्रफी बड़ी बेवफा, रात को रटो और दिन को सफा ।’ हाँ, इसलिए तो लोग मज़बूरी में इतिहास पढ़ते हैं । क्या हम लोग भी प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति और पुरातत्व में एम.ए. इसलिए नहीं कर रहे हैं कि इस डिग्री के बाद कहीं ठीक ठाक नौकरी मिल जाए ? ” अजय ने प्रतिक्रिया व्यक्त की । “और नहीं तो क्या ?” रवीन्द्र कहने लगा “सही तो हे यार ..कितना मुश्किल है लम्बी लम्बी वंशावलियाँ रटना, वही राजा-महाराजाओं के किस्से, युद्धों की कहानियाँ, राजनैतिक षड़यंत्र, नाच-गाने की महफिलें, हरम की ऐयाशियाँ, भूत-प्रेतों की तिलिस्मी कथायें..पुत्र द्वारा पिता की हत्या ..”

“नहीं नहीं… ऐसा भी नहीं है । “ मैंने उसे बीच में टोका । “इतिहास का अर्थ केवल यही नहीं है ..इतिहास तो हमारा अपना ही अतीत है । जैसे हम रोज़मर्रा के जीवन में अपनी पिछली सफलताओं और असफलताओं से सबक लेते हैं इतिहास से सबक लेने का अर्थ भी यही है । अपनी ग़लती से सबक लेना जैसे व्यक्तिगत हित में है वैसे ही मनुष्य जाति के इतिहास से सबक लेना सम्पूर्ण मनुष्यता के हित में है । “ ठीक है ,मान लेते हैं “ अजय ने कहा “लेकिन इतिहास सही है या गलत यह कौन बतायेगा ? हम तो वही इतिहास जानेंगे ना जो हमें पढ़ाया जाएगा ? कुछ इतिहास हमें अंग्रेजों ने पढ़ाया कुछ उनके वंशज पढ़ा रहे हैं । बचपन से अपनी किताबों में यही सब ऊल-जलूल चीजें तो पढ़ रहे हैं हम लोग इतिहास के नाम पर । “

“नहीं, पूरी तरह ऐसा भी नहीं है ।“ रवींद्र ने दलील प्रस्तुत करते हुए कहा । “गुलामी के दौर मंन अंग्रेजों ने यहाँ का अधिकांश इतिहास लिखा । ज़ाहिर है उसमें उन्होंने अपनी प्रशंसा ही लिखी होगी । उनके विरोध में हमारे यहाँ के लोगों द्वारा जो इतिहास लिखा गया उसमें अपनी संस्कृति का गौरव गान था जो कुछ अतिशयोक्ति लिए हुए था । उस दौर में ऐसा करना उन्हें ज़रूरी लगा होगा क्योंकि उस समय अंग्रेजों से अपने आप को श्रेष्ठ साबित करना ही यहाँ के आम जन का उद्देश्य था और अपनी आज़ादी व अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए यह अनुचित भी नहीं था । यह उस दौर का राष्ट्रवाद था । ज़ाहिर है उस समय के इतिहासकार इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए लेखन कर रहे थे और केवल इतिहास में ही नहीं साहित्य में भी इसी तरह का लेखन हो रहा था । स्वतंत्रता की चेतना के लिए आव्हान गीत लिखे जा रहे थे । अपने कुलपति शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी का ही गीत ले लो..”

युगों की सड़ी रूढ़ियों को कुचलती
ज़हर की लहर सी लहरती मचलती
अन्धेरी निशा में मशालों सी जलती
चली जा रही है बढ़ी लाल सेना

अब इसे सुनकर तो ऐसा ही लगेगा जैसे आज़ादी की लड़ाई सिर्फ साम्यवादियों ने लड़ी हो जबकि उसमें और भी लोग शामिल थे ।“

“लेकिन पूर्वाग्रह के साथ लिखे गए  इतिहास में झूठ तो शामिल हो गया ना इस तरह “। अजय ने कहा । “हाँ यह बात तो है ।“ मैंने कहा “न उनका लिखा इतिहास सही था न इनका लिखा । पूर्वाग्रह तो दोनों ही में शामिल थे ..लेकिन फिर भी इसे पूरी तरह नकारा तो नहीं जा सकता और फिर इसके अलावा फिलहाल कुछ है भी तो नहीं हमारे पास ।" “ठीक है, तुम ही लिखना नया इतिहास, डॉ.वाकणकर के सही वारिस तो तुम ही हो..। अपुन को तो कहीं मास्टर-वास्टर की नौकरी मिल जाए अपने लिए  बहुत है ।“ अजय उबासी लेते हुए बोला । अशोक ने उसकी बात पर चुटकी ली ..“ फिर अपन एम ए करके प्रायमरी स्कूल में मास्टर की नौकरी करेंगें और बच्चों को वही इतिहास पढ़ाएंगे जो हमारे बाप-दादा पढ़ाते रहे …एक था राजा एक थी रानी दोनों मर गए खतम कहानी …।“ “ठीक है, ठीक है, हेरोडोटस, थूसीदीदस, इब्त खल्दून, मैंकियावेली, ट्वायनबी, इवेल्यान, और कार्ल मार्क्स के वंशजों रात बहुत हो गई है अब सो जाओ बाक़ी की बातें कल करेंगे ।“ रवीन्द्र ने अपना अंतिम फरमान ज़ारी करते हुए कहा ।

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